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Heat Wave / भारत में 13 वर्षों में दोगुने हुए हीटवेव के दिन, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के संकेत

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 2 Hours Ago • 1 Min Read

Heat Wave : पिछले 13 वर्षों में भारत में हीटवेव वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 की तुलना में अब हीटवेव की अवधि और प्रभाव दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में हीटवेव दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जो हाल के वर्षों में बदलते मौसम पैटर्न और बढ़ते तापमान की प्रवृत्ति को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और तापमान में लगातार हो रही वृद्धि का असर देश के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है।

नई दिल्ली

हीटवेव वाले दिनों में दर्ज हुई वृद्धि

भारत में हीटवेव की घटनाओं और उनकी अवधि में पिछले कुछ वर्षों के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में देश में कुल 554 हीटवेव दिन दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2023 में यह संख्या 230 दिन थी। आंकड़े बताते हैं कि केवल एक वर्ष के भीतर ही हीटवेव दिनों की संख्या में बड़ा अंतर दर्ज किया गया। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 में देश में लगभग 100 हीटवेव दिन दर्ज किए गए थे, जबकि वर्तमान समय में यह संख्या करीब 200 दिनों तक पहुंच चुकी है। इससे संकेत मिलता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि पहले की तुलना में अधिक लंबी और व्यापक होती जा रही है।

क्या है हीटवेव की परिभाषा

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार किसी क्षेत्र में अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाए और यह स्थिति लगातार कम से कम दो दिनों तक बनी रहे, तो उसे हीटवेव की श्रेणी में रखा जाता है। मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान हीटवेव के आकलन में महत्वपूर्ण माना जाता है। मौसम विभाग विभिन्न क्षेत्रों की सामान्य जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हीटवेव की घोषणा करता है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों और भौगोलिक क्षेत्रों में तापमान की सामान्य सीमा अलग होती है।

13 वर्षों में बढ़ी हीटवेव की अवधि

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 13 वर्षों में हीटवेव की अवधि और भौगोलिक विस्तार दोनों में वृद्धि हुई है। पहले हीटवेव का प्रभाव मुख्य रूप से अप्रैल और मई के महीनों तक सीमित रहता था, लेकिन अब मार्च से ही कई राज्यों में तापमान सामान्य से अधिक दर्ज होने लगता है और जून के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों में जुलाई तक इसका असर बना रहता है। उत्तर भारत, पश्चिम भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में लंबे समय तक उच्च तापमान दर्ज किया जा रहा है।

वर्ष 2024 और 2025 के ग्रीष्मकाल के दौरान राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली सहित कई राज्यों में तापमान लगातार 40 से 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर यह स्थिति कई सप्ताह तक बनी रही। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव अब केवल कुछ दिनों की मौसमी घटना न रहकर लंबे समय तक रहने वाली मौसमीय स्थिति के रूप में सामने आ रही है।

जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा प्रमुख कारण

विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक स्तर पर बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन हीटवेव की बढ़ती घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत का औसत तापमान पिछले दशकों में लगभग 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन की बढ़ती मात्रा वायुमंडल में गर्मी को अधिक समय तक बनाए रखती है, जिससे तापमान में वृद्धि होती है।

इसके अलावा जीवाश्म ईंधनों का उपयोग, औद्योगिक गतिविधियां, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और वनों की कटाई भी तापमान वृद्धि में योगदान देने वाले प्रमुख कारक माने जाते हैं। जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है, तो आने वाले दशकों में हीटवेव की आवृत्ति और अवधि दोनों में और वृद्धि हो सकती है।

विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ रहा प्रभाव

देश के विभिन्न हिस्सों में हीटवेव का प्रभाव अलग-अलग स्तर पर देखा जा रहा है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित इंडो-गंगा के मैदानी क्षेत्र लगातार उच्च तापमान और लंबे हीटवेव दौर का सामना कर रहे हैं। राजस्थान और गुजरात में कई बार तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और यह स्थिति कई दिनों तक बनी रहती है।

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी हाल के वर्षों में हीटवेव की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है। शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट संरचनाओं, सीमित हरित क्षेत्र और वाहनों से निकलने वाली गर्मी के कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ देखने को मिलता है। इसके चलते रात के समय भी तापमान अपेक्षाकृत अधिक बना रहता है और लोगों को गर्मी से राहत कम मिलती है।

स्वास्थ्य, कृषि और जल संसाधनों पर प्रभाव

विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक रहने वाली हीटवेव का प्रभाव सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। अत्यधिक गर्मी के दौरान हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, थकान, हृदय संबंधी समस्याओं और अन्य गर्मी से जुड़ी स्वास्थ्य स्थितियों के मामले बढ़ सकते हैं। बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं तथा खुले वातावरण में काम करने वाले श्रमिक अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित वर्गों में शामिल माने जाते हैं। वर्ष 2015 की हीटवेव के दौरान देश में 2,000 से अधिक मौतें दर्ज की गई थीं, जिसे हाल के वर्षों की प्रमुख गर्मी संबंधी घटनाओं में गिना जाता है।

कृषि क्षेत्र पर भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। गेहूं, चावल, फल और सब्जियों जैसी फसलों की उत्पादकता उच्च तापमान के कारण प्रभावित हो सकती है। पशुधन पर भी गर्मी का असर पड़ता है। इसके साथ ही भूजल स्तर में गिरावट, जल उपलब्धता पर दबाव और बिजली की मांग में वृद्धि जैसी स्थितियां सामने आती हैं। विभिन्न अध्ययनों में हीटवेव की बढ़ती घटनाओं को कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में चिन्हित किया गया है।

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