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रबी की समय पर बुआई और बीज उपचार से घटेगा रोगों का खतरा, किसानों के लिए सलाह जारी

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन • 47 Mins Ago • 1 Min Read

रबी फसलों की बेहतर पैदावार और शुरुआती बीमारियों से बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को समय पर बुआई, उपयुक्त किस्मों के चयन और बीज उपचार की सलाह दी है। अक्तूबर का दूसरा पखवाड़ा गेहूं, चना, मसर, सरसों और विभिन्न सब्जियों की खेती के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। पशुपालकों से भी बदलते मौसम में पशुशालाओं की स्वच्छता, संतुलित आहार और बीमारियों के लक्षणों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है।

नाहन

कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी कृषि एवं पशुपालन संबंधी सलाह की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से अपने क्षेत्र की जलवायु और परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाने का आग्रह किया। उनके अनुसार प्रदेश के निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की बुआई अक्तूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के मध्य तक की जा सकती है। इसके लिए एचएस-542 और वीएल-829 किस्में उपयुक्त बताई गई हैं।

चना और मसर के लिए अनुमोदित किस्में

चने की खेती के लिए हिमाचल चना-1, हिमाचल चना-2 और जीपीएफ-2 किस्मों की बुआई की जा सकती है। मसर के लिए विपाशा और मारकण्डे किस्में प्रदेश की परिस्थितियों के अनुरूप अनुमोदित हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने चने के बीज को उचित गहराई पर डालने की सलाह दी है। कम गहराई पर बुआई करने से उखेड़ा या विल्ट रोग का खतरा बढ़ सकता है। गेहूं, चना और मटर सहित विभिन्न फसलों में बीज उपचार को भी बेहतर उत्पादन और रोगों से बचाव के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।

गेहूं और जौ में कंगियारी तथा मटर में विल्ट जैसी बीमारियों से बचाव के लिए बुआई से पहले अनुशंसित फफूंदनाशक से बीज उपचार करने को कहा गया है। तिलहनी फसलों में किसान राया, गोभी सरसों और अलसी की उपयुक्त किस्में बो सकते हैं। निचले पर्वतीय क्षेत्रों में मटर की अगेती किस्मों के साथ लहसुन, पालक, मेथी, धनिया, मूली, गाजर और शलजम की बुआई भी की जा सकती है। फूलगोभी, बंदगोभी और ब्रोकली की तैयार पौध की रोपाई तथा प्याज की नर्सरी तैयार करने के लिए भी यह समय उपयुक्त बताया गया है।

पशुपालकों को सतर्क रहने की सलाह

पशुपालकों से पशुशालाओं में नियमित साफ-सफाई रखने और पशुओं को संतुलित आहार देने को कहा गया है। खुरपका-मुंहपका, लम्पी स्किन रोग और गलघोंटू जैसी बीमारियों के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करने की सलाह दी गई है। नवजात बछड़ों को जन्म के एक से दो घंटे के भीतर खीस पिलाना भी जरूरी बताया गया है। किसानों को अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क बनाए रखने या कृषि तकनीकी जानकारी के लिए किसान हेल्पलाइन नंबर 1800-180-1551 पर संपर्क करने की सलाह दी गई है।

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