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तीन दिवसीय धार्मिक यात्रा में नौ तबीन क्षेत्र सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने निभाई परंपरा

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 1 Hour Ago • 1 Min Read

तीन दिवसीय धार्मिक यात्रा के दौरान शिरगुल महाराज की पावन जातर चूड़धार स्नान के बाद सोमवार को उनकी जन्मस्थली शाया लौट आई। इस यात्रा में नौ तबीन क्षेत्र सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर परंपरा और आस्था का निर्वहन किया। यात्रा के दौरान विभिन्न पड़ावों पर पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की भक्ति देखने को मिली।

नाहन

जिला सिरमौर की लोक आस्था और प्राचीन परंपरा का प्रतीक भगवान शिरगुल महाराज की पावन जातर तीन दिवसीय धार्मिक यात्रा के बाद चूड़धार स्नान संपन्न कर सोमवार को उनकी जन्मस्थली शाया लौट आई। इस दौरान नौ तबीन क्षेत्र सहित आसपास के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूरे श्रद्धाभाव और उत्साह के साथ जातर में भाग लिया।शिरगुल महाराज की जातर 27 जून को शाया से चूड़धार के लिए रवाना हुई। पहले दिन बांगा पानी में देव पूजन के बाद रात्रि विश्राम किया गया। दूसरे दिन प्रातः जातर चूड़धार के लिए रवाना हुई। पाछले मोड़ पर विधिवत पूजा-अर्चना के बाद दोपहर करीब साढ़े बारह बजे जातर चूड़धार पहुंची, जहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिरगुल महाराज का पवित्र स्नान कराया गया।

इस अवसर पर देवता के साथ पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भी पवित्र स्नान किया। स्नान के उपरांत विशेष पूजा-अर्चना हुई और श्रद्धालु शिरगुल गाथा की धुन पर भक्ति में सराबोर होकर झूमते रहे। शाम को जातर वापसी के लिए रवाना हुई तथा पाछले मोड़ में रात्रि विश्राम किया गया।इस जातर की विशेष परंपरा यह है कि देवता के साथ यात्रा करने वाले श्रद्धालु सिर पर कोई वस्त्र या छत नहीं रखते तथा पूरी यात्रा के दौरान खुले आसमान के नीचे ही रात्रि विश्राम करते हैं।

सोमवार सुबह जातर शाया के लिए रवाना हुई और शाम को जन्मस्थली पहुंची। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर ग्रामीणों ने फूल-मालाओं से जातर का भव्य स्वागत किया। श्रद्धालुओं के लिए पानी, चाय और अन्य जलपान की भी व्यवस्था की गई।शिरगुल महाराज के पूर्व मुखिया रणवीर सिंह ने बताया कि शिरगुल महाराज की पावन जातर प्रत्येक तीसरे वर्ष चूड़धार स्नान के लिए निकलती है। आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को भगवान का पवित्र स्नान कराया जाता है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष भी नौ तबीन क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा में भाग लेकर अपनी आस्था और परंपरा का निर्वहन किया।