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  • Kumbh Mela 2025: महाकुंभ स्नान के बाद करें ये दो कार्य, मिलेगा शुभ फल

    Kumbh Mela 2025: महाकुंभ स्नान के बाद करें ये दो कार्य, मिलेगा शुभ फल


    कुंभ स्नान के बाद क्या कार्य करना आवश्यक होता है, आइए जानते हैं।

    महाकुंभ का शुभारंभ पौष पूर्णिमा से हो चुका है। 13 जनवरी से शुरू हुआ महाकुंभ का पावन पर्व 26 फरवरी 2025 तक चलेगा। इस दौरान देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज में त्रिवेणी घाट पर अमृत स्नान करने पहुंचेंगे। महाकुंभ स्नान के बाद दो ऐसे कार्य हैं, जिन्हें करना बेहद शुभ माना जाता है और इन कार्यों को करने से महाकुंभ का शुभ फल प्राप्त होता है।

    महाकुंभ में पवित्र डुबकी लगाने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसका आध्यात्मिक उत्थान होता है। यही कारण है कि गहरे ध्यान में मग्न साधु-संत भी महाकुंभ में डुबकी लगाने जरूर पहुंचते हैं, जबकि आम लोग भी पुण्य की कामना के साथ इस स्नान में भाग लेते हैं।

    महाकुंभ में डुबकी लगाने के बाद करने वाले दो कार्य:

    1. मंदिर दर्शन और प्रसाद ग्रहण करें:
      महाकुंभ में डुबकी लगाने के बाद आपको प्रयागराज में स्थित किसी प्राचीन मंदिर के दर्शन जरूर करने चाहिए। आप लेटे हुए हनुमान जी, नागवासुकी या किसी अन्य धार्मिक और प्राचीन मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। इन मंदिरों के दर्शन के साथ ही वहां का प्रसाद भी ग्रहण करें। ऐसा करने से आपकी यात्रा पूरी होती है और देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
    2. दान करें:
      हिंदू धर्म में दान का विशेष महत्व है। महाकुंभ में डुबकी लगाने के बाद आपको यथासंभव दान जरूर करना चाहिए। यदि आप जरूरतमंदों को अन्नदान कर सकें तो यह अधिक पुण्यकारी माना जाता है। महाकुंभ स्नान के बाद दान करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि आपके पितृ भी प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही दान से पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन को सही दिशा मिलती है।

    अगर आप भी 2025 में महाकुंभ में स्नान करने जा रहे हैं, तो स्नान के बाद ऊपर बताए गए कार्यों को जरूर करें। इन कार्यों को करने से आपकी धार्मिक यात्रा पूरी होती है और आपको शुभ फल प्राप्त होते हैं।


  • महाकुंभ 2025 की शुरुआत: पौष पूर्णिमा से शुरू हुआ पावन पर्व, 14 जनवरी को होगा शाही स्नान

    महाकुंभ 2025 की शुरुआत: पौष पूर्णिमा से शुरू हुआ पावन पर्व, 14 जनवरी को होगा शाही स्नान

    प्रयागराज: हिंदू धर्म के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन महाकुंभ की शुरुआत 13 जनवरी, 2025 को पौष पूर्णिमा के अवसर पर हो चुकी है। श्रद्धालुओं में अपार उत्साह देखने को मिल रहा है, और यह पर्व उन्हें आध्यात्मिक शांति और पुण्य की प्राप्ति का आभास कराता है।

    महाकुंभ 13 जनवरी से 26 फरवरी तक चलेगा, जिसमें लाखों की संख्या में लोग शामिल होंगे।

    महाकुंभ का पहला शाही स्नान, जिसे अमृत स्नान भी कहा जाता है, 14 जनवरी को होगा। हिंदू धर्म के अनुसार, महाकुंभ में स्नान करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह पर्व श्रद्धालुओं के लिए केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक उन्नति का भी अवसर प्रदान करता है।

  • महाकुंभ 2025 / देहरादून से प्रयागराज के लिए वॉल्वो बसें, किराया और समय सरणी जानने की पढ़े पूरी खबर…..

    महाकुंभ 2025 / देहरादून से प्रयागराज के लिए वॉल्वो बसें, किराया और समय सरणी जानने की पढ़े पूरी खबर…..

    महाकुंभ 2025: देहरादून से प्रयागराज के लिए वॉल्वो बसें शुरू, किराया और समय जानें
    प्रयागराज में महाकुंभ 2025 की शुरुआत 13 जनवरी से होने जा रही है। इस भव्य आयोजन के लिए उत्तराखंड सरकार ने श्रद्धालुओं के लिए खास इंतजाम किए हैं। देहरादून से साधारण और वॉल्वो बस सेवाओं की शुरुआत की गई है, जो महाकुंभ में जाने वाले यात्रियों के सफर को सुगम बनाएंगी।

    देहरादून से प्रयागराज के लिए विशेष बस सेवाएं
    उत्तराखंड परिवहन निगम ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर दो विशेष बस सेवाएं शुरू की हैं। ये बसें देहरादून से हरिद्वार, लखनऊ और रायबरेली होते हुए प्रयागराज पहुंचेंगी। उत्तराखंड परिवहन निगम की प्रबंध निदेशक रीना जोशी ने आज इन बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

    बसों का समय और किराया
    दो बसों में एक साधारण बस है, जो रोजाना सुबह 10 बजे देहरादून से रवाना होगी। दूसरी बस सुपर डीलक्स वॉल्वो है, जो रोजाना शाम 5 बजे दून से चलेगी।

    • वॉल्वो बस किराया: देहरादून से प्रयागराज तक 2279 रुपये
    • साधारण बस किराया: 1160 रुपये प्रति यात्री

    वॉल्वो बस लगभग 16 घंटे में सफर पूरा करेगी, जबकि साधारण बस को 18-19 घंटे लगेंगे।

    महाकुंभ के महत्व और उत्तराखंड का योगदान
    महाकुंभ 2025 एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। उत्तराखंड सरकार ने श्रद्धालुओं की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए सीधी बस सेवाएं शुरू की हैं। इन बसों का मार्ग हरिद्वार, नजीबाबाद, मुरादाबाद, बरेली, लखनऊ और रायबरेली होते हुए तय किया गया है।

    यात्रा का अनुभव सुरक्षित और आरामदायक
    यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, प्रत्येक बस में दो-दो चालक नियुक्त किए गए हैं। साधारण बस सुबह 10 बजे देहरादून से चलेगी और अगले दिन सुबह 5 बजे तक प्रयागराज पहुंचेगी। वहीं, वॉल्वो बस शाम 5 बजे देहरादून से रवाना होकर अगले दिन सुबह 9 बजे प्रयागराज पहुंचेगी।

  • महाकुंभ 2025 / 13 जनवरी से प्रयागराज में शुरू होगा महोत्सव, शाही स्नान की पूरी जानकारी यहां पढ़ें

    महाकुंभ 2025 / 13 जनवरी से प्रयागराज में शुरू होगा महोत्सव, शाही स्नान की पूरी जानकारी यहां पढ़ें

    महाकुंभ का आयोजन भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का प्रमुख आयोजन है, जो लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। महाकुंभ 2025 का आयोजन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में होने जा रहा है। आइए जानते हैं महाकुंभ की शुरुआत की तिथि, मुख्य स्नान की तारीखें, और इसका धार्मिक महत्व।


    महाकुंभ 2025 की शुरुआत और अवधि

    महाकुंभ 2025 का आयोजन 13 जनवरी 2025 से शुरू होकर 26 फरवरी 2025 तक चलेगा। इस दौरान श्रद्धालु त्रिवेणी संगम (गंगा, यमुना, और सरस्वती) के पवित्र तट पर स्नान करेंगे।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाकुंभ में गंगा स्नान करना अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यकारी माना जाता है। हर बारह साल बाद आयोजित होने वाले इस महापर्व का प्रयागराज के संगम तट पर विशेष महत्व है।


    मुख्य स्नान तिथियां

    महाकुंभ के दौरान हर दिन स्नान का अपना महत्व होता है, लेकिन शाही स्नान की तिथियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती हैं। शाही स्नान के दिन साधु-संतों और अखाड़ों द्वारा भव्य जुलूस निकाले जाते हैं, जो कुंभ मेले का मुख्य आकर्षण बनते हैं।
    महाकुंभ 2025 के शाही स्नान की प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं:

    1. 13 जनवरी 2025 – पौष पूर्णिमा
    2. 14 जनवरी 2025 – मकर संक्रांति
    3. 29 जनवरी 2025 – मौनी अमावस्या
    4. 03 फरवरी 2025 – बसंत पंचमी
    5. 12 फरवरी 2025 – माघी पूर्णिमा
    6. 26 फरवरी 2025 – महाशिवरात्रि

    इन तिथियों पर संगम में स्नान करना विशेष पुण्यकारी माना गया है।


    शाही स्नान का महत्व

    महाकुंभ के दौरान शाही स्नान का महत्व अत्यधिक है। शाही स्नान के दिन साधु-संत अपने अनुयायियों के साथ भव्य जुलूस निकालते हुए संगम में स्नान करते हैं।

    • शाही स्नान को आध्यात्मिक रूप से शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम अवसर माना जाता है।
    • स्नान करने वाले श्रद्धालु साधु-संतों के पुण्य और आशीर्वाद का लाभ लेते हैं।

    महाकुंभ का धार्मिक महत्व

    महाकुंभ भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है, जो चार स्थानों पर बारी-बारी से होता है:

    1. प्रयागराज – संगम किनारे
    2. हरिद्वार – गंगा नदी के किनारे
    3. उज्जैन – शिप्रा नदी के तट पर
    4. नासिक – गोदावरी नदी के तट पर

    महाकुंभ में गंगा स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है। विशेष रूप से शाही स्नान के बाद स्नान करना अधिक पुण्यकारी माना गया है।


    महाकुंभ में स्नान करने के लाभ

    महाकुंभ में स्नान करने से:

    • पापों का नाश होता है।
    • जीवन की कठिनाइयां और कष्ट समाप्त होते हैं।
    • आध्यात्मिक शुद्धि और आत्मा की शांति प्राप्त होती है।

    महाकुंभ 2025 न केवल धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अगर आप कुंभ मेले में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, तो उपरोक्त तिथियों पर स्नान का अवसर अवश्य प्राप्त करें और इस पवित्र आयोजन का लाभ उठाएं।

  • महाकुंभ 2025 / महाकुंभ स्नान के साथ करें माता कल्याणी के इस प्राचीन मंदिर के दर्शन, पुराणों में भी है इसका जिक्र

    महाकुंभ 2025 / महाकुंभ स्नान के साथ करें माता कल्याणी के इस प्राचीन मंदिर के दर्शन, पुराणों में भी है इसका जिक्र

    प्रयागराज के महाकुंभ में माता कल्याणी देवी का मंदिर
    प्रयागराज, जिसे धार्मिक दृष्टि से एक प्रमुख स्थान माना जाता है, में महाकुंभ 2025 का आयोजन होने जा रहा है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु कुंभ मेले में स्नान करने के लिए प्रयागराज पहुंचेंगे। लेकिन महाकुंभ के साथ-साथ, यहां स्थित एक विशेष मंदिर का दर्शन भी अत्यधिक पुण्य प्रदान करता है। यह मंदिर है माता कल्याणी देवी का मंदिर, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पुराणों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है और यह एक शक्ति पीठ माना जाता है।

    माता कल्याणी देवी का पुराणों में उल्लेख
    माता कल्याणी देवी का मंदिर एक अतिप्राचीन स्थल है, और इसका जिक्र पद्म पुराण, मत्स्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, महान महर्षि याज्ञवल्क्य ने यहां ध्यान और साधना की थी, और उनके द्वारा ही माता कल्याणी की 32 अंगुल की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यह प्रतिमा सातवीं शताब्दी की मानी जाती है और इसे 1892 में जीर्णोद्धार किया गया था।

    माँ कल्याणी देवी का महत्व
    माता कल्याणी देवी को आद्याशक्ति के रूप में पूजा जाता है। कहा जाता है कि जो भी श्रद्धालु भक्ति भाव से इस मंदिर में पहुंचता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसे एक आध्यात्मिक शक्ति केंद्र भी माना जाता है। यहां प्रवेश करने पर मानसिक शांति का अनुभव होता है, जो हर भक्त के लिए अत्यंत विशेष होता है।

    मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता
    यह मंदिर अतिप्राचीन है और इसे कई राजाओं एवं सम्राटों ने समय-समय पर पुनर्निर्मित कराया है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर कई साधु-संतों ने तपस्या की और यहां से ज्ञान की प्राप्ति की। यहां की वास्तुकला भी अत्यंत खूबसूरत है, जो प्राचीन शैली में निर्मित है। मंदिर में स्थित देवी माता की मूर्ति एक शिला से बनी हुई है, जो देखने में बहुत ही मनमोहक है।

    महाकुंभ और नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़
    महाकुंभ और नवरात्रि के समय इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है। इन पर्वों के दौरान, विशेष रूप से भक्त माता कल्याणी देवी के दर्शन के लिए आते हैं और अपने जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

    निष्कर्ष
    महाकुंभ 2025 के दौरान, माता कल्याणी के मंदिर का दर्शन एक खास धार्मिक अनुभव प्रदान करता है। यहां के दर्शन से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन की हर मनोकामना की पूर्ति भी होती है। इसलिए यदि आप महाकुंभ में आ रहे हैं, तो इस पवित्र स्थल का दर्शन जरूर करें।

  • महाकुंभ 2025 / आइये आज बताते हैं आपको प्रयागराज के कुछ प्रमुख घाटों और उनके धार्मिक महत्व के बारे में

    महाकुंभ 2025 / आइये आज बताते हैं आपको प्रयागराज के कुछ प्रमुख घाटों और उनके धार्मिक महत्व के बारे में

    महाकुंभ 2025 के अवसर पर धर्म नगरी प्रयागराज में एक बार फिर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ेगा। यह पर्व 13 जनवरी 2025 से शुरू होकर 26 फरवरी 2025 तक चलेगा, और इस दौरान लाखों भक्त गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों में डुबकी लगाकर पुण्य कमाएंगे। महाकुंभ के दौरान प्रयागराज के घाटों का विशेष महत्व होता है, और प्रत्येक घाट का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अलग होता है। इस लेख में हम आपको प्रयागराज के 5 प्रमुख घाटों के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे, जो महाकुंभ 2025 के दौरान विशेष आकर्षण का केंद्र बनेंगे।


    1. संगम घाट: त्रिवेणी संगम का पवित्र स्थल

    संगम घाट प्रयागराज का सबसे प्रसिद्ध और पवित्र घाट है। यहां पर गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का मिलन स्थल है, जिसे त्रिवेणी संगम कहा जाता है। यह वह स्थान है जहां पर हर साल लाखों भक्त पापों के नाश के लिए डुबकी लगाते हैं। कहा जाता है कि इस पवित्र जल में स्नान करने से आत्मिक शांति और शुद्धता मिलती है। महाकुंभ के दौरान संगम घाट पर लाखों श्रद्धालु जुटते हैं, और यहां होने वाला शाही स्नान विशेष महत्व रखता है।

    महत्व:

    • त्रिवेणी संगम स्थल
    • पापों का नाश और आत्मिक शांति
    • शाही स्नान का केंद्र

    2. अरैल घाट: ध्यान और योग के लिए आदर्श स्थान

    अरैल घाट उन श्रद्धालुओं के लिए एक आदर्श स्थान है जो योग, ध्यान और आध्यात्मिक उन्नति की साधना करते हैं। यह घाट संगम से कुछ दूरी पर स्थित है और यहां पर भीड़-भाड़ कम रहती है, जिससे यह स्थल ध्यान साधना और शांति के लिए बहुत उपयुक्त है। अरैल घाट पर स्नान करने से भक्तों को शुभ फलों की प्राप्ति होती है, और यह जगह मानसिक शांति का अनुभव कराने में सहायक है।

    महत्व:

    • ध्यान और योग के लिए उपयुक्त
    • कम भीड़-भाड़ में शांति से साधना
    • शुभ फलों की प्राप्ति

    3. राम घाट: आरती और बोटिंग का आनंद

    राम घाट संगम घाट के पास स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जहां शाम के समय गंगा आरती का आयोजन किया जाता है। यह आरती दृश्य न केवल भक्तों के लिए, बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनती है। यहां पर आप बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं और गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगा सकते हैं। महाकुंभ के दौरान यहां पर भी भक्त स्नान करने और पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं।

    महत्व:

    • ऐतिहासिक घाट
    • गंगा आरती और बोटिंग का अनुभव
    • संगम घाट के समीप

    4. दशाश्वमेध घाट: गंगा आरती का प्रसिद्ध स्थल

    दशाश्वमेध घाट का नाम प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ से जुड़ा है, जिसे राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए किया था। यहां पर नियमित रूप से गंगा आरती आयोजित की जाती है, जो न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि एक अद्वितीय सांस्कृतिक अनुभव भी प्रदान करती है। महाकुंभ के दौरान इस घाट पर लाखों श्रद्धालु आकर स्नान और पूजा अर्चना करते हैं।

    महत्व:

    • अश्वमेध यज्ञ से जुड़ा हुआ
    • प्रसिद्ध गंगा आरती स्थल
    • धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

    5. लक्ष्मी घाट: धन और समृद्धि की देवी का पूजा स्थल

    लक्ष्मी घाट एक विशेष घाट है जहां माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस घाट पर धन और समृद्धि की देवी की अर्चना करने के लिए श्रद्धालु आते हैं। महाकुंभ के दौरान यहां विशेष पूजा अनुष्ठान होते हैं, और भक्त इस घाट पर आकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह घाट धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र है।

    महत्व:

    • सुख-समृद्धि और धन की देवी की पूजा
    • विशेष पूजा अनुष्ठान
    • धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र

    अन्य प्रमुख घाट

    इसके अलावा, हनुमान घाट, श्रीवास्तव घाट, नरौरा घाट, खुसरो बाग घाट और किला घाट भी प्रयागराज के प्रमुख घाटों में शामिल हैं, जहां पर महाकुंभ के दौरान श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं। इन घाटों पर भी भक्तों का तांता लगता है और प्रत्येक घाट का अपना ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है।


    निष्कर्ष

    महाकुंभ 2025 के दौरान प्रयागराज के ये प्रमुख घाट न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक विरासत भी अनमोल है। लाखों भक्त इन घाटों पर आकर पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। यदि आप भी इस पावन अवसर पर महाकुंभ में भाग ले रहे हैं, तो इन घाटों पर जरूर जाएं और अनुभव करें इस अद्भुत धार्मिक पर्व की महिमा।

  • महाकुंभ 2025 / टेंट सिटी टीवी से लेकर ब्लोअर , चौबीस घंटे आपातकालीन सहायता। आइये बताते हैं आपको क्या हैं सुविधाएँ और कैसे होगी बुकिंग

    महाकुंभ 2025 / टेंट सिटी टीवी से लेकर ब्लोअर , चौबीस घंटे आपातकालीन सहायता। आइये बताते हैं आपको क्या हैं सुविधाएँ और कैसे होगी बुकिंग

    आईआरसीटीसी ने प्रयागराज महाकुंभ के लिए एक अनोखा अनुभव प्रस्तुत किया – टेंट सिटी। महाकुंभ के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह टेंट सिटी एक छोटे शहर जैसा है, जहां ठहरने के लिए लग्जरी और सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध हैं। यहां 5-स्टार होटल जैसी सुविधाएं प्रदान की गई हैं, जो इसे अनोखा बनाती हैं।


    टेंट सिटी का स्थान और महत्व

    कहां स्थित है टेंट सिटी?
    टेंट सिटी प्रयागराज के नैनी क्षेत्र में सेक्टर 25, अरैल रोड पर स्थित है। यह त्रिवेणी संगम से केवल 3.5 किलोमीटर की दूरी पर है, जिससे श्रद्धालुओं को घाटों तक आसानी से पहुंचने की सुविधा मिलती है।

    यह टेंट सिटी लाखों श्रद्धालुओं को एक साथ ठहरने का विकल्प देती है और महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन को सुचारु बनाने में मदद करती है।


    टेंट सिटी में मिलने वाली सुविधाएं

    टेंट सिटी को आधुनिक और आरामदायक बनाने के लिए कई सुविधाएं प्रदान की गई हैं।

    1. सुपर डीलक्स और विला टेंट्स

    • सुपर डीलक्स टेंट्स:
      • 24 घंटे गर्म पानी
      • आरामदायक बेड और बाथरूम
      • रूम ब्लोअर की सुविधा
      • बेड लिनन, तौलिए और टॉयलेटरीज
    • विला टेंट्स:
      • अलग से बैठने की आरामदायक जगह
      • टीवी और मनोरंजन की सुविधा

    2. सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं

    • टेंट सिटी में 24×7 सीसीटीवी निगरानी
    • प्राथमिक चिकित्सा सुविधा
    • आपातकालीन सहायता की व्यवस्था

    3. अन्य सेवाएं

    • टेंट के किराए में भोजन शामिल
    • घाटों तक विशेष पहुंच सुविधा

    किराए और छूट

    टेंट सिटी में ठहरने के लिए किराया इस प्रकार है:

    • सुपर डीलक्स टेंट: ₹18,000 प्रति रात
    • विला टेंट: ₹20,000 प्रति रात

    विशेष छूट:
    शाही स्नान के अतिरिक्त दिनों में बुकिंग पर 10% की छूट दी जाएगी।


    टेंट सिटी की बुकिंग कैसे करें?

    टेंट सिटी की बुकिंग प्रक्रिया बहुत सरल है। श्रद्धालु आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर जाकर अपनी बुकिंग कर सकते हैं:


    महाकुंभ 2025: एक अनोखा अनुभव

    महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और भक्ति का उत्सव है। इस आयोजन को विशेष बनाने के लिए आईआरसीटीसी ने टेंट सिटी में शानदार इंतजाम किए हैं। श्रद्धालु इन विलासितापूर्ण टेंट्स में ठहरकर महाकुंभ के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का अनुभव कर सकते हैं।

    अगर आप महाकुंभ 2025 के इस ऐतिहासिक समारोह का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो जल्दी से अपनी बुकिंग करें और इस अविस्मरणीय आयोजन का आनंद लें।

  • महाकुंभ 2025 / अगर जायें महाकुंभ तो इस शक्तिपीठ के करें दर्शन,  जानें अलोपी देवी मंदिर का अद्वितीय महत्व

    महाकुंभ 2025 / अगर जायें महाकुंभ तो इस शक्तिपीठ के करें दर्शन, जानें अलोपी देवी मंदिर का अद्वितीय महत्व

    महाकुंभ 2025 में प्रयागराज की यात्रा
    महाकुंभ 2025 में लाखों श्रद्धालु प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम में पवित्र डुबकी लगाने के लिए जुटेंगे। इस भव्य अवसर पर केवल संगम की डुबकी ही नहीं, बल्कि अलोपी देवी मंदिर का दर्शन भी अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मंदिर न केवल एक शक्तिपीठ है, बल्कि इसमें पूजा का अनोखा तरीका भी है।


    अलोपी देवी मंदिर: शक्तिपीठ और धार्मिक मान्यता

    मंदिर का इतिहास और महत्व
    अलोपी देवी मंदिर का नाम हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह एक शक्तिपीठ है। मान्यता है कि माता सती का शरीर भगवान शिव के त्रिशूल पर था, और उनके शरीर के 51 भाग विभिन्न स्थानों पर गिरे थे। इन स्थानों में से एक प्रयागराज का यह मंदिर भी है, जहां माता का पंजा गिरा था। इस स्थान को इसलिए “अलोप” कहा जाता है, क्योंकि माता का अंग यहां गिरने के बाद वह अदृश्य हो गया था। इस अदृश्यता के कारण ही इसे अलोपशंकारी और अलोप देवी के नाम से जाना जाता है।


    पूजा का अनोखा तरीका: पालकी की पूजा

    मंदिर में कोई मूर्ति नहीं, बल्कि पालकी की पूजा
    अलोपी देवी मंदिर की एक विशेषता यह है कि यहां कोई मूर्ति नहीं है। इसके बजाय, भक्त एक पालकी (डोली) की पूजा करते हैं, जिसे माता का रूप माना जाता है। यह परंपरा मंदिर को अन्य देवी मंदिरों से अलग बनाती है। इस पालकी को चमत्कारी और दिव्य माना जाता है, और हर साल विशेष रूप से नवरात्रि और महाकुंभ के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने आते हैं।


    मंदिर का स्थान: त्रिवेणी संगम के निकट

    मंदिर की भव्य स्थिति
    अलोपी देवी का मंदिर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम के पास स्थित है, जहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम है। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक पवित्र माना जाता है, और यहां पवित्र डुबकी लगाने के साथ ही इस मंदिर में दर्शन करने का विशेष महत्व है।


    महाकुंभ के दौरान विशेष महत्व

    महाकुंभ में मंदिर का महत्व
    महाकुंभ के दौरान, जब श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाते हैं, तो इसके बाद अलोपी देवी मंदिर में दर्शन करना अत्यधिक लाभकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि, पवित्र डुबकी के बाद यहां माता से प्रार्थना करने पर भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती हैं और उनके कष्टों का निवारण होता है। यह मंदिर न केवल शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है, बल्कि प्रयागराज की धार्मिक धरोहर का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


    विशेष दिनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़

    मंगलवार और शुक्रवार को अधिक भक्तों की उपस्थिति
    अलोपी देवी मंदिर में विशेष दिनों पर भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है। खासकर मंगलवार और शुक्रवार को यहां अधिक श्रद्धालु पूजा करने आते हैं। मंदिर सुबह से लेकर रात तक खुला रहता है, और इन विशेष दिनों पर यहां का माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है।


    महाकुंभ 2025 के दौरान यदि आप प्रयागराज जा रहे हैं, तो अलोपी देवी मंदिर का दर्शन अवश्य करें। यह मंदिर न केवल एक शक्तिपीठ है, बल्कि यहां की पूजा विधि और मान्यताएं भी इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं। पालकी की पूजा और संगम में डुबकी के बाद इस मंदिर में दर्शन करने से आपको न केवल धार्मिक शांति मिलेगी, बल्कि आपकी मनोकामनाएं भी पूर्ण होंगी।

  • महाकुंभ 2025 / कौन सा अखाड़ा सबसे पहले डुबकी लगाएगा? जानें, शाही स्नान की अद्भुत परंपरा

    महाकुंभ 2025 / कौन सा अखाड़ा सबसे पहले डुबकी लगाएगा? जानें, शाही स्नान की अद्भुत परंपरा

    महाकुंभ, जो हर बार प्रयागराज में अपने अद्भुत आयोजन से श्रद्धालुओं को मोहित कर लेता है, इस बार भी 2025 में विशेष रूप से चर्चा में है। इस महापर्व में एक अहम सवाल हमेशा उठता है—कौन सा अखाड़ा सबसे पहले संगम में डुबकी लगाएगा और शाही स्नान करेगा? यह न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ सवाल है। आइए जानते हैं, महाकुंभ 2025 में शाही स्नान की प्रक्रिया और वह अखाड़ा कौन सा होगा, जिसे सबसे पहले संगम में डुबकी लगाने का अवसर मिलेगा।

    क्यों होते हैं अखाड़ों के शाही स्नान का तय क्रम?

    महाकुंभ के दौरान शाही स्नान की परंपरा एक ऐतिहासिक व्यवस्था का हिस्सा है, जिसे अंग्रेजों के समय से ही स्थापित किया गया था। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य था कि अखाड़ों के बीच किसी तरह का टकराव या विवाद न हो और हर अखाड़े को उचित सम्मान मिले। यही कारण है कि वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है, और यही परंपरा अब तक बरकरार है।

    2025 के महाकुंभ में कौन सा अखाड़ा होगा सबसे पहला?

    महाकुंभ के इतिहास में यह तय हो चुका है कि सबसे पहले पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा को शाही स्नान करने की अनुमति दी जाती है। यह परंपरा हर बार प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ में निभाई जाती है। वहीं, हरिद्वार में कुंभ मेला हो, तो निरंजनी अखाड़ा को सबसे पहले स्नान का अवसर मिलता है, जबकि उज्जैन और नासिक में यह अधिकार जूना अखाड़े को प्राप्त है। ऐसे में 2025 के महाकुंभ में भी पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा ही सबसे पहले संगम में डुबकी लगाएगा।

    शाही स्नान की विशेषता: एक अद्भुत परंपरा

    शाही स्नान का आयोजन एक विशेष प्रक्रिया के तहत होता है। इस प्रक्रिया के अनुसार, जिस अखाड़े को पहले स्नान का मौका मिलता है, उसके महंत या सर्वोच्च संत सबसे पहले पवित्र नदी में उतरते हैं और अपने अखाड़े के इष्ट देव को स्नान कराते हैं। इसके बाद वे खुद भी डुबकी लगाते हैं। उसके बाद बारी-बारी से अन्य साधु-संत और नागा साधु स्नान करते हैं। इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद ही आम श्रद्धालुओं को स्नान करने की अनुमति दी जाती है।

    महाकुंभ में स्नान का महत्व

    महाकुंभ में डुबकी लगाने का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति ऐसी होती है कि नदी का पानी अमृत बन जाता है। यही कारण है कि इस पानी में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। इसके साथ ही, यह माना जाता है कि महाकुंभ में डुबकी लगाने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसका जीवन निरोगी व समृद्ध होता है।

    नागा साधुओं का स्नान: क्यों है यह खास?

    महाकुंभ में सबसे पहले स्नान करने का अधिकार नागा साधुओं को होता है। इन्हें धर्म के रक्षक माना जाता है और इनकी उपस्थिति महाकुंभ के धार्मिक महत्व को दोगुना कर देती है। इन साधुओं के स्नान के बाद ही आम श्रद्धालुओं को स्नान करने की अनुमति दी जाती है। यह विशेष परंपरा महाकुंभ के महत्व को और बढ़ाती है।

    महाकुंभ में स्नान का फल

    महाकुंभ में डुबकी लगाने से केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक विकास भी होता है। यह समय ऐसा होता है, जब सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति को शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है। साथ ही, यह माना जाता है कि महाकुंभ में स्नान करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और उसे ईश्वर की विशेष कृपा मिलती है।


    महाकुंभ 2025 में शाही स्नान की यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, इतिहास और आस्था का एक अद्वितीय हिस्सा भी है। इस अद्भुत आयोजन में सबसे पहले डुबकी लगाने का अवसर मिलने वाले अखाड़े की यह यात्रा और परंपरा हर श्रद्धालु को एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है।

  • महाकुंभ 2025 / ‘विद्या कुंभ’ से श्रमिकों के बच्चों को मिल रही स्मार्ट शिक्षा, बह रही ज्ञान की गंगा

    महाकुंभ 2025 / ‘विद्या कुंभ’ से श्रमिकों के बच्चों को मिल रही स्मार्ट शिक्षा, बह रही ज्ञान की गंगा

    प्रयागराज में आयोजित होने वाला महाकुंभ 2025 इस बार न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि यह शिक्षा के क्षेत्र में भी एक मिसाल पेश करने जा रहा है। महाकुंभ के विशाल मेला क्षेत्र में जहाँ लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और पर्यटक आते हैं, वहीं यहां काम करने वाले श्रमिकों के बच्चों के लिए एक अनोखी पहल की शुरुआत की गई है।

    विद्या कुंभ: श्रमिकों के बच्चों के लिए अस्थाई स्कूल
    महाकुंभ के आयोजन में श्रमिकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। ये श्रमिक मेला क्षेत्र की सफाई, व्यवस्थाओं और सुरक्षा को बनाए रखने में जुटे रहते हैं। लेकिन उनकी चिंता यह थी कि वे अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए कुंभ क्षेत्र में आए हैं, तो उनके बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा? इस समस्या का हल निकाला है “विद्या कुंभ” पहल ने, जिसके तहत मेला क्षेत्र में अस्थाई स्कूल खोले गए हैं। इन स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को शिक्षा दी जा रही है।

    शिक्षा विभाग और शिव नाडर संस्थान का सहयोग
    बेसिक शिक्षा विभाग ने इस पहल को बढ़ावा दिया है, जिसमें शिव नाडर संस्थान का भी सक्रिय सहयोग मिल रहा है। इन विद्यालयों में बच्चों को स्मार्ट क्लासेस के माध्यम से शिक्षा दी जा रही है, जहां ऑडियो-विजुअल तरीकों से उन्हें पढ़ाया जा रहा है। इन स्मार्ट क्लासेस ने बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि को और भी बढ़ा दिया है।

    श्रमिकों के बच्चों के लिए एक अवसर
    विद्या कुंभ के इन स्कूलों में ना केवल उत्तर प्रदेश के बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों से आए बच्चों को भी शिक्षा मिल रही है। इन बच्चों को उनके पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा दी जा रही है, ताकि वे अपने-अपने राज्यों में वापस जाने के बाद अपनी कक्षाओं में बिना किसी परेशानी के परीक्षा दे सकें। कुंभ मेला क्षेत्र में यह शिक्षा 26 फरवरी तक चलेगी और बच्चों को एक प्रमाण पत्र प्रदान किया जाएगा, जिससे वे अपनी संबंधित स्कूलों में दाखिला ले सकेंगे।

    बच्चों के लिए पूरी व्यवस्था
    इन स्कूलों में बच्चों के लिए आवश्यक शैक्षिक सामग्री जैसे स्कूल ड्रेस, किताबें, कॉपी और उमंग किट का प्रबंध किया गया है। इसके साथ ही बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए योग्य शिक्षक भी नियुक्त किए गए हैं। कुल मिलाकर यह पहल बच्चों को भविष्य की दिशा देने में अहम भूमिका निभा रही है, खासकर उन बच्चों के लिए जो किसी कारणवश नियमित स्कूलों में शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहे थे।

    स्मार्ट क्लास और आंगनवाड़ी केंद्र
    श्रमिकों के बच्चों के लिए सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छोटे बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र भी मेला परिसर में चलाए जा रहे हैं। इन स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास का भी ख्याल रखा जा रहा है।

    2025 के महाकुंभ में शिक्षा की नई शुरुआत
    2019 में भी इसी तरह की पहल देखी गई थी, लेकिन 2025 में यह पहल और भी स्मार्ट हो चुकी है। मेला प्रशासन और शिक्षा विभाग मिलकर इस पहल को सुचारू रूप से चला रहे हैं, जिससे यह न केवल एक धार्मिक आयोजन बने बल्कि समाज की सच्ची प्रगति का प्रतीक भी हो।

    समाज के हर तबके के बच्चों को शिक्षा देने का संकल्प
    महाकुंभ 2025 में “विद्या कुंभ” न केवल श्रमिकों के बच्चों के लिए एक शिक्षा का अवसर बनकर उभरा है, बल्कि यह एक संदेश भी है कि समाज के हर तबके के बच्चों को शिक्षा का समान अधिकार मिलना चाहिए। यह पहल महाकुंभ के साथ एक नई दिशा और उम्मीद को जन्म देती है, जहां हर बच्चा अपना भविष्य संवार सकता है।

    अंत में, यह कहा जा सकता है कि महाकुंभ 2025 सिर्फ आध्यात्मिक महत्व नहीं, बल्कि शैक्षिक दृष्टिकोण से भी इतिहास रचने जा रहा है। “विद्या कुंभ” के माध्यम से ज्ञान की गंगा बहाने की यह पहल एक नजीर बनेगी, जो भविष्य में और भी बड़े बदलावों का संकेत देती है।