Pajhota Movement / 11 जून 1943 का गोलीकांड बना हिमाचल के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जनप्रतिरोध, कमना राम की शहादत आज भी सुनाती है संघर्ष की गाथा
Pajhota Movement : 11 जून 1943 का सरोट गोलीकांड हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। रियासती सेना की गोलीबारी के बावजूद पझौता आन्दोलन कमजोर नहीं पड़ा और यह जनप्रतिरोध अन्याय व दमन के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गया। कमना राम की शहादत आज भी उस ऐतिहासिक आन्दोलन की याद दिलाती है जिसने सिरमौर रियासत को चुनौती दी थी।
राजगढ़
हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में यदि किसी जनआन्दोलन ने रियासती सत्ता को सबसे बड़ी चुनौती दी, तो वह था पझौता आन्दोलन। यह केवल किसानों का विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ पहाड़ के आम लोगों का संगठित विद्रोह था। यही कारण है कि आजादी के बाद इस आन्दोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में मान्यता मिली और इससे जुड़े लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा प्रदान किया गया।
11 जून 1943 का दिन पझौता घाटी के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। इसी दिन राजगढ़ के समीप सरोट पहाड़ी से रियासती सेना ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर लगभग 1700 राउंड गोलियां दागी थीं। गोलियों की इस बौछार में कमना राम ने मौके पर ही शहादत दी, जबकि कई अन्य आंदोलनकारी घायल हुए। यह घटना उस संघर्ष का प्रतीक बन गई, जिसने सिरमौर रियासत की नींव तक हिला दी थी।
आखिर क्या था पझौता आन्दोलन
सिरमौर जिला की राजगढ़ तहसील का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पझौता घाटी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1942 में जब पूरे देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आन्दोलन चल रहा था, तब पझौता क्षेत्र में भी लोगों के भीतर रियासती शासन के प्रति असंतोष तेजी से बढ़ रहा था।महाराजा सिरमौर राजेन्द्र प्रकाश की सरकार पर आरोप था कि वह ब्रिटिश हुकूमत की सहायता के लिए जनता पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लोगों पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए गए। घराट कर, विवाह कर जैसे कई करों के साथ-साथ युवाओं को सेना में भर्ती करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। इन परिस्थितियों ने आम लोगों के भीतर आक्रोश पैदा कर दिया।
टपरोली की बैठक से शुरू हुई बगावत
अक्तूबर 1942 में टपरोली गांव में क्षेत्र के लोगों की एक बड़ी बैठक हुई। यहां “पझौता किसान सभा” का गठन किया गया। आन्दोलन की कमान वैद्य सूरत सिंह के हाथों में सौंपी गई, जिन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।धीरे-धीरे यह आन्दोलन पूरे पझौता क्षेत्र में फैल गया और लोगों ने खुलकर रियासती शासन का विरोध शुरू कर दिया।
आलू बना आन्दोलन की चिंगारी
इतिहासकारों के अनुसार आन्दोलन का तत्काल कारण आलू उत्पादकों को उनकी फसल का उचित मूल्य न मिलना था। उस समय पझौता क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से आलू की खेती पर आधारित थी।रियासती सरकार ने आलू का मूल्य मात्र तीन रुपये प्रति मन तय किया था, जबकि खुले बाजार में यही आलू लगभग 16 रुपये प्रति मन बिक रहा था। किसानों को यह निर्णय अन्यायपूर्ण लगा और उनके भीतर वर्षों से जमा असंतोष खुलकर सामने आ गया।
जब प्रशासन के लोग भी छोड़ने लगे पद
आन्दोलन के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजा द्वारा नियुक्त कई जेलदारों और नंबरदारों ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया। उस समय सिरमौर में न्यायाधीश के पद पर कार्यरत डॉ. वाई.एस. परमार ने भी अपना पद छोड़ दिया था।स्थिति का आकलन करने भेजे गए अधिकारियों पर भी आन्दोलन का प्रभाव पड़ा। इससे रियासती शासन को एहसास हो गया कि मामला सामान्य विरोध से कहीं आगे बढ़ चुका है।
मार्शल लॉ और दमन की शुरुआत
मई 1943 में आन्दोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। राजगढ़ किले में कई आंदोलनकारियों को बंद कर दिया गया। इसके विरोध में आन्दोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ।स्थिति बिगड़ने पर 12 मई 1943 को पूरे पझौता क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। सेना की कमान मेजर हीरा सिंह बाम को सौंपी गई और घाटी को सैन्य नियंत्रण में ले लिया गया।सेना ने आन्दोलन को दबाने के लिए कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी। आन्दोलन के प्रमुख नेता वैद्य सूरत सिंह के कटोगड़ा स्थित घर को डायनामाइट से उड़ा दिया गया। अन्य आंदोलनकारियों के घरों को भी निशाना बनाया गया। इसके बाद आन्दोलनकारी पहाड़ियों पर जाकर संगठित होने लगे।
सरोट की पहाड़ी पर लिखा गया इतिहास
आन्दोलनकारियों ने ऊंची पहाड़ियों पर अपने शिविर बना लिए थे, जबकि सेना ने राजगढ़ के निकट सरोट पहाड़ी पर मोर्चा संभाल लिया। तनाव लगातार बढ़ता गया और अंततः 11 जून 1943 को वह दिन आया, जिसने पझौता आन्दोलन को अमर कर दिया।रिकॉर्ड के अनुसार सेना ने आंदोलनकारियों पर लगभग 1700 राउंड गोलियां चलाईं। कमना राम गोली लगने से शहीद हो गए, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश की लहर पैदा कर दी।
आज भी प्रेरणा देता है पझौता का संघर्ष
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पझौता आन्दोलन को भारत छोड़ो आन्दोलन की क्षेत्रीय अभिव्यक्ति माना गया। इस आन्दोलन से जुड़े अनेक लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान मिला। आज भी पझौता घाटी में 11 जून को गोलीकांड दिवस के रूप में याद किया जाता है।पझौता आन्दोलन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि उस साहस की कहानी है जिसमें सीमित संसाधनों वाले ग्रामीणों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। सरोट की पहाड़ी पर चली 1700 गोलियां एक व्यक्ति की जान ले सकीं, लेकिन पझौता के लोगों के हौसले और आजादी की चाह को नहीं दबा सकीं। यही कारण है कि 83 वर्ष बाद भी पझौता आन्दोलन हिमाचल के स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे गौरवपूर्ण गाथाओं में गिना जाता है।