मां रेणुका जी के संकट से बेखबर हैं क्षेत्र के लोग-और कितना रुलाएंगे मां को

केवल धार्मिक क्रियाकलापों के लिए रखें मां रेणुका जी का परिधि क्षेत्र, मेला कार्यक्रम नहीं किया बाहर तो एक दिन पछताएंगे रेणुका जी को मां कहने वाले

HNN News श्री रेणुका जी

करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक माने जाने वाली जिला सिरमौर में स्थित अंतर्राष्ट्रीय धरोहर मां रेणुका जी झील संकटग्रस्त हो चुकी है।

मां के बच्चों ने ही अमृत का पर्याय माने जाने वाली रेणुका जी झील को ना केवल पर्यावरण के नजरिए से खतरनाक स्थिति पर पहुंचा दिया है बल्कि धीरे-धीरे इसकी गहराई को खत्म कर रही गाद भी व्यापक रूप से फैलती जा रही है।

यह खुलासा देश की प्रमुख रिसर्च एजेंसी वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून के वैज्ञानिकों ने किया है। उनकी रिसर्च के अनुसार इस झील का पानी अब किसी भी सूरत में पीने लायक नहीं रह गया है।

यही नहीं झील की उर्वरा शक्ति इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि इसमें कमल के साथ-साथ पानी में अत्यधिक मात्रा में वनस्पति भी उगनी शुरू हो गई है। असल में मेले के दौरान हर दिन करीब ढाई लाख से भी ज्यादा धार्मिक पर्यटक तथा स्थानीय लोग यहां आते हैं।

इतनी भारी तादाद में श्रद्धालुओं के आने से अधिकतर जंगलों में शौच के लिए जाते हैं। यह शौच व यूरिन बरसातों में पानी के साथ बहकर झील में आ जाता है। यह खनिज लवणों की तरह काम करता है। जिससे झील की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। जोगी बड़ी ही खतरनाक मानी जाती है।

यही नहीं रिसर्च में यह भी पाया गया है कि झील की मछलियां अपना प्राकृतिक व्यवहार खोकर श्रद्धालुओं द्वारा दिए जाने वाले आटा बिस्किट आदि पर ही निर्भर हो गई है। जिससे झील का नेचुरल सिस्टम बिगड़ गया है।

यही नहीं झील का बीओडी सिस्टम भी काफी बढ़ा हुआ है। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि राजनीतिक पहुंच रखने वाले पैसे से संपन्न लोग विवाह आदि की पार्टी भी कुब्जा पवेलियन में झील से मात्र कुछ कदमों की दूरी पर देते हैं।

अब यदि विशेषज्ञों की बात मानी जाए तो जिस प्रकार जनसंख्या की दर बढ़ी है। उस से कुब्जा पवेलियन व सांस्कृतिक कार्यक्रम वेटलैंड क्षेत्र तथा झील के आसपास से हटाकर गिरी नदी के डेल्टा पर आयोजित किया जाना चाहिए।

झील क्षेत्र में केवल धार्मिक आयोजन यानी हवन पूजा और पालकियां ही रखी जानी चाहिए। क्योंकि रात्रि को यहां पर सोने की भी परंपरा रही है। लिहाजा उस दौरान सोक पिट युक्त मोबाइल टॉयलेट्स किसी एजेंसी को दिए जाने चाहिए।

अब सवाल यह उठता है कि यदि वास्तव में इस क्षेत्र के लोग वह नेता इस भगवान परशुराम और मां के मिलन को और अधिक वर्षों तक बनाए रखना चाहते हैं तो उन्हें अब एक बड़ा फैसला लेना ही होगा। मेले में श्रद्धालुओं को 1 दिन इस झील के आसपास कार सेवा भी करनी होगी और साथ ही इस मेले को अब यहां से शिफ्ट कर गिरी नदी की और ले जाना होगा।

रेणुका झील को मां कहने वालों को अब वेटलैंड केचमेंट एरिया कि जल्दी पैमाइश करवा कर वाइल्ड लाइफ फॉरेस्ट के हाथों सुरक्षित मानते हुए सौंपने के लिए मन बनाना होगा।

रेणुका मां की गरिमा व मर्यादा को सदियों तक बनाए रखने के लिए इसके आसपास तमाम तरह के निर्माणों पर रोक भी लगानी पड़ेगी। अगर यहां के स्थानीय लोग व श्रद्धालु इसके लिए तैयार नहीं है तो उन्हें निश्चित ही इस झील को मां कहना बंद कर इस एक टूरिस्ट स्पॉट बना देना चाहिए।

फिर चाहे इसका वजूद रहे या ना रहे नेताओं को नेतागिरी चमकाने और लोगों को पिकनिक स्पॉट के लिए पूरी छूट दे देनी चाहिए।

क्या कहते हैं डीएफओ वाइल्डलाइफ राजेश शर्मा

राजेश शर्मा का कहना है कि झील के वजूद को बचाने के लिए एक बड़े प्रयास की जरूरत आ गई है। उन्होंने बताया कि प्रदेश का साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट इस विषय को लेकर पूरी तरह गंभीर है। वेटलैंड की वजह से यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। ऐसे में धर्म के साथ प्राकृतिक जीव-जंतुओं का जो संगम यहां पर बन चुका है निश्चित ही उससे स्थान का महत्व और बढ़ जाएगा।

साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट से डॉक्टर रवि शर्मा का कहना है कि श्री रेणुका झील के लिएJIZ जर्मन एजेंसी जल्द ही यहां का विजिट करने वाली है। इस जर्मन एजेंसी के साथ कल ऑपरेशन करते हुए भारत सरकार मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरमेंट एंड फॉरेस्ट्स क्लाइमेट चेंज एक साइंटिफिक प्लान तैयार कर रहा है। प्रदेश सरकार ने इसके लिए श्री रेणुका जी वेटलैंड क्षेत्र तथा पोंग डैम के लिए इस एजेंसी को शामिल किया है।

उधर वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ मीणा ने कहां है कि पर्यावरण के नजरिए से श्री रेणुका जी झील का पानी अब पीने लायक नहीं रह गया है। उन्होंने बताया कि इस झील से संबंधित रिसर्च आ चुकी है जल्द ही उसकी जानकारी दे दी जाएगी।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि वाडिया इंस्टीट्यूट के डॉ मीणा करीब 2009 से इस पवित्र झील से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कोर सेंपलिंग वाह कार्बन डेटिंग के माध्यम से इस झील की उम्र तथा इस पर मंडरा रहे खतरों को लेकर अपना शोध भी तथ्यों के साथ रखा है।