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हिमाचल हाई कोर्ट ने विवाह के बाद भी बेटी की पात्रता को लेकर दिया महत्वपूर्ण फैसला

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 25 Apr 2026 • 1 Min Read

Himachalnow / शिमला

हिमाचल हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि आवेदन के समय अविवाहित बेटी को नियुक्ति तक अविवाहित माना जाएगा, भले ही इस दौरान उसका विवाह हो जाए। अदालत ने राज्य सरकार की उस शर्त को अस्वीकार्य बताया, जिसमें नियुक्ति के समय विवाह होने पर ज्वॉइनिंग से इनकार किया जाता था।

शिमला

अनुकंपा नियुक्ति नीति पर कोर्ट का विस्तृत निर्णय

हिमाचल हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की उस नीति को अस्वीकार्य ठहराया, जिसमें यह शर्त निर्धारित की गई थी कि यदि नियुक्ति के समय तक प्रार्थी बेटी का विवाह हो जाता है तो उसे ज्वॉइनिंग नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि ऐसी शर्तें न केवल नीति के मूल उद्देश्य के विपरीत हैं, बल्कि इससे उन आवेदकों के अधिकार भी प्रभावित होते हैं जो पहले से निर्धारित नियमों के तहत आवेदन करते हैं और प्रक्रिया के दौरान परिस्थितियों में बदलाव का सामना करते हैं।

अविवाहित बेटी की स्थिति को लेकर स्पष्ट निर्देश

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि कोई बेटी अविवाहित रहते हुए अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करती है, तो उसे नियुक्ति मिलने तक अविवाहित ही माना जाएगा, चाहे इस बीच उसका विवाह हो गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक स्थिति का प्रमाण उसी तिथि के आधार पर मान्य होगा जब आवेदन प्रस्तुत किया गया था, न कि उस समय जब नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की जा रही हो। इससे पात्रता निर्धारण में स्पष्टता बनी रहेगी।

मामले का कानूनी विश्लेषण और निष्कर्ष

कोर्ट के समक्ष यह मुख्य प्रश्न था कि क्या आवेदन करने के बाद और नियुक्ति प्रस्ताव मिलने से पहले विवाह करने वाली बेटी अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र हो जाती है। इस पर अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में उसे अपात्र नहीं माना जा सकता, क्योंकि आवेदन के समय उसकी पात्रता पूरी थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान होने वाले व्यक्तिगत बदलावों के आधार पर पात्रता को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

नीति के व्यावहारिक पहलुओं पर टिप्पणी

अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि किसी भी आवेदक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर निर्णय आने तक कई वर्षों तक विवाह न करे। इस प्रकार की शर्तें व्यवहारिक नहीं मानी जा सकतीं और इससे आवेदकों के व्यक्तिगत अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए नीति बनाते समय व्यावहारिक और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।