हाटी नाम की समिति का 1979-80 में पंजीकरण का था मामला, जिसे बाद में कथित जाती बना दिया गया
HNN/ नाहन
एक समिति का नाम हाटी बनाकर फिर उसे विशेष वर्ग बना जनजाति का दर्जा देना केंद्र की समाज को विभाजित करने की नीति को साफ दर्शाता है। यह बात गुर्जर कल्याण परिषद के अध्यक्ष राजकुमार पोसवाल ने काला अंब में एक प्रेस वार्ता के दौरान कही। वार्ता में महासचिव गुर्जर कल्याण परिषद सोमनाथ भाटिया तथा गुर्जर कल्याण परिषद के प्रमुख सलाहकार मास्टर फकीरचंद भी मौजूद थे।
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गुर्जर समाज कल्याण परिषद सिरमौर के अध्यक्ष राजकुमार पोसवाल और महामंत्री सोमनाथ भाटिया ने कहा कि आरक्षण की मांग के बाद ही हाटी शब्द इजाद हुआ था। इसका नामकरण 1980 के दशक में हाटी किया गया। ये बात गुर्जर समाज पहले भी साफ कर चुका है और अब भाजपा के पदाधिकारी और हाटी नेताओं की बीते दिन पांवटा साहिब में हुई पत्रकारवार्ता में ये बात उजागर हो चुकी है।
यहां जारी बयान में गुर्जर समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि कांग्रेस के समय में इसका प्रस्ताव जरूर गया लेकिन कई आपत्तियों के कारण स्वीकार नहीं हो पाया। भाजपा शासन काल में तथाकथित हाटी समुदाय के नाम पर यह कार्य बैक डोर से हो गया। इस मामले में हुई ओच्छी राजनीति और सम्यक तत्परता की कमी साफ उभर कर आती है।
भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि उन्होंने 1980 के दशक में हाटी का नामकरण इस बात के कारण किया कि नौहराधार में एक समिति का पंजीकरण करना था और उसका नाम हाटी रखा। यह बात भी बिल्कुल सत्य है। इसका कोई ऐतिहासिक और सामाजिक अस्तित्व नहीं है।
राजकुमार पोसवाल ने कहा कि अब ये प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे प्रधानों और नेताओं के नामकरण से कोई जनजाति बन जाती है। गुर्जर समाज इस बात को लेकर एकमत है कि गिरिपार के हाटी समुदाय को दिया हाटी आरक्षण सही नहीं है और इसमें बहुत सारी खामियां है।
इसी बात को लेकर वह बार-बार यही मांग कर रहे कि राज्य और केंद्र सरकार तथ्यों के आधार पर इस फैसले पर पुनर्विचार करे। यदि ऐसे नहीं किया गया तो ये प्रदेश और देश के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, और गिरिपार के पिछड़े वर्ग और समान्य श्रेणि के आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों के संवैधानिक हक की लूट और हनन का कृत्य होगा जो सर्व समाज के प्रबुद्ध लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
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