राणा जीते रण, तो गुरु भाई पर गुटबाजी पड़ी भारी

B2 भाजपा ने पार्टी की प्रतिष्ठा से ज्यादा चुनाव को बनाया बिंदल बनाम कांग्रेस

HNN / सोलन

आखिर सोलन नगर निगम चुनावों में राणा ने रण फतेह कर कांग्रेस में अपना कद साबित कर दिया है। जबकि चाणक्य कहलाने वाले नाहन के विधायक अपनी ही रणभूमि में अपनों के ही हाथों मात खा गए। हिमाचल नाउ न्यूज़ ने शुरू में ही बी-2 भाजपा और कांग्रेस में गुपचुप रूप से हुई सांठगांठ का खुलासा कर दिया था। जिसके बाद हमने कहा था कि फ्रंटफुट पर चल रही भाजपा बैकफुट पर कैसे आ गई।

सवाल तो यह उठ रहा है कि बी-2 भाजपा के प्रमुख चेहरे के साथ कांग्रेस में शामिल हुए कुशल जेठी की गहरी दोस्ती थी। कोई भी मंत्री हो या सीएम का कार्यक्रम तो b1 भाजपा स्टेज के सामने और बी 2 भाजपा के साथ मंच पर जेटी हुआ करते थे। जाहिर है नगर निगम चुनाव में चतुर रणनीति बनाने में राणा कामयाब रहे ।
गुटबाजी की पुष्टि इसलिए भी मानी जा सकती है कि बी2 भाजपा यानी बिंदल की नज़दीकियों वाले खास चेहरे चुनाव हारे हैं।

अब आपके मन में सवाल यह भी उठ रहा होगा कि आखिर बीटू जिस डाल पर बैठी है उसे क्यों काटेगी।
इसका जवाब आपको 2022 के चुनावों से ठीक पहले मिल जाएगा। हालांकि हम राणा की रणनीति को समझते हुए यह बिल्कुल क्लियर कर सकते हैं कि B2 भाजपा का एक चेहरा कांग्रेस से टिकट पाने के लिए पूरी तरह आश्वस्त है। जबकि ऐसा होना मुश्किल होगा क्योंकि कुशल जेठी ने सोलन में अपना कद साबित भी कर लिया है और अपने सर पर राणा का वरदहस्त भी रख लिया है। तो अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।

पवन गुप्ता भाजपा का वह चेहरा है जिसने बड़ी ईमानदारी के साथ पार्षद व अध्यक्ष रहते हुए जबरदस्त विकास कार्य करवाएं। सीधे व सरल स्वभाव के साथ-साथ स्वच्छ छवि के इंसान हैं। मगर b1 भाजपा के निष्ठावान सिपाही होने के कारण निष्ठा की बलि चढ़ गए। सवाल तो यह उठता है कि जब इस गुटबाजी के बारे में शीर्ष नेतृत्व को भी मालूम था तो इसका पटाक्षेप क्यों नहीं करवाया गया।

जाहिर है बी-2 ने मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा का भी ध्यान में रखते हुए कहीं और से मिले बड़े इशारे पर भी काम किया है। कहते हैं जब जंग होती है तो पड़ोसी भी दोस्त बन जाता है यह तो एक ही परिवार में फूट का परिणाम हार बना। इस सियासी चक्रव्यू में नगर निगम की मार्फत ना केवल स्वास्थ्य मंत्री बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री की भी प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा है।

अब यदि बात की जाए कांग्रेस की तो स्थिति लगभग पहले ही क्लियर हो चुकी थी कि राजेंद्र सिंह राणा इस आपसी फूट का पूरा फायदा उठा कर अपना कार्य सिद्ध कर लेंगे। संभवत उन्हें यह भी मालूम था कि उन्हें किसी ब्रांड चेहरे की भी जरूरत नहीं पड़ेगी इसीलिए पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को इस चुनावी समर में उतारने की जरूरत नहीं पड़ी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर अपनी स्वच्छ छवि के साथ बेहतर अधिवक्ता के साथ साथ एक अच्छे प्रधान भी साबित हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि उनके कद को उनकी ही पार्टी में छोटा करने के लिए भी एक लॉबी पूरी तरह सक्रिय है। बावजूद इसके पालमपुर धर्मशाला सोलन रोहड़ू आदि क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करते हुए श्रेष्ठ साबित हुए हैं।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है 2022 का चुनाव भाजपा के कमजोर होते संगठन और आपसी फूट गुटबाजी के चलते मिशन रिपीट पर शक पैदा करता है।

तो वही कहते हैं के आसार पहले नजर आने शुरू हो जाते हैं संभवत यही वजह है कि आज सरकार की ब्यूरोक्रेसी पर भी पकड़ कमजोर होती जा रही है। इसके साथ ही बड़े कदों को छोटा कद बनाने के चक्कर में भाजपा अब पूरी तरह से बैकफुट पर है।

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