पांच वर्षों से पारंपरिक लोकसंगीत के संरक्षण में जुटे युवा कलाकार, मंच से अकादमिक दुनिया तक बना रहे पहचान
हिमाचल नाऊ न्यूज – राजगढ़
तेजी से बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में जब लोकसंगीत आधुनिक धुनों की भीड़ में पीछे छूटता नजर आ रहा है, ऐसे समय में सिरमौर की पारंपरिक संस्कृति को सहेजने का जिम्मा एक युवा कलाकार ने अपने कंधों पर उठा लिया है।
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राजगढ़ क्षेत्र से जुड़े राजेश धाल्टा आज सिरमौर के उन चुनिंदा कलाकारों में शुमार हो चुके हैं, जो लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन को एक सतत सांस्कृतिक अभियान का रूप दे रहे हैं।
सांस्कृतिक मंचों पर राजेश धाल्टा की सुरीली आवाज जब गूंजती है, तो श्रोता सिर्फ गीत नहीं सुनते, बल्कि सिरमौर की मिट्टी, उसकी लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुति के दौरान बार-बार ‘वनसमोर’ की मांग सुनाई देती है।
राजेश बीते करीब पांच वर्षों से सिरमौर जिले के पारंपरिक लोकगीतों की खोज, संकलन और मंचीय प्रस्तुति में सक्रिय हैं। उनका उद्देश्य मनोरंजन से आगे बढ़कर उन लोकगीतों को संरक्षित करना है, जो समय के साथ विलुप्त होने की कगार पर हैं।
वे मानते हैं कि लोकगीत किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान होते हैं और इन्हें बचाना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है।
राजेश धाल्टा आकाशवाणी और दूरदर्शन शिमला से अनुमोदित कलाकार हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, जिला और ग्रामीण स्तर के मेलों में अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से सिरमौर की लोकसंस्कृति को व्यापक मंच दिया है।
कम उम्र में ही उन्हें देश के विभिन्न राज्यों में सिरमौर की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करने के अवसर मिले, जिससे जिले की सांस्कृतिक पहचान को प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार मिला।
राजेश मूल रूप से राजगढ़ से सटे कन्हैच गांव के निवासी हैं। संगीत उन्हें पारिवारिक विरासत में मिला है। उनके पिता सोहनलाल धाल्टा उच्च कोटि के बांसुरी और शहनाई वादक हैं, जबकि उनके चाचा विद्यादत्त धाल्टा ऑलराउंड कलाकार के रूप में पहचाने जाते हैं।
ऐसे सांस्कृतिक वातावरण में पले-बढ़े राजेश के लिए संगीत जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया।
राजेश की प्रारंभिक शिक्षा मडियाघाट स्कूल में हुई। बचपन से ही वे पाठशाला स्तर की सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे और लगातार प्रथम स्थान हासिल करते रहे।
पुरस्कारों से भरा उनका घर उनकी लगन और निरंतर अभ्यास की कहानी कहता है।
उन्होंने राजगढ़ महाविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की, जहां प्रो. डॉ. सविता सहगल के मार्गदर्शन में संगीत की औपचारिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर उन्होंने अपनी शैक्षणिक यात्रा को भी मजबूती दी।
राजेश धाल्टा का सपना केवल मंच तक सीमित नहीं है। वे संगीत विषय में प्रोफेसर बनकर लोकसंगीत को अकादमिक पहचान दिलाना चाहते हैं। इसके लिए वे निरंतर मेहनत कर रहे हैं और संगीत में पीएचडी करना उनका दीर्घकालीन लक्ष्य है। उनका मानना है कि लोकसंगीत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए बिना उसका स्थायी संरक्षण संभव नहीं है।
राजेश अपने पिता सोहनलाल और चाचा विद्यादत्त धाल्टा के साथ युगलवंदी में कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं। इसके साथ-साथ वे हारमोनियम, ढोलक, तबला और गिटार जैसे वाद्य यंत्रों में भी दक्षता रखते हैं।
सोहनलाल धाल्टा द्वारा स्थापित ‘धाल्टा कला मंच’ के तहत एक पहाड़ी बैंड भी सक्रिय है, जिसमें परिवार से जुड़े कलाकारों की प्रमुख भागीदारी है। इस बैंड की मांग सिरमौर के साथ-साथ सोलन और शिमला जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी लगातार बढ़ रही है, जिससे स्थानीय कलाकारों को मंच और रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
लोकगीतों के माध्यम से संस्कृति को संजोने की राजेश धाल्टा की यह साधना आज नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनती जा रही है। उनका यह प्रयास साबित करता है कि परंपरा और आधुनिकता के संतुलन से ही सांस्कृतिक विकास संभव है।
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