मेडिकल कॉलेज की लापरवाही ने ली पत्रकार की मां की जान

HNN / नाहन

जिला सिरमौर के नाहन में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार आशु वर्मा की माता का देर रात अचानक तबीयत खराब हो जाने से निधन हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार रात्रि को जब 11:30 के आसपास आशु वर्मा की माता की तबीयत खराब हुई तो तुरंत एंबुलेंस की व्यवस्था ना होने के कारण आशु वर्मा उन्हें अपनी मोटरसाइकिल पर ही मेडिकल कॉलेज ले गए। रात को जैसे ही वह अस्पताल में पहुंचे ना तो मेडिकल कॉलेज में कोई अटेंडेंट उन्हें मिला और ना ही किसी ने व्हीलचेयर या स्ट्रेचर का इंतजाम किया। आशु वर्मा की तड़पती हुई मां अपने बेटे के दर्द को भी देख रही थी और खुद ही तड़पते हुए इमरजेंसी वार्ड तक गई।

इमरजेंसी में तैनात चिकित्सक ने उस समय आशु वर्मा की मां को अटेंड नहीं किया जब वह इमरजेंसी के बाहर ही तड़प रही थी। आशु वर्मा जोर-जोर से अपनी मां को जल्द देखने की गुहार लगाता रहा मगर संवेदनहीन मेडिकल स्टाफ एक पत्रकार की बेबसी को देखता रहा। आशु वर्मा अकेला ही अपनी मां को लेकर गया था तो ऐसे समय में चिकित्सक उनसे कहती है कि व्हीलचेयर ले आए। हैरानी तो इस बात की है कि वह चिकित्सक यह भी नहीं देख पा रही थी कि उसकी मां किन हालातों से गुजर रही है बावजूद उसके तड़पती हुई मां बेटे के कंधे को पकड़ते हुए इमरजेंसी वार्ड तक पहुंची।

करीब 20 से 25 मिनट की जद्दोजहद में वार्ड के अंदर पहुंची आशु वर्मा की मां की सांसे उखड़ चुकी थी।
जिसके बाद आशु वर्मा को बाहर जाने के लिए कहा और कुछ देर बाद आशु वर्मा की मां इस दुनिया को अलविदा कह गई। इस पूरी दर्दनाक स्थिति की इंतेहा केवल यही तक सीमित नहीं रही। इसके बाद आशु वर्मा की मां का शव इमरजेंसी वार्ड में 1 घंटे से भी अधिक समय तक पड़ा रहा। शव को ले जाने के लिए ना तो कोई अस्पताल प्रबंधन की ओर से व्यवस्था हुई और ना ही वहां कोई ऐसा अधिकारी नजर आया जो कि व्यवस्था बना सके। रात को हिमाचल नाउ न्यूज़ ने एमएस मेडिकल कॉलेज से बात करी तो उन्होंने भी एंबुलेंस को लेकर अपनी बेबसी बताते हुए पल्ला झाड़ लिया।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया के लिए लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार का जब यह हाल है तो आम आदमी के लिए सरकार के मेडिकल यानी के स्वास्थ्य के दावे कितने पुख्ता साबित होते हैं। गौरतलब हो कि यह तो सबको पहले से ही मालूम है कि नाहन का मेडिकल कॉलेज केवल और केवल भ्रष्टाचारी का बड़ा अड्डा है। जहां पर केवल कमीशन खोरी और सरकारी कर्मचारियों के मेडिकल बिल बनाने तक का ही कार्य होता है। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एक मेडिकल कॉलेज से जो अपेक्षाएं यहां के लोगों ने रखी थी वह सब धराशाई नजर आती है। ऐसे में सवाल खड़ा हो जाता है कि मेडिकल कॉलेज ज्यादा बेहतर है या फिर पहले जो जोनल अस्पताल था वह सही था।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि नाहन के मेडिकल कॉलेज के काले कारनामों को मीडिया उजागर न कर पाए इसके लिए सिक्योरिटी गार्ड केवल बाउंसर की तरह काम करते हैं। जबकि यह भी सबको मालूम है कि यहां की सिक्योरिटी पर भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन मोटी कमीशन खोरी का धंधा करता है। जानकारी तो यह भी है कि सिक्योरिटी में सिक्योरिटी मैन कम है, मगर उन्हें कागजों में पूरा दिखा कर सरकार से पूरा पैसा ही क्लेम किया जाता है।

इस बात की पुष्टि इससे भी हो जाती है कि हर महीने 90,000 का पानी टैंकर के माध्यम से मेडिकल कॉलेज के बच्चों के नाम पर पास किया जाता है। ऐसे में कोई मरे या जिये इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। सरकार भी उनके काले कारनामों को अभी तक जांच के दायरे में नहीं ला पाई है। जबकि मीडिया बार-बार इस मेडिकल कॉलेज के बड़े भ्रष्टाचार ओं को उजागर कर चुका है। बरहाल, एक पत्रकार की मां तड़प-तड़प कर समय पर इलाज ना मिल पाने के कारण इस दुनिया से अलविदा हो गई। मगर जाते-जाते एक पत्रकार की कलम के ताव को और भी ज्यादा धार दे गई।

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