HNN/नाहन
रश्मि प्रकाशन की ओर से नाहन में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें भाषा एवं संस्कृति विभाग से सेवानिवृत्त सहायक निदेशक भाषा गोपाल दिलैक ने मुख्यातिथि के रूप में शिरकत की। जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता राम कुमार सैनी और मंच का संचालन श्रीकांत अकेला ने किया। इसमें रश्मि प्रकाशन के संपादक व साहित्यकार दीन दयाल वर्मा विशेष रूप से मौजूद रहे।
कवि सम्मेलन का आगाज अनुदीप भारद्वाज ने तुम मनु, मैं स्मृति, तुम स्वप्र, मैं आकृति.., सरला गौतम ने मैने बड़े प्यार से अपने सारे अरमान.., विजय रानी बंसल ने नये अंदाज में दुनिया बसाने चली हूं.., कविता सुनाकर किया। पंकज तन्हा ने मुमकिन नहीं वो देखे और न दिल में दर्द उट्ठे, कमबख्त आंखों से देखता नहीं, वो तीर चलाता है.., कविता पेश की।
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अर्चना आतिश ने ढूंढ आयी फलक से जमीं हर जगह, न मिली शय मुझे बस खुशी है जहां.., गजल से दाद पाई। डा. श्रीकांत अकेला ने आइना जब भी दिखाया जाये, अपनी जानिब घुमाया जाए.., और दीप चंद कौशल ने गुरू चरणों की सेवा की, क्यों न पांवटा करे तरक्की.., गीत सुनाकर रंग जमाया। राम कुमार सैनी ने वक्त के हाथों टूट गए और बिखर गए जो.., और डा. दीन दयाल वर्मा ने हवन से कब अब वर्षा होती है.., से दाद पाई।
सैनवाला से आए कवि चिरआनंद ने माना की उलझनों से भरी है ये जिंदगी, है फिर भी नारियल सी गरी है ये जिंदगी.., से दाद पाई। डा. ईश्वर राही ने प्राण प्रतिष्ठा के इस अद्भुत प्रपंच से, मेरे रामलला हो ही जाते पुन: संजीव, तो जरूर कहते नहीं लगती मुझे ठंड, नहीं चाहिए तुम्हारा ये आलीशान घर, नहीं चाहिए तुम्हारे छप्पन भोग.., कविता से पाखंडवाद पर जमकर चोट की। इस अवसर पर मुख्यातिथि गोपाल दिलैक, मीरा वर्मा समेत अन्य मौजूद रहे।
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