हिमाचल की वादियों का श्रृंगार है राजू की बांसुरी

प्रकृति के साथ खुद-ब-खुद जुड़ जाते हैं राजू की बांसुरी के स्वर, नदी की कल-कल ,मोनाल की पुकार चरवाहोंं की चरानीयों का अभिमान है राजू की बांसुरी की तान

HNN News सोलन नाहन

हिमाचल के फोक में अगर राजू की बांसुरी की धुन ना हो तो वह फोक अधूरा माना जाता है। प्रदेश का कोई भी मंच बांसुरी के सुरों के जादूगर राजेंद्र कश्यप उर्फ राजू की धुनों के बगैर अधूरा है।

यह प्रदेश का बड़ा दुर्भाग्य कहा जाएगा कि सोलन जिला के कंडाघाट ब्लॉक के बड़ोग रहेड गांव से प्रदेश की वादियों में गूंजने वाले बांसुरी के सुर के स्वर को अभी तक कोई खोज नहीं पाया है।

जबकि फेसबुक पर राजू फ्लूटिस्ट्स के नाम से सुने जाने वाली बांसुरी की धुनों के चाहने वाले हजारों की तादाद में है। बामणा रा छोरा ,गंगी, मोहणा, कुंजू चंचला हो या फिर राग जोग राजू की बांसुरी से जब इन गीतों की स्वर लहरियां निकलती है तो पशु भी करना भूल जाते हैं प्रकृति अपने शृंगार रस पर अभिमान करने लगती है।

मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले राजेंद्र कश्यप उर्फ राजू सोलन में अपेक्स डायग्नोस्टिक सेंटर में नौकरी करते हैं। निजी सेक्टर की नौकरी में 24 घंटे की भी ड्यूटी देनी पड़ती है। बावजूद इसके राजू अपनी बांसुरी को बजाना नहीं भूलते हैं।

सोलंकी वादियों में राजू की बांसुरी साक्षात रुप से गूंजती है तो प्रदेश की वादियों में मोबाइल व इंटरनेट पर जगह-जगह सुनी जाती है। एचएनएन न्यूज ने इस नायाब हीरे को खोजते हुए जब इनकी खुद की बनाई धुनों को सुना तो हम भी हैरान रह गए।

यूं तो भारत देश में बांसुरी सम्राट हरिप्रसाद चौरसिया राकेश चौरसिया नंदलाल घोष राजेंद्र रोनू मजूमदार चेतन जोशी देबू चौधरी तथा महिला बांसुरी वादक रसिका शेखर का नाम ना केवल देश बल्कि पूरी दुनिया जानती है। मगर हिमाचल प्रदेश की प्रकृति के साथ बांसुरी के सुरों को जोड़ने वाले राजू की प्रतिभा भी इन से कम नहीं है।

हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि राजू ने बांसुरी बजाना किसी से नहीं सीखा था बल्कि जब वह खेतों में अपनी गाय व बकरियों को चराने जाता था तो पिता ने मेले में से एक बांसुरी लाकर दी थी उसी को बजा कर सीखा है।

तीसरी कक्षा से आज तक राजू खुद को बांसुरी में पारंगत नहीं कहता बल्कि उनका कहना है कि वह रोज बांसुरी सीखते हैं। आज कई लोग उनसे बांसुरी बजाना सीखते हैं। बड़ी बात तो यह है कि राजू का कहना है कि वह बांसुरी सिखाने की कोई फीस नहीं लेते हैं।

राजू का कहना है कि बांसुरी की अभिव्यक्त शक्ति अत्यंत विविधता पूर्ण है। उनका कहना है कि इससे लंबे ऊंचे चंचल तेज बा भारी प्रकारों के सूक्ष्म तथा भाविक मधुर संगीत को बजाएं जा सकता है।

आचार्य केशवानंद रतूड़ी का कहना है कि जब मैंने राजू की बांसुरी की धुन को नेगेटिव एनर्जी वाली जगह पर बजाया तो उस जगह की नकारात्मक ऊर्जा पॉजिटिव ऊर्जा में बदल गई थी।

उनका कहना है कि बांसुरी की धुन हो या घर में रखी बांसुरी यह पॉजिटिव एनर्जी का एक बड़ा स्रोत होती है। और फिर यदि शुरू में बजी हुई कोई धुन हो तो उसका तो कहना ही क्या है। फेसबुक पर राजीव की बांसुरी का हर कोई मुरीद है। अपने व्यस्ततम समय में से समय निकालकर राजू ने अपनी बांसुरी के स्वरों को सुरों को कभी धीमे नहीं पड़ने दिया है।