Category: Rajghar

  • ठौड निवाड़ के गुरु इतवार नाथ जी मंदिर में भैयादूज मेला संपन्न

    ठौड निवाड़ के गुरु इतवार नाथ जी मंदिर में भैयादूज मेला संपन्न

    HNN/ राजगढ़

    राजगढ़ के समीप ठौड़ निवाड़ स्थित गुरू इतवार नाथ मठ पर भैयादूज पर्व पर अतीत से मनाया जाने वाला तीन दिवसीय धार्मिक मेला बीते कल सांय धूमधाम के साथ संपन्न हो गया, जिसमें सिरमौर के अतिरिक्त ठियोग के बलसन क्षेत्र से आए हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं ने गुरू इतवार नाथ के मठ पर शीश नवाकर आर्शिवाद प्राप्त किया। समापन समारोह की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी शिमला अनिल हारटा ने की। उन्होने कबड्डी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली सराहां टीम को मेला समिति की ओर से 11 हजार व ट्राफी व उप विजेता टीम आईटीआई राजगढ़ को पांच हजार रूपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया।

    बता दें कि करीब 800 वर्ष पुराना इतिहास समेटे गुरु इतवार नाथ जी का यह मठ नाथ समुदाय के 84 सिद्धों में से एक है। इस वर्ष भी भैया दूज को गुरु इतवारनाथ जी की पूजा अर्चना हवन के साथ मेले के शुभारम्भ के अवसर पर स्थानीय लोगो द्वारा गिरी नदी में गुरु इतवार नाथ जी की समाधि स्थल तक ढोल नगाडे बजाकर शोभा यात्रा भी निकाली गयी जिसमे सैंकड़ों लोगो ने भाग लिया। स्थानीय पंचायत प्रधान व कमेटी अध्यक्ष सचिन मेहता ने बताया कि थोड निवाड में 800 वर्ष पुराना गौरवशाली इतिहास समेटे यह पुरातन मंदिर काष्ठ कला का अनुपम उदाहरण है। गिरी नदी में गुरु इतवार नाथ जी की समाधि और मठ में सदियों से जल रहे अखंड धूना व गद्दी में असंख्य लोगो की अगाघ श्रद्धा है।

    मंदिर में लकड़ी पर की गई अद्भुत नक्काशी आगंतुकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है। वर्तमान में मठ में पूजा सबंधी कार्य मंहत भूपेन्द्र गिरी द्वारा किया जा रहा है। गौरतलब है कि मंदिर के अस्तित्व में आने बारे कोई पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है। जनश्रुति के अनुसार, कालांतर में गुरू इतवार नाथ दक्षिण की ओर से भ्रमण करते हुए गिरी पार सरसू-महलाणा पहूंचे। जहां पर गुरू जी ने हल जोत रहे दो किसानों से धूना प्रज्ज्वलित करने का आदेश दिया। क्षेत्र में लकड़ी का अभाव होने के कारण किसानों ने अपने हल जुंगड़ा काट कर गुरूजी को धूना लगा दिया।

    जिस पर गुरूजी ने प्रसन्न होकर सरसू माहलाना में जंगल उगने का वरदान दिया गया जोकि आज भी गुरूजी के नाम से वन विख्यात है। तपस्या के लिए उचित स्थान की तलाश में गुरूजी भ्रमण करते हुए ठौड़ पहुंचे। जहां पर उन्होने जमीन में अपनी लाठी गाड़ दी और स्वयं तपस्या में लीन हो गए। तपस्या टूटते ही गुरूजी ने देखा कि लाठी पर कोपलें निकल आई है और एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया जिसे गुरूजी का बड़ोटा अर्थात वट वृक्ष का नाम दे दिया जोकि मंदिर परिसर में आज भी मौजूद है।

    बताते हैं कि गुरूजी की दृष्टि एक अधेड़ उम्र की महिला पर पड़ी जो गिरी नदी से पानी ला रही थी। गुरूजी ने महिला से पीने के लिए पानी मांगा। महिला ने कहा कि यदि तुझ में इतनी शक्ति है तो पानी स्वयं निकाल ले। गुरूजी ने जमीन में चिमटा गाड़ा और निर्मल पानी की धार फूट पड़ी जोकि आज भी विद्यमान है। वह ठौड़ में धूना लगाकर तपस्या करने लग गए। यह धूना पिछले आठ सौ वर्षों से अखंड रूप में जल रहा है। उन्होने बताया कि जो लोग इस मंदिर में सच्चे दिल से अपनी प्रार्थना करते है उसकी प्रार्थना गुरु इतवार नाथ जी जरुर पूर्ण करते है।

  • शिरगुल की जन्मस्थली शाया में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

    शिरगुल की जन्मस्थली शाया में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

    HNN / राजगढ़ 

    दीपावली के पावन पर्व पर शिरगुल देवता की जन्मस्थली शाया में हजारों श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य देव के दर्शन करके आर्शिवाद प्राप्त किया। गौर रहे है कि दीपावली और पड़वा के पावन पर्व पर कालांतर से शिरगुल देवता का आर्शिवाद व दर्शन करने की परंपरा है जिसमें सिरमौर के अतिरिक्त शिमला व सोलन के हजारों की संख्या में श्रद्धालु आकर शिरगुल देवता का आर्शिवाद प्राप्त करते हैं जबकि इस मेले में देव दर्शन के अतिरिक्त श्रद्धालुओं कें मंनोरंजन की कोई गतिविधियां नहीं होती है।

    बता दें कि सूर्य ग्रहण के चलते इस बार पडे़ई अथवा गोवर्धन पूजा के दिन मंदिर बंद रहा जबकि दीपावली व भैयादूज को मंदिर में असंख्य श्रद्धालुओं ने देव दर्शन कर पुण्य कमाया। इस मौके पर मंदिर समिति द्वारा शिरगुल देव की चिंतन स्थली में भंडारे का भी आयोजन किया गया। गौरतलब है कि भगवान शिव के अंशावतार शिरगुल का प्रादुर्भाव लगभग एक हजार पूर्व शाया की पावन धरा पर इस क्षेत्र के शासक राजा भूखड़ू के घर में हुआ था।

    बचपन में माता-पिता के निधन के उपरांत शिरगुल और उनके भाई चंद्रेश्वर अपने मामा के घर मनौण में रहने लगे। एक दिन शिरगुल देव और चंद्रेश्वर फागू में एक खेत मे पशु चरा रहे थे और साथ ही कुछ हलधर खेत में लगा रहे थे। शिरगुल की मामी हलधर के लिए भोजन लेकर आई और साथ में शिरगुल और चंदेश्वर के लिए सतू के पिंड बनाकर लाई जिसमें मक्खी एवं अन्य कीट मिलाए हुए थे। उन्होने सतू के पिंड खाने से मना कर दिया और मामी की प्रताड़ना से तंग आकर शिरगुल ने फागू खेत में पैर मारकर पानी की धार निकाली और जल ग्रहण करके स्वयं चूड़धार के लिए रवाना हुए थे।

    फागू के खेत में शिरगुल द्वारा अपने तप से निकाली पानी की धार आज भी विद्यमान है और इस जल को गंगा के समान पवित्र माना जाना है। चूड़धार में कठिन तपस्या करने के उपरांत शिरगुल देव सूत के व्यापारी बनकर दिल्ली गए, जहां पर उनका युद्ध मुगल शासकों के साथ हुआ । मुगल सेना के सिपाहियों द्वारा शिरगुल की दैविक शक्ति को क्षीण करने के उद्देश्य से उन पर कच्चे चमड़े की बेड़ियां लगाई और शिरगुल को कैद कर दिया गया। कारागार में शिरगुल को कैद से मुक्त करवाने में भंगायणी नामक महिला, जोकि इस कारागार में सफाई का कार्य करती थी ने बहुत सहायता की।

    भंगायणी माता ने राजस्थान के राणा गोगा जाहर वीर को संदेश पहुंचाया और गोगा ने शिरगुल को कैंद से मुक्त करवाया। शिरगुल ने भंगायणी को अपनी धर्म बहन बनाकर वापिस साथ लाए और उसे हरिपुरधार में बसा दिया जहां पर वर्तमान में भंगायणी माता का भव्य मंदिर है। शिरगुल देव स्वयं चूड़धार पहुंचे और उन्होंने घोर तपस्या करने के उपरांत वही बैंकुण्ठ को चले गए। चूड़धार में शिरगुल द्वारा स्थापित शिवलिंग वर्तमान में श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जहां पर हर वर्ष लाखों की तादाद में श्रद्धालु कठिन चढ़ाई चढ़कर चूड़धार पर्वत पर पहुंचकर शिरगुल मंदिर में दर्शन करते हैं।

    शिरगुल मंदिर शाया के एक महान भक्त एक साहित्यकार शेरजंग चौहान ने बताया कि सिरमौर, शिमला और सोलन जिला के नौ क्षेत्रों के लोगों के शिरगुल देवता इष्ट है जिन्हे नोतबीन कहा जाता है। इन क्षेत्रों के लोग वर्ष में पड़ने वाले चार बड़े साजे के अवसर पर शिरगुल देवता के दर्शन को आते है और यदि कोई परिवार चार साजे में किसी कारण से न आ सके तो दिवाली के अगले दिन पड़वा को अवश्य आते है। बताते है पड़वा को देव दर्शन करने से चार साजे का फल मिलता है।