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मौन कन्या से कुलदेवी तक : माता टौणी देवी की लोकगाथा और पत्थर टकराने की परंपरा

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन • 1 Hour Ago • 1 Min Read

हमीरपुर जिले की पहाड़ियों पर स्थित माता टौणी देवी मंदिर चौहान राजपूत समाज की कुलदेवी, एक मौन कन्या की लोकगाथा और दो पत्थर टकराकर मनोकामना व्यक्त करने की परंपरा के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, परिवार के संदेह और आरोपों से आहत कन्या ने तपस्या की तथा अंतर्ध्यान होने के बाद देवीस्वरूप में पूजी जाने लगी। उसकी स्मृति में स्थापित छोटा देवस्थान समय के साथ प्रसिद्ध मंदिर के रूप में विकसित हुआ।

हमीरपुर

माता टौणी देवी मंदिर के साथ धार्मिक आस्था के अलावा इतिहास, लोकविश्वास और चौहान परिवारों की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां जुड़ी हैं। मान्यता है कि चौहान वंश में विवाह, संतान, गृहप्रवेश या अन्य शुभ कार्य माता का आशीर्वाद लिए बिना पूर्ण नहीं माने जाते। हिमाचल प्रदेश के साथ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में बसे चौहान परिवार भी माता के दरबार से अपनी आस्था जोड़ते हैं। मंदिर की सबसे अलग पहचान वह पूजा परंपरा है, जिसमें श्रद्धालु माता की पिंडी के पास रखे दो पत्थरों को टकराकर अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं।

बारह भाइयों और उनकी बहन से जुड़ी लोककथा

स्थानीय परंपरा के अनुसार, लगभग तीन से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले दिल्ली और मैदानी क्षेत्रों में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच चौहान वंश के बारह भाई अपने परिवार और धर्म की रक्षा के लिए पहाड़ों की ओर आए थे। उनके साथ उनकी एक बहन भी थी, जो सुन नहीं सकती थी। पहाड़ी क्षेत्र में पहुंचने के बाद परिवार ने बाकर, कुनाह और पुंग खड्ड के आसपास सुरक्षित स्थान पर बसने की योजना बनाई। लोककथा में इस यात्रा को चौहान परिवारों के विस्थापन और पहाड़ों में नए जीवन की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।

लोकमान्यता के अनुसार, भवन की नींव रखने के दौरान उस स्थान से खून जैसी लाल धारा निकलने लगी। इससे भयभीत परिवार ने अपने कुल पुरोहित से सलाह ली। कथा के मुताबिक पुरोहित ने परिवार की अविवाहित कन्या को इस घटना के लिए जिम्मेदार बताया, जिसके बाद परिवार की महिलाओं ने भी उस पर संदेह किया। सुन नहीं सकने वाली कन्या अपने पक्ष में बात नहीं रख पाई। यही प्रसंग इस लोकगाथा का सबसे मार्मिक हिस्सा माना जाता है, क्योंकि जिस कन्या को परिवार की विपत्ति का कारण समझा गया, वही आगे चलकर कुलदेवी के रूप में पूजी गई।

तपस्या और मंदिर की स्थापना

परिवार के आरोपों से आहत होकर वह कन्या उस स्थान पर चली गई, जहां वर्तमान में माता टौणी देवी मंदिर स्थित है। मान्यता है कि उसने वहां घोर तपस्या शुरू कर दी। समय बीतने के साथ परिवार को अपनी भूल का अहसास हुआ, लेकिन आषाढ़ मास की दसवीं तिथि को कन्या अचानक अंतर्ध्यान हो गई। परिवार ने इसे दिव्य घटना माना और कन्या को देवीस्वरूप स्वीकार किया। उसकी स्मृति में भाइयों ने उसी स्थान पर एक छोटा मंदिर स्थापित किया, जो समय के साथ विस्तृत होकर वर्तमान माता टौणी देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

दो पत्थर टकराकर कही जाती है मनोकामना

मंदिर की पूजा-पद्धति इस लोकगाथा से सीधे जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि माता अपने मानव जीवन में सुन नहीं सकती थीं, इसलिए श्रद्धालु केवल घंटी बजाने के बजाय पिंडी के पास रखे दो पत्थरों को आपस में टकराते हैं। भक्तों का विश्वास है कि पत्थरों से निकलने वाली ध्वनि माता तक पहुंचती है और वह उनकी मनोकामना सुनती हैं। दो पत्थरों के टकराने की यह आवाज मंदिर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा धार्मिक अनुष्ठान के साथ उस मौन कन्या की स्मृति का प्रतीक भी है।

माता टौणी देवी को चौहान राजपूत समाज की कुलदेवी माना जाता है। कुलदेवी की यह परंपरा परिवार, वंश, पूर्वजों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है। इसी कारण चौहान परिवार शुभ अवसरों से पहले माता का स्मरण करते और मंदिर में शीश नवाते हैं। वर्षभर मंदिर में श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है, जबकि आषाढ़ मास का मेला विशेष महत्व रखता है। स्थानीय परंपरा इस मेले को माता के अंतर्ध्यान होने की कथा से जोड़ती है। इस अवसर पर दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और भजन-कीर्तन तथा धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं।

माता टौणी देवी की गाथा में विस्थापन, पारिवारिक संदेह, पीड़ा, तपस्या, पश्चाताप और आस्था के कई प्रसंग दिखाई देते हैं। लोकविश्वास में जिस कन्या को कभी अशुभ समझा गया था, वही बाद में परिवार की रक्षक और कुलदेवी बनी। सदियों बाद भी मंदिर में पत्थरों के टकराने की ध्वनि उसी मान्यता को जीवित रखे हुए है। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा की एक विधि नहीं, बल्कि अपनी मनोकामना उस देवी तक पहुंचाने का माध्यम है, जिन्हें मौन कन्या से भक्तों की पुकार सुनने वाली माता के रूप में स्वीकार किया गया।

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