राजस्थान में हुई राष्ट्रीय जल सम्मेलन में उप-मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की मांग
राजस्थान के उदयपुर में 18 और 19 फरवरी को आयोजित दूसरे ऑल इंडिया स्टेट वाटर मिनिस्टर्स कॉन्फ्रेंस में हिमाचल प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने पहाड़ी राज्यों के लिए अलग और प्रभावी जल नीति की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र के जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं, जिससे पानी की कमी बढ़ती जा रही है। इस संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार को पहाड़ी राज्यों के लिए विशेष सहयोग और अनुदान की नीति बनानी चाहिए।
बदलते मौसम चक्र से घटते जल स्रोतों पर चिंता
उप-मुख्यमंत्री ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण असमय बारिश और कम बर्फबारी से जल स्रोतों का जल स्तर लगातार घटता जा रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हिमालयी ग्लेशियर प्रति दशक 20-30 मीटर की दर से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों के प्रवाह में अस्थिरता आ रही है और जल संकट गहराता जा रहा है। इससे न केवल पेयजल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है, बल्कि सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन भी संकट में आ रहे हैं।
पारंपरिक और आधुनिक उपायों को एक साथ अपनाने की जरूरत
मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि जल संरक्षण के लिए हमें पारंपरिक उपायों को संरक्षित करते हुए आधुनिक तकनीकों और नवाचारों को अपनाना होगा। पहाड़ी क्षेत्रों में जल स्रोतों की पुनर्भरण संरचनाओं और वर्षा जल संग्रहण को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए पहाड़ी राज्यों को विशेष वित्तीय सहायता दी जाए।
जल जीवन मिशन के तहत लंबित योजनाओं के लिए विशेष फंड की मांग
उप-मुख्यमंत्री ने सम्मेलन में यह भी उठाया कि हिमाचल प्रदेश का 65% हिस्सा वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिससे राज्य की विकास परियोजनाओं के लिए भूमि की उपलब्धता सीमित हो जाती है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश का जल, पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान है, और इसी आधार पर राज्य को विशेष वित्तीय पैकेज दिया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत करीब 1000 पेयजल योजनाएं अधूरी पड़ी हैं, जिनके लिए 2000 करोड़ रुपये की जरूरत है। उन्होंने केंद्र सरकार से उच्च पर्वतीय इलाकों के लिए एक विशेष वित्तीय सहायता योजना (फंडिंग विंडो) बनाने का प्रस्ताव भी रखा, जिससे किन्नौर, लाहौल-स्पीति और चंबा के दूरस्थ क्षेत्रों में एंटी-फ्रीज जल आपूर्ति योजनाओं का निर्माण किया जा सके। इन योजनाओं के तहत इन्सुलेटेड पाइपलाइन, हीटेड टैप सिस्टम और सौर-चालित पंप जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
सिंचाई योजनाओं और ग्रामीण जल संकट पर भी चिंता
मुकेश अग्निहोत्री ने बताया कि हिमाचल की 90% ग्रामीण आबादी कृषि, बागवानी और सब्जी उत्पादन पर निर्भर है। ऐसे में जल संकट से उनकी आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत लंबित सिंचाई परियोजनाओं को जल्द मंजूरी देने की मांग की। साथ ही, सूखे और खराब पड़े करीब 2000 हैंडपंप और ट्यूबवेल के पुनर्भरण के लिए 1269.29 करोड़ रुपये की परियोजना के लिए वित्त पोषण की आवश्यकता बताई।
शहरीकरण के कारण बढ़ रही जल संकट की समस्या
उप-मुख्यमंत्री ने तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण जल आपूर्ति और स्वच्छता की गंभीर चुनौतियों पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन और अमृत योजना के तहत अभी तक उपनगरीय इलाकों की जरूरतें पूरी तरह से नहीं हो पाई हैं। इन क्षेत्रों के लिए अलग से मानदंड तैयार करने और वित्तीय सहायता बढ़ाने की जरूरत है।
हिमाचल को जल-सुरक्षित बनाने के लिए केंद्र से सहयोग की अपील
मुकेश अग्निहोत्री ने सम्मेलन में कहा कि हिमाचल प्रदेश ‘इंडिया-2047 – जल सुरक्षित राष्ट्र’ के संकल्प को पूरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए विशेष अनुदान और लचीली नीतियों की व्यवस्था की जाए, ताकि जल संरक्षण और प्रबंधन को मजबूत किया जा सके।

