स्वर्ग से पृथ्वी लोक लौटते ही जग के कल्याण को होंगी पुनः विराजमान
HNN / कुल्लू
हिमाचल प्रदेश को देवभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता, यहां देवी देवता साक्षात रूप से निवास करते हैं। सतयुग काल से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन भी कालांतर से चला आ रहा है। इसी कड़ी में उपमंडल कुल्लू के अंतर्गत आनी के खेगसू के मंदिर में विराजमान मां कुष्मांडा 7 दिनों के स्वर्ग प्रवास पर चली गई है। इस भव्य शक्ति स्थल पर अब पूजा-पाठ के नियम भी बदल गए हैं। इन 7 दिनों तक गोधूलि से पहले यानी पक्षियों के चह-चाहने से पहले पूजा कर दी जाएगी। साथ ही संध्याकालीन समय जब पक्षी अपने घौंसलों में लौट जाएंगे उस के बाद ही पूजा की जाएगी।
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मां के भगत डडोहल निवासी भीमी राम का कहना है कि माता सीरी गढ़, कुमार सेन कोटगढ़ नित्थर ,सुकेत आदि क्षेत्रों के लोगों की आराध्या देवी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार 7 दिन के स्वर्ग प्रवास के दौरान देवी देवता शक्तियों को अर्जित करते हैं ताकि बुराइयों को यानि राक्षसों का अंत किया जा सके। देवधारा पर आने वाले संकटों और अपने भक्तों की मांग को और उनके कष्टों को पूरा करने के लिए माता शक्ति स्वरूपा हो जाती हैं।
माता जिस दिन पृथ्वी लोक पर लौटती हैं और उनके विराजमान होते ही उस दिन को स्त्रीण कहा जाता है। यहां यह भी बता दें कि जहां माता 7वें दिन वापस लौटती है तो वही देवता दो मास के बाद ही लौटते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कुष्मांडा मां का मायका डडोहल गांव में है, जिसके चलते यहां के लोग मायके पक्ष के माने जाते हैं।
हर वर्ष होने वाले धार्मिक कार्यों व अनुष्ठान आदि में मायके पक्ष के लोग अपनी सेवाएं देते हैं। इन 7 दिनों के दौरान भक्त लोग बेसब्री से मां के लौटने का इंतजार करते हैं। मां के लौटने के बाद गूर भक्तों के प्रश्नों को मां के समक्ष रखकर उनका सवाल जवाब करते हैं। वार्षिक फल क्षेत्र के लिए और आमजन के लिए कैसा होगा इसके बारे में भी प्रेडिक्शन की जाती है।
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