शिवलिंग शिला के रूप में विराजमान है भूरेश्वर महाराज

HNN News/ पच्छाद

हर वर्ष ग्यास को यहां देव उत्सव मनाया जाता है। इस बार 6 व 7 नवंबर को यहां पर मेले का आयोजन किया जा रहा है। हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य देव के दर्शनार्थ मंदिर में पहुंचते हैं, जो कच्चा दूध चढ़ाकर उन्हें प्रसन्न करते हैं।

इस दौरान मंदिर में माथा टेकने के लिए जिला सिरमौर सिरमौर, सोलन सहित हरियाणा से भारी मात्रा में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

महाराजा सिरमौर को भी यहां से संतान रूपी रत्न की प्राप्ति हुई थी। मान्यता है कि 16वीं सदी के आसपास जब महाराज सिरमौर यहां से गुजर रहे थे, तो उन्हें स्थानीय लोगों से इस मंदिर के बारे में पता चला। इस पवित्र स्थान की महत्ता का ज्ञान होने पर उन्होंने महादेव से संतान प्राप्ति की कामना कर ली।

बताते हैं कि जल्द ही उनकी यह कामना पूर्ण हो गई। उसके बाद महाराज मंदिर पहुंचे, तो मंदिर की विकट स्थित को देखते हुए उन्होंने पुजारी को मोहतमिम यानी इस देव स्थली का प्रबंधक बना दिया। वेतन स्वरूप कुछ धनराशि भी निर्धारित कर दी।

इसके बाद पुजारी को सालाना 12 चांदी मिलने लग गए। उन्हें पुश्तेनी माफिदार पुजारी के पट्टे से सन्मानित किया गया। आज भी उन्हें राजस्व विभाग 12 रुपए की राशि प्रदान करता है। जिसका बाकायदा इंतकाल दर्ज होता है। देव स्थल के नियमों को बरकरार न रख पाने के चलते यह महान देव परंपरा समाप्ति की ओर बढ़ रही है।

आस्था का केंद्र है भूरेश्वर महादेव

देवभूमि हिमाचल में देवी-देवता अलग-अलग रूप में आस्था का केंद्र बने हुए हैं। ऐसा ही एक पवित्र स्थान भूरेश्वर महादेव का है। यहां स्वयंभू शिवलिंग जिसकी उत्पत्ति कालांतर से मानी जाती है। विश्वनाथ व केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों व भूलिंगों के इतिहास में यहां स्थित स्वयंभू लिंग कालांतर में भूरश्रृंग जो दूग्धाहारी भूरेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

वह आज भी शिवलिंग शिला के रूप में विराजमान है। यहां की देव परंपरा भी एकदम निराली है। गोपनीय शाबरी मंत्र व पारंपरिक धूपदीप से पूजा के चलते देवता रात्रि के घूप अंधेरे व कंपकपाती ठंड के बीच एक विचित्र चमत्कार करते हैं।

देवता एक ऐसी शिला पर न केवल छलांग लगाते हैं। बल्कि करवटें भी बदलते हैं, जो पहाड़ में तिरछी लटकी है। यह स्थान इतना खतरनाक व विकट है कि यदि यहां से कोई वस्तु गिर जाती है, तो हजारों मीटर खाई में पहुंच जाएगी। सिरमौर जिला के पच्छाद उप मंडल में क्वागधार की शिवालिक पर्वतमाला पर शोभायमान यह एक दर्शनिय एवं पवित्र धार्मिक स्थल है।