वीरभद्र परिवार क्या ओढ़ लेगा भगवा चादर.. जाना लगभग तय, फिर भी नहीं गिरेगी सरकार
उप मुख्यमंत्री व मंत्रियों सहित 28 की टीम चट्टान की तरह सुखविंदर सिंह के साथ
HNN/नाहन
राज्यसभा चुनाव से पहले मिशन लोटस की लिखी गई पटकथा कानूनी दावपेच में लगभग पिट गई है। दो धारी तलवार बने विक्रमादित्य का भाजपा में जाना तय भी माना जा सकता है। भगवाधारी होने के संकेत विक्रमादित्य सोशल मीडिया में अपनी चर्चाओं के साथ अयोध्या जी जाकर पहले ही दे चुके हैं। बावजूद इसके आम जनता में चर्चा कुछ खास हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के कट्टर समर्थक अब दबी जुबान हिमाचल निर्माता के बेटे कुश परमार की स्थिति जैसी वाली बात करने लग पड़े हैं।
कुश परमार के बेटे चेतन परमार ने भी कुछ इसी तरह से भाजपा में जाकर पूर्व विधायक रहे कुश परमार परिवार के आगे राजनीतिक फुल स्टाप लगवा लिया है। अब यदि विक्रमादित्य सिंह भी भाजपा में चले जाते हैं तो निश्चित ही उनका भविष्य का राजनीतिक कैरियर लगभग समाप्त हो सकता है।
यहां यह भी बता दें कि प्रदेश में आज भी चर्चा है कि विक्रमादित्य की अपनी निजी पहचान नहीं बल्कि आज भी वह वीरभद्र सिंह यानी पूर्व मुख्यमंत्री की वजह से ही पहचाने जाते हैं। विक्रमादित्य की भाजपा में जाने की दूसरी बड़ी वजह उन पुराने मामलों को पूरी तरह से क्लीन चिट की भी है जिनकी वजह से केंद्र की भाजपा ने पूर्व में रही वीरभद्र सरकार पर दबाव बनाए थे।
हैरानी वाली चर्चा तो यह भी है कि लोग अब यह भी कह रहे हैं कि जब तक कांग्रेस में कोई है तो वह बदनाम और जैसे भाजपा में जाता है तो वह ईमानदार। अब यदि प्रदेश की बात की जाए तो भाजपा के द्वारा खेला गया खेल उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। कसौली में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के भावनात्मक होने के बाद पूरे प्रदेश में उनके प्रति सिंपैथी की बड़ी लहर चल पड़ी है।
सुखविंदर सिंह सुक्खू के प्रति चली यह सिंपैथी की लहर अब लोकसभा चुनाव में भी फर्क डालती हुई नजर आती है। बता दें कि केंद्रीय भाजपा देश के अन्य राज्यों में खेले जाने वाली रणनीति को यदि प्रदेश के हिसाब से बनाते तो संभवत सही था। जनता यह भी सवाल उठा रही है कि आखिर कांग्रेस के बगावती विधायकों को हेलीकॉप्टर और वाइ (y)सुरक्षा चक्कर किसने दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता से की गई चर्चा के बाद यह भी पता चला है कि दल बदल कानून के तहत यदि विधायक ढाई साल से पहले चुनाव लड़ता है तो उसे योग्य नहीं माना जाएगा। जाहिर है बागी हुए कांग्रेस के विधायकों को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र से कमल के फूल पर बाय इलेक्शन में टिकट नहीं मिल सकता।
पार्टी भले ही उन्हें टिकट दे दे, मगर आयोग मान्यता नहीं दे सकता। बावजूद इन सबके फिलहाल जितने विधायक मुख्यमंत्री के साथ हैं उसे गणित के हिसाब से सरकार का बाल बांका नहीं हो सकता। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस पूरे प्रकरण के बाद जहां प्रदेश में भाजपा और बागी विधायकों की छवि बुरी तरह से दागदार हुई है, वहीं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह की छवि सिंपैथी के साथ और ज्यादा निखर गई है।