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  • अपनी ही पंचायतों में कमजोर पड़े भाजपा के नारायण सिंह

    अपनी ही पंचायतों में कमजोर पड़े भाजपा के नारायण सिंह

    सवर्ण मोर्चा और आम आदमी पार्टी कांग्रेस से ज्यादा बिगाड़ेंगी भाजपा के समीकरण

    HNN / श्री रेणुका जी

    श्री रेणुका जी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग को भेद पाना भाजपा के लिए और ज्यादा मुश्किल हो गया है। भाजपा द्वारा तीन-तीन दिग्गजों को हाशिए पर रख मैदान में उतारे गए नारायण सिंह अपनी ही पंचायतों में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। नारायण की गृह पंचायत काकोग, माईना, रजाना की अगर बात की जाए तो इन पंचायतों में करीब दो से ढाई हजार के बीच वोटर्स हैं। कांग्रेस के प्रत्याशी रहे विनय कुमार को पिछले इलेक्शन में इन पंचायतों से करीब 1000 मतों की बढ़त मिली थी।

    इसकी बड़ी वजह यह भी मानी जा सकती है कि यह क्षेत्र एससी बाहुल है। यही नहीं, आसपास की कई पंचायतों में एससी वोटर्स की संख्या ज्यादा है। यह वर्ग हाटी को कथित एसटी का दर्जा दिए जाने पर काफी नाराज चला हुआ है। असल में गिरीपार जनजातीय क्षेत्र की मांग को लेकर बनाया गया संगठन जिसे हाटी नाम दिया गया था वह गैर राजनीतिक था। मगर बगैर नोटिफिकेशन के केंद्र सरकार द्वारा हाटी को एसटी का दर्जा देने की घोषणा के बाद इसका राजनीतिकरण हो गया। अब भाजपा के प्रत्याशियों के साथ इन क्षेत्रों में कथित हाटी साथ घूम रहे हैं।

    मगर यह वाले हाटी अब अलग-थलग माने जा रहे हैं। यानी क्षेत्र की जनता ने इन पर भाजपाई होने का आरोप भी जड़ दिया है। यह पूरा फैक्टर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ जा रहा है। अब यदि बात की जाए इस विधानसभा क्षेत्र में दो नए चेहरे भी मैदान में उतरे हैं। जिनमें आम आदमी पार्टी से सेवानिवृत्त कर्नल राम कृष्ण है। तो वही, सवर्ण मोर्चा से चाढना के रहने वाले जगमोहन उम्मीदवार है। यानी जो सवर्ण मोर्चा हाटी को लेकर भाजपा को समर्थन दे रहा था उस वोट बैंक में सेंधमारी हो गई है। राजपूत और सवर्ण वर्ग जिसमें कुछ ब्राह्मण भी शामिल है वह सवर्ण मोर्चा को सपोर्ट करेंगे।

    आम आदमी और सवर्ण मोर्चा दोनों कांग्रेस और बीजेपी दोनों के प्रत्याशियों को नुक्सान पहुंचा रहे हैं। मगर इसका असली असर भाजपा प्रत्याशी पर पड़ने वाला है। एक बात तय है कि जो हाल ही में शुक्रवार को प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप आदि के द्वारा जो एकजुटता का पाठ पढ़ाया गया है उसका असर भी कुछ खास नहीं पड़ा है। हालांकि बीते कल मुख्यमंत्री सहित संजय टंडन आदि ने दावेदारी में रहे प्रत्याशियों से बातचीत भी करी थी। इस बातचीत का असर यह हुआ कि जहां पूर्व में प्रत्याशी रहे बलबीर चौहान आजाद उम्मीदवार मैदान में उतरने की तैयारी में थे , अब वह विड्रा कर चुके हैं।

    मगर एक बात इस विधानसभा क्षेत्र में ज्यादा सुनी जा रही है वह यह कि बलबीर को टिकट न दिए जाने को लेकर उनके गृह क्षेत्र के आसपास की कई पंचायतों में काफी रोष भी है। दूसरी, सबसे मजबूत दावेदारी पूर्व विधायक रूप सिंह की थी। वही, रूप सिंह और बलबीर, अरुण को लेकर सहमत भी हो चुके थे। मगर ऐन वक्त पर नारायण सिंह का एंटर होना बहुत से भाजपाइयों को अखर गया है। इस क्षेत्र के एससी वर्ग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनके अधिकारों को छीनने वाली सरकार के साथ वह बिल्कुल नहीं जाएंगे। वही बता दें कि हरिपुरधार क्षेत्र के कुछ खास बड़े भाजपाई चेहरों ने हटकर रणनीति भी तैयार की है।

    यह रणनीति भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थी। इन लोगों का कहना है कि चाहे कांग्रेस हो चाहे भाजपा दोनों ने इस ऊपरी क्षेत्र को कभी आगे नहीं आने दिया। इस क्षेत्र के भाजपाइयों को इस बार ऊपरी क्षेत्र के दो प्रमुख चेहरों पर बड़ी उम्मीदें भी थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भले ही नारायण सिंह कुछ युवा चेहरों को लुभा कर रण क्षेत्र में डटे हुए हैं, मगर जीत अभी भी उनसे कोसों दूर है। जिन लोगों के दम पर नारायण सिंह को टिकट हासिल करने में मदद मिली थी वह चेहरे खुद अपने चुनाव में अब पूरी तरह से उलझे हुए हैं। ऐसे में नारायण सिंह के पास एक सफल रणनीतिकार की भी बड़ी कमी बनी रहेगी।