प्रदेश के 25 हजार हेक्टेयर कोल्ड मरुस्थल में अगले वर्ष से हींग क्रांति

50 से ₹60 हजार रुपए किलो बिकता है हींग, 5 अरब का हींग विदेशों से भारत में मंगवाया जाता है, जहां होती थी अफीम वहां बखूबी पनपेगा हींग का पौधा, देश का सबसे अमीर राज्य होगा हिमाचल प्रदेश

HNN News नाहन

अगर 1 साल का प्रयोग सही रहा तो अगले वर्ष के बाद हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े कोल्ड मरुस्थल लाहौल स्पीति कुंजम, बारालाचा तथा किन्नौर के मरू भाग में हींग के पौधों की भरमार होगी।

हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसर्च यानी राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की देखरेख में हिमाचल प्रदेश के लिए एक बड़ा क्रांतिकारी प्रयोग किया जा रहा है।

सूत्रों की माने तो हींग के पौधे पर किया गया यह प्रयोग लगभग 99 फ़ीसदी खरा उतर चुका है। इस वर्ष का डाटा आने के बाद जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर हिमाचल प्रदेश को 99 परसेंट क्लीयरेंस मिल जाएगी।

क्या है हींग का पौधा

Asafoetida यानी के हींग जिसे संस्कृत में हिंगु भी कहा जाता है। सॉफ्ट प्रजाति का यह पौधा मूल रूप से ईरान का पौधा माना जाता है। भूमध्य सागर से मध्य एशिया तक यह पैदा होते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा अफगानिस्तान बलूचिस्तान ईरान मैं इसे उगाया जाता है। भारत करीब 1145 टन हींग यानी 5 अरब का हींग इन देशों से मंगाता है।

हींग में सबसे उत्कृष्ट किस्म फौरुला एसाफोटीडा होती है। बड़ी बात तो यह है कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर को इस बड़े क्रांतिकारी बदलाव के लिए हरी झंडी भी दे रखी है।

प्रिंसिपल सेक्रेट्री एग्रीकल्चर श्रीकांत बाल्दी तथा निदेशक हिमालय जलसंपदा प्रौद्योगिकी डॉ संजय कुमार इसको लेकर एक मीटिंग भी कर चुके हैं। सरकार इसके उत्साहवर्धक परिणामों से बेहद उत्साहित भी है। क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिलासपुर से लेकर जिला सिरमौर तक जिस बेल्ट में कभी अफीम की खेती नेचुरल तरीके से लहलहाया करती थी उस जमीन को हींग की खेती के लिए सबसे उपयुक्त भी माना गया है।

क्या होंगे बड़े फायदे

वही सीएसआइआर आईएचबीटी के निदेशक डॉ संजय कुमार ने बताया कि फिलहाल संस्थान राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के सहयोग से 1000 पौधों पर रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रिसर्च को लगभग अंतिम रूप दे दिया गया है। उन्हें खुशी जताते हुए कहा कि प्रयोग 99 फ़ीसदी सफल हो चुका है।

अब यह संस्थान प्रदेश सरकार के कृषि विभाग के सहयोग से ठंडे मरुस्थल यानी लाहौल स्पीति के खाली पड़ी हजारों हेक्टेयर भूमि को इसकी खेती के लिए तैयार करेंगे। जिसके लिए शुरू में करीब 25000 हेक्टेयर जमीन पर हींग के पौधे लगाए जाने का टारगेट रखा गया है।

बिलासपुर सिरमौर कि उस जमीन पर जिसमें रेत की मात्रा के साथ जमीन ज्यादा देर तक गीली ना रहती हो उस जगह इस पौधे को लगाया जा सकता है। कह सकते हैं किस सेब के बाद यदि हींग की खेती प्रदेश में जिस दिन से शुरू हो जाएगी उसके आने वाले 3 से 5 वर्षों के बीच में हिमाचल प्रदेश देश का सबसे अमीर राज्य बन जाएगा।

हींग ना केवल मसालों में इस्तेमाल किया जाता है बल्कि कैंसर गैस बदहजमी और करीब 73 तरह की दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है। हींग दो तरह की होती है एक दूधिया और दूसरी लाल रंग की। हिमाचल प्रदेश में सरकार सबसे उत्कृष्ट किस्म की हींग को लगवाने का प्रारूप तैयार कर रही है।

बता दें कि अफगानिस्तान और ईरान में इसके बीज को बाहर बेचने या निर्यात करने पर मौत की सजा का प्रावधान रखा गया है। मगर राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने इसे विशेष अनुमति के तहत मंगवा कर इस पर सफल प्रयोग किया है। राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के निदेशक कुलदीप शर्मा का कहना है कि इसके पौधे पर बड़ी ही जटिल रिसर्च की गई है। और सुरक्षा संबंधी तमाम पैरामीटर्स को अपनाया गया है। कुछ किसान इसे बिना प्रयोग के उगा रहे हैं वह खतरनाक भी हो सकता है।

उनका कहना है कि जिस प्रकार भारत में कांग्रेस घास या अन्य खतरनाक खरपतवार उग रहे हैं ऐसे परिणाम फिर से ना आए इसको लेकर इन पौधों पर गहन रिसर्च किया जाना जरूरी होता है।

बरहाल यह बहुत बड़ी बात है की ऐसे हजारों हेक्टेयर मरुस्थल जिसका अभी तक कोई फायदा नहीं पहुंचा था। यदि इस पूरे मरुस्थल पर हींग की खेती शुरू हो जाती है तो निश्चित ही हींग की खेती करने में भारत देश का नाम दुनिया में पहले नंबर पर आ जाएगा।

वहीं लंबे समय से आर्थिक संकट की मार झेल रहा निचली बेल्ट का किसान जिस क्षेत्र में कभी अफीम हुआ करती थी उस क्षेत्र का किसान भी मालामाल हो जाएगा।

निदेशक हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर के निदेशक डॉ संजय कुमार ने खबर की पुष्टि करते हुए कहा कि किया गया प्रयोग कंट्रोल कंडीशन में है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में इसकी खेती की अपार संभावनाएं हैं। उनका लक्ष्य बाहरी मुल्कों से हींग का इंपोर्ट बंद करना है। इसकी खेती के बाद प्रदेश की इकोनामी भी जबरदस्त तरीके से उभर कर सामने आएगी।