औद्योगिक क्षेत्र काला अंब और बद्दी में धूमधाम से मनाया गया छठ पर्व

श्री मारकंडा नदी में अगस्तांचल गामी सूर्य को दिया गया प्रथम अर्ध्य , पहले की मारकंडे जी नदी की सफाई और फिर हुआ विशेष छठ पूजन

HNN News नाहन नालागढ़ बद्दी

औद्योगिक क्षेत्र काला आम नालागढ़ बद्दी में तीसरे दिन का छठ पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। हिमाचल प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में बिहार व उत्तर प्रदेश के प्रवासी कामगारों ने शनिवार के तीसरे व्रत के दिन सूर्य देव छठ मैया की उपासना कर अपने परिवार की खुशहाली की कामना की।

औद्योगिक क्षेत्र काला अंब में हिमाचल से हरियाणा की ओर जाते समय पड़ने वाले श्री मारकंडा जी पुल के नीचे पूरी नदी में उत्सव सा माहौल था। औद्योगिक क्षेत्र से महिलाएं व पुरुष सज संवर कर अपने बच्चों के साथ सर पर फलों की टोकरीयां रखकर नंगे पांव श्री मार्कंडेय जी नदी पर पहुंचे थे।

शनिवार को अगस्तांचल गामी भगवान सूर्य देव को प्रथम अर्ध्य दिया गया। तो वही सुबह रविवार को उदयीमान सूर्य को अर्ध्य के साथ छठ व्रत का पारण किया जाएगा।

आचार्य केशवानंद रतूड़ी ने बताया कि शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को किए जाने वाले व्रत को डाला छठ भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि पति पुत्र धन धन्य सुख समृद्धि के लिए यह व्रत रखा जाता है। वृत्ति स्त्री या पुरुष खरना के शाम से लेकर उगते सूर्य को अर्ध्य दिए जाने तक बगैर कुछ खाए पिए यह व्रत रखते हैं।

छठ पर्व के तीसरे दिन शनिवार को बिहार सिवान के एम तिवारी, दानापुर बिहार के संजय राय उनकी पत्नी बिंदु देवी बच्चे अंकित आदि ने अपने परिवार सहित शनिवार को व्रत के दौरान डूबते सूर्य को गेहूं आटा गुड़ शक्कर से बने प्रसाद ठेकुआ केलावा चावल से बने भुसवा, गन्ना नारियल फल-फूल आदि हाथों में लेकर श्री मार्कंडेय नदी में घुटनों तक पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य देव को अर्ध्य दीया।

वही औद्योगिक क्षेत्र के उद्योगपतियों ने इन प्रवासी मजदूरों के त्यौहार पर इन्हें छुट्टी देकर छठ पर्व की शुभकामनाएं भी दी। उधर नालागढ़ बद्दी बरोटीवाला में भी यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया

क्या है छठ व्रत व इस की रोचक कथा व तथा कथा का महत्व

बताया जाता है कि सतयुग काल में शर्याति नाम के एक राजा हुआ करते थे। उनकी अनेक स्त्रियां थी, लेकिन उनकी एकमात्र संतान सुकन्या नामक सुपुत्री थी। राजा को अपनी पुत्री से अत्यधिक स्नेह था । एक बार राजा शर्याति जंगल में शिकार खेलने गए। उनके साथ सुकन्या भी गईं। जंगल में चवण ऋषि तपस्या कर रहे थे।

ऋषि तपस्या में इतने लीन थे कि उनके शरीर पर दीमक लग गई थी। बांबी से उनकी आंखें जुगनू की तरह चमक रही थीं। सुकन्या ने कौतुहलवश उन बांबी के दोनों छिद्रों में जहां ऋषि की आंखें थी, तिनके डाल दिए, जिससे मुनि की आंखें फूट गईं।

क्रोधित होकर च्यवण ऋषि ने श्राप दिया जिससे राजा शर्याति के सैनिकों का मल-मूत्र निकलना बंद हो गया। सैनिक दर्द से तपड़ने लगे।

जब यह बात राजा शर्याति को मालूम हुई तो वह सुकन्या को लेकर च्यवण मुनि के पास क्षमा मांगने पहुंचे। राजा ने अपनी पुत्री के अपराध को देखते हुए उसे ऋषि को ही समर्पित कर दिया। सुकन्या ऋषि च्यवन के पास रहकर ही उनकी सेवा करने लगी।

एक दिन कार्तिक मास में सुकन्या जल लाने के लिए पुष्करिणी के समीप गई। वहां उसे एक नागकन्या मिली। नागकन्या ने सुकन्या को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य की उपासना एवं व्रत करने को कहा। सुकन्या ने पूरी निष्ठा से छठ का व्रत किया जिसके प्रभाव से च्यवन मुनि की आंखों की ज्योति पुन: लौट आई।

बरहाल प्रदेश की देवभूमि में कई देवी देवता पूजे जाते हैं मगर जिस प्रकार देवभूमि में डूबते और उगते सूर्य की पवित्र श्री मार्कंडेय जी नदी में पूजा की गई उससे देवभूमि में श्रद्धा का एक और अध्याय जुड़ गया है।