सिरमौर प्रेस क्लब चुनाव पर बढ़ा विवाद, प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी

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फर्जी पत्रकारों की मौजूदगी पर उठे सवाल, निवर्तमान अध्यक्ष ने जताई नाराजगी

निर्देशों की अनदेखी कर हुआ चुनाव
सिरमौर प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। शनिवार को एसडीएम नाहन द्वारा जारी निर्देशों को दरकिनार करते हुए कुछ तथाकथित पत्रकारों के समूह ने अवैध रूप से चुनाव संपन्न करवा दिया। इस चुनाव में बाहरी पत्रकारों की संलिप्तता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे इसकी पारदर्शिता पर संदेह बढ़ गया है।

सर्वसम्मति से चुनी कार्यकारिणी संदेह के घेरे में
सूत्रों के अनुसार, अध्यक्ष पद के लिए राकेश नंदन और महासचिव पद के लिए प्रताप सिंह ने नामांकन दाखिल किया था। बावजूद इसके, सर्वसम्मति से कार्यकारिणी चुने जाने का दावा किया गया, जिससे चुनाव प्रक्रिया को लेकर असंतोष उत्पन्न हो गया है। खासतौर पर ऐसे समय में जब राज्य में फर्जी पत्रकारों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, इस प्रकार की गतिविधियां प्रशासन के लिए भी चुनौती बनी हुई हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या ठोस कार्रवाई की जाती है।

फर्जी पत्रकारों की बढ़ती संख्या बनी समस्या
सिरमौर में फर्जी पत्रकारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लोगों ने अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र का दुरुपयोग किया है, जिससे वास्तविक पत्रकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

निवर्तमान अध्यक्ष ने जताई कड़ी आपत्ति
निवर्तमान अध्यक्ष शैलेंद्र कालरा ने इस घटनाक्रम पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि सिर्फ सोशल मीडिया पेज बनाकर कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर रहा है। एसडीएम के निर्देशों की अवहेलना से स्पष्ट होता है कि निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए नियमों को ताक पर रख दिया गया है।

योग्यता के बिना पत्रकार बनने वालों की बढ़ती संख्या
शैलेंद्र कालरा ने आगे कहा कि फर्जी पत्रकारों के इस समूह में 80 प्रतिशत ऐसे लोग शामिल हैं, जिनके पास न कोई डिग्री है, न कोई पत्रकारिता का डिप्लोमा। कुछ ऐसे भी हैं जो वर्षों पहले मीडिया संस्थानों से अलग हो चुके हैं, लेकिन अब भी पत्रकार का टैग लगाकर अधिकारियों को गुमराह कर रहे हैं।

प्रशासनिक आदेशों की खुली अवहेलना
शनिवार को प्रशासन द्वारा दिए गए आदेशों की पूरी तरह अनदेखी की गई। प्रशासन ने जांच के लिए एक माह का समय दिया था, लेकिन इस तथाकथित फर्जी समूह ने जल्दबाजी में अपनी कार्यकारिणी घोषित कर प्रशासन की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा कर दिया।