मां- पुत्र के मिलन का पर्व है श्री रेणुका मेला, पढ़ें पूरी कथा…

HNN News/ श्री रेणुका जी

मां-पुत्र के पावन मिलन का श्री रेणुका जी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री रेणुका में मनाया जाता है। जन श्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामू कोटि से वर्ष में एक बार अपनी मां श्री रेणुका जी से मिलने आते हैं।

यह मेला मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है जो कि असंख्य लोगों की अटूट श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक है। इस वर्ष यह मेला श्री रेणुका जी तीर्थाटन पर 7 नवंबर से 12 नवंबर तक परंपरागत ढंग से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

मध्य हिमालय की पहाड़ियों के आंचल में सिरमौर के गिरिपार का पहला पड़ाव है, श्री रेणुका जी। यह स्थान नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर उत्तरी भारत का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है जहां नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील जिसे मां रेणुका जी की प्रतिछाया में माना जाता है, स्थित है। इसी झील के किनारे मां श्री रेणुका जी व भगवान परशुराम जी के भव्य मंदिर स्थित है।

कथानक अनुसार प्राचीनकाल में आर्यव्रत में हैहयवंशी क्षत्रिय राज करते थे तथा रघुवंशी ब्राह्मण उनके राजपुरोहित थे। इसी भृगुवंशी के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु उनके ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र में तपस्या में लीन रहने लगे जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की वह ‘तपे का टीला’ कहलाता है।

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम ने जन्म लिया इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। अश्वथामा, ब्यास, बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य व मार्कंडेय के साथ अष्ट चिरंजीवियों के साथ भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं।

महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजारिशी लालायित थे। राजा अर्जुन ने वरदान में भगवान दत्तात्रेय से 1000 भुजाएं पाई थी जिसके कारण वह सहस्त्रार्जुन कहलाए जाने लगा। एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंच गया।

महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया तथा उसे समझाया की कामधेनु गाय उसके पास कुबेर जी की अमानत है जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर गुस्साए सहस्त्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर में कूद गई। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया जिससे सरोवर का आकार स्त्री के समान हो गया। उधर भगवान परशुराम महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे लेकिन योग शक्ति से उन्हें अपनी जननी एवं जनक के साथ हुए घटनाक्रम का एहसास हुआ और उनकी तपस्या टूट गई।

परशुराम अति क्रोधित होकर सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े तथा आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा। परमवीर भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपनी योग शक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रतिवर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम को मिलने आया करेगी।

यह मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा आयोजन है। 6 दिन तक चलने वाले इस मेले में आसपास के सभी ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर मां पुत्र के इस दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। कई धार्मिक अनुष्ठान सांस्कृतिक कार्यक्रम हवन यज्ञ प्रवचन एवं हर्षोल्लास इस मेले के अभिन्न अंग है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब तथा हरियाणा के लोगों की इसमें अटूट श्रद्धा है

बता दें कि श्री रेणुका जी विकास बोर्ड द्वारा मेले की पारंपरिक गरिमा बनाए रखने के अतिरिक्त इसे और आकर्षक बनाने के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। तथा मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सभी आवश्यक प्रबंध किए गए हैं परंपरा के अनुसार 7 नवंबर यानी आज ददाहू से भगवान परशुराम की शोभायात्रा निकाली जाएगी।

जिसमें क्षेत्र के अन्य देवी-देवता भी भाग लेंगे 8 नवंबर को एकादशी और 12 नवंबर को पूर्णिमा की प्रातः रेणुका झील में स्नान करने का विशेष पर्व होगा। इस दौरान असंख्य श्रद्धालु रेणुका के पवित्र जल में स्नान करके पुण्य प्राप्त करेंगे।