हिमाचल प्रदेश, जहां की संस्कृति और पारंपरिक वस्त्रों की पहचान पूरे देश में है, वहीं अब इस राज्य की ग्रामीण इलाकों की कला विदेशों तक पहुंचाई जा रही है। कुल्लू के नगर में स्थित “कुल्लवी व्हिम्स” नामक संस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। यहां पर, ग्रामीण महिलाओं के साथ मिलकर पारंपरिक देसी ऊन पर कार्य किया जा रहा है, जिससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, बल्कि एक प्राचीन कला को भी नई पहचान मिल रही है।
देसी ऊन पर काम और रोजगार के अवसर
कुल्लवी व्हिम्स के संस्थापक भृगु आचार्य के अनुसार, उनकी संस्था केवल स्थानीय देसी ऊन पर काम करती है, जो यहां के गद्दी समुदाय से खरीदी जाती है। गद्दी समुदाय के भेड़ पालक अपने ऊन को इस संस्था को बेचते हैं, जिससे उन्हें अच्छे दाम मिलते हैं और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। देसी ऊन से तैयार कपड़ों का उत्पादन स्थानीय स्तर पर ही किया जाता है, और इसे बेहतरीन गुणवत्ता का मानकर विदेशों में भी भेजा जाता है।
भृगु आचार्य बताते हैं, “हम सिर्फ लोकल बुले (भेड़) से काम करते हैं, जो यहां का इंडिजिनस बुल है। हम इस पूरी प्रक्रिया को अपने स्टूडियो में करते हैं। हमारा उद्देश्य यह है कि हमारे बनाए गए सामान को यहां के लोग ही बनाएं और इसी स्थानीय ऊन से उत्पाद तैयार करें ताकि यहां के लोग ज्यादा से ज्यादा रोजगार प्राप्त कर सकें।”
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प्राकृतिक रंगों का उपयोग
इस संस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू है प्राकृतिक रंगों का उपयोग। भृगु आचार्य की टीम बारी-बारी से प्राकृतिक सामग्री जैसे लतरी, शंबल, प्याज के छिलके, और अन्य जड़ी-बूटियों से रंग तैयार करती है। इन रंगों का उपयोग ऊन के रंगाई में किया जाता है, जिससे उत्पाद और भी प्राकृतिक और आकर्षक बनते हैं। इस प्रक्रिया में स्थानीय महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है, जो नेचुरल डाई तैयार करती हैं।
गद्दी समुदाय और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार
कुल्लवी व्हिम्स संस्था के काम से गद्दी समुदाय के भेड़ पालकों को अच्छे दाम मिल रहे हैं, और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। 14-15 वर्षों से संस्था के साथ जुड़ी एक महिला बताती हैं, “हमारे गांव की कई महिलाएं यहां काम कर रही हैं और ऊन की कताई का काम कर रही हैं। इससे न केवल हमें रोजगार मिलता है, बल्कि पुरानी कला को भी संरक्षित किया जा रहा है।”
ग्रामीण महिलाएं न केवल ऊन की कताई करती हैं, बल्कि प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके कपड़ों का उत्पादन भी करती हैं। इस प्रक्रिया में बुजुर्ग महिलाएं भी सक्रिय रूप से शामिल होती हैं, जिससे उनकी भी सामाजिक भागीदारी बढ़ रही है। संस्था ने 11 गांवों की 370 महिलाओं को रोजगार दिया है, और इस प्रक्रिया से वे अपनी आजीविका चला रही हैं।
संस्था के प्रयासों की सराहना
कुल्लवी व्हिम्स के प्रयास न केवल रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को बचाए रखने में भी मदद कर रहे हैं। यदि सरकार और प्रशासन इस संस्था को और अधिक सहयोग प्रदान करें, तो यह संस्था बड़े स्तर पर कुल्लू की देसी ऊन का उत्पादन कर सकती है और अधिक महिलाओं और गद्दी युवाओं को रोजगार दे सकती है।
कुल्लवी व्हिम्स संस्था ने हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक कला को बचाने और उसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके द्वारा किए गए प्रयासों से न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है, बल्कि इसने पुराने शिल्प और कला को एक नई पहचान भी दी है। यदि इस संस्था को और समर्थन मिलता है, तो यह न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकती है।
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