हाईकोर्ट के स्टे के बाद भी लक्कड़ बाजार शिमला में असहाय महिला का तोड़ा जा रहा मकान


हाई कोर्ट के आदेशों की एक व्यक्तिम द्वारा उड़ाई जा रही धज्जियां


HNN News शिमला

आईजीएमसी के समीप कल्याण लॉज कोठी में रहने वाली एक निर्धन महिला दीपिका ने उनके मकान को तोड़ रहे राकेश अहूजा पर माननीय उच्च न्यायालय और निचली अदालतों के आदेशों की अवहेलना करने का आरोप लगाया गया है ।

इस बारे दीपिका ने जिलाधीश शिमला को पत्र लिखकर काम को बंद करवाने की गुहार लगाई है । असहाय महिला का कहना है कि कल्याण लॉज कोठी में वह पुश्तों से अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। इनका आरोप है कि राकेश अहूजा द्वारा राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ सांठगांठ से राजस्व रिर्काड में हेराफेरी की गई और इस कोठी को अपने नाम करवा लिया है ।

महिला का कहना है कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 24 जुलाई 2020 को अवैध निर्माण को रोकने बारे उनके पक्ष में स्टे दिया गया है। जबकि इससे पहले निचली अदालत द्वारा 10 नवंबर 2016 को राकेश अहूजा द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माण पर स्थगन आदेश जारी किए गए थे ।

इसके अतिरिक्त नगर निगम शिमला द्वारा दिनांक 2 दिसंबर 2017 को जारी आदेश में राकेश अहूजा को विवादास्पद भूमि पर निर्माण कार्य न करने पर रोक लगाई गई थी । जबकि एनजीटी द्वारा जारी आदेशों में ग्रीन एरिया में निर्माण कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है ।

महिला का कहना है कि माननीय उच्च न्यायालय के स्थगन आदेशों के बावजूद भी राकेश अहूजा द्वारा तोड़फोड़ और निर्माण का कार्य जारी है और अदालत के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है ।

दीपिका का कहना है कि गत 13 मार्च को आईजीएमसी की ओपीडी के पास भू-स्खलन के कारण उनके मकान का एक हिस्सा काफी क्षतिग्रस्त हो गया था जिसमें घर का अधिकांश सामान भी नष्ट हो गया था । दूसरी ओर राकेश अहूजा द्वारा मेरे मकान को गिराकर बहुत परेशान किया जा रहा है ।

महिला ने सरकार से भी मांग की है कि राकेश अहूजा को मेरे घर को तोड़ने से रोका जाए और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए ।

बरहाल महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाली सामाजिक संस्थाएं व सरकार आखिर ऐसे संवेदनशील मामलों में चुप्पी क्यों साध लेती है। महिला इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है और स्थानीय पुलिस है कि उसकी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में जयराम सरकार के महिला के अधिकारों के संरक्षण की बात बेमानी साबित हो रही है।

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