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विधानसभा शून्यकाल में अजय सोलंकी ने उठाया यमुनानगर वन भूमि लीज मामला

Shailesh Saini 30 Mar 2026 Edited 30 Mar 1 min read

80 करोड़ से अधिक कीमत वाली जमीन को 4 करोड़ में छोड़े जाने का आरोप, पूर्व सरकार के फैसले पर उठे सवाल

हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन/शिमला

हरियाणा के यमुनानगर में हिमाचल प्रदेश वन विभाग की बहुमूल्य भूमि लीज का मामला सोमवार को विधानसभा शून्यकाल में गूंज उठा। नाहन विधानसभा क्षेत्र के विधायक अजय सोलंकी ने यह मुद्दा उठाते हुए पूर्व भाजपा सरकार के एक निर्णय पर गंभीर सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि प्रदेश की करोड़ों रुपये मूल्य की संपदा को चुनावों से ठीक पहले बेहद कम राशि पर छोड़ दिया गया।

विधायक अजय सोलंकी ने सदन में कहा कि यमुनानगर में हिमाचल प्रदेश वन विभाग के पास करीब 10 बीघा 6 बिस्वा भूमि लीज पर उपलब्ध थी। आरोप है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तत्कालीन सरकार ने एक कैबिनेट निर्णय के माध्यम से इस लीज व्यवस्था को समाप्त करते हुए जमीन को मूल निजी भूस्वामी को वापस करने का फैसला लिया। उन्होंने इस फैसले को गंभीर वित्तीय और नीतिगत प्रश्नों से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि जिस समय यह निर्णय लिया गया, उस दौरान उक्त भूमि की बाजार कीमत 80 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही थी।

सदन में उठाए गए आरोपों के अनुसार, इतनी बहुमूल्य भूमि को वापस लेने के एवज में सरकार को केवल करीब 4 करोड़ रुपये के आसपास की राशि मिली। विधायक ने कहा कि यह राशि जमीन के वास्तविक मूल्य की तुलना में बेहद कम थी और इस फैसले से सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लीज समाप्त होने के तुरंत बाद संबंधित भूमि स्वामी ने इस जमीन को भारी मुनाफे के साथ किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया, जिससे पूरे मामले पर और गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

विधानसभा में मामला उठने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। यह मामला केवल एक जमीन के लेन-देन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सरकारी संपत्ति के संरक्षण, निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और सार्वजनिक हित से जुड़ा संवेदनशील विषय माना जा रहा है। यह भी सवाल उठ रहे हैं कि चुनावों से ठीक पहले इतनी महत्वपूर्ण संपत्ति से जुड़ा फैसला किन परिस्थितियों में लिया गया और क्या उस समय सरकारी हितों की पर्याप्त रक्षा की गई थी या नहीं।

मामले ने नया मोड़ उस समय लिया जब वर्ष 2022 के अंत में सत्ता परिवर्तन के बाद वर्तमान सरकार ने इस निर्णय की गंभीरता को देखते हुए पूर्व सरकार के उस फैसले को रीवोक यानी निरस्त कर दिया। इससे यह संकेत गया कि सरकार ने इस पूरे प्रकरण में संभावित अनियमितताओं और वित्तीय हानि की आशंका को गंभीरता से लिया है। अब यह मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक परीक्षण का विषय भी बन चुका है।

सूत्रों के अनुसार अब इस पूरे प्रकरण में यह भी जांच का विषय है कि क्या लीज समाप्त करने का निर्णय सभी आवश्यक प्रक्रियाओं, विधिक सलाह और वित्तीय हितों को ध्यान में रखकर लिया गया था, या फिर इसमें जल्दबाजी और पक्षपात के तत्व मौजूद थे। यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो यह मामला प्रदेश की सरकारी संपदा के प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े कर सकता है।

पांवटा साहिब वन मंडल के डीएफओ वेद प्रकाश शर्मा ने खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि यह मामला वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है और फिलहाल लिटिगेशन प्रक्रिया से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि मामले की अंतिम स्थिति अब न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

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