Employees / सुप्रीम कोर्ट से सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज, अनुबंध कर्मचारियों के सेवा लाभ और वरिष्ठता का रास्ता साफ
हिमाचल प्रदेश में नियमित नियुक्ति से पहले अनुबंध आधार पर सेवाएं देने वाले कर्मचारियों से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सरकार की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो गई है। इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अनुबंध अवधि से जुड़े सेवा लाभ और वरिष्ठता के दावों पर राहत दी थी। सरकार की विशेष अनुमति याचिका भी सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी थी और अब पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद कर्मचारियों की निगाहें अदालत के फैसले की अनुपालना पर टिक गई हैं। मामले का असर करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों पर पड़ने और अनुबंध अवधि के वित्तीय लाभों से सरकार पर लगभग 8,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान बताया जा रहा है।
शिमला
अनुबंध सेवा को लाभ और वरिष्ठता में जोड़ने की लंबी लड़ाई
यह मामला उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्होंने नियमित नियुक्ति से पहले कई वर्षों तक विभिन्न सरकारी विभागों में अनुबंध आधार पर सेवाएं दी हैं। कर्मचारियों की मांग रही है कि अनुबंध पर दी गई सेवा को भी नियुक्ति की मूल तारीख से सेवा लाभ और वरिष्ठता की गणना में शामिल किया जाए।
इसी मांग को लेकर कर्मचारी अदालत पहुंचे थे। अलग-अलग मामलों में कर्मचारियों को न्यायिक राहत मिली और बाद में यह विवाद बड़े स्तर पर सरकार और कर्मचारियों के बीच कानूनी लड़ाई का रूप लेता गया। अब सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद कर्मचारियों की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
2003 से शुरू हुई थी अनुबंध भर्ती व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2003 से सरकारी विभागों में अनुबंध आधार पर भर्तियां की जाती रही हैं। शुरुआती दौर में नियमित होने के लिए कर्मचारियों को लंबा इंतजार करना पड़ता था और कई कर्मचारियों ने आठ वर्ष तक अनुबंध आधार पर सेवाएं दीं।
समय के साथ अलग-अलग सरकारों ने नियमितीकरण की अवधि में बदलाव किया। आठ वर्ष की अवधि को पहले सात, फिर पांच, तीन और बाद में दो वर्ष किया गया। इसी दौरान कर्मचारियों ने अनुबंध पर पहली नियुक्ति की तारीख से वित्तीय और वरिष्ठता संबंधी लाभ देने की मांग उठानी शुरू की।
2024 में बनाए कानून को कर्मचारियों ने दी थी चुनौती
अनुबंध अवधि के वित्तीय और सेवा लाभों को लेकर चल रहे विवाद के बीच प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट पारित किया था। इसमें अनुबंध और नियमित कर्मचारियों की सेवा शर्तों को अलग रखने का प्रावधान किया गया था।
इस व्यवस्था के तहत अनुबंध अवधि को नियमित कर्मचारियों के समान सेवा लाभ दिए जाने के दायरे से अलग रखा गया। कर्मचारियों ने इस कानून को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका पक्ष था कि इससे अनुबंध अवधि के दौरान दी गई सेवाओं और उनसे जुड़े लाभ प्रभावित हो रहे हैं।
445 याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने सुनाया था फैसला
देवेंद्र कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले से जुड़ी कुल 445 याचिकाओं पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने संबंधित कानून को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था।
हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के सेवा लाभ और वरिष्ठता से जुड़े दावों पर राहत देते हुए सरकार को निर्धारित समय में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
SLP के बाद अब Review Petition भी खारिज
प्रदेश सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका यानी SLP को सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया था। इसके बाद सरकार ने फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में Review Petition दाखिल की।
अब पुनर्विचार याचिका भी खारिज होने से मामले में कर्मचारियों की निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई पर हैं। हिमाचल हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा के अनुसार पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सरकार के लिए राहत प्राप्त करने के विकल्प सीमित हो गए हैं और अब अदालतों के निर्देशों की अनुपालना महत्वपूर्ण होगी।
करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों से जुड़ा बताया जा रहा मामला
इस फैसले का प्रभाव प्रदेश में बड़ी संख्या में उन कर्मचारियों पर पड़ सकता है, जिन्होंने नियमित होने से पहले अनुबंध आधार पर सेवाएं दी हैं। उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक यह मामला करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों से जुड़ा बताया जा रहा है।
अनुबंध अवधि को सेवा लाभों की गणना में शामिल किए जाने का प्रभाव केवल वित्तीय एरियर तक सीमित नहीं रहेगा। पात्र कर्मचारियों की वरिष्ठता और उससे जुड़े अन्य सेवा लाभों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
करीब 8,000 करोड़ के अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान
उपलब्ध अनुमानों के अनुसार अनुबंध अवधि के वित्तीय लाभों का भुगतान करने की स्थिति में प्रदेश सरकार को करीब 8,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतनमान के एरियर तथा दूसरे लंबित वित्तीय लाभों की देनदारी भी करीब 8,000 करोड़ रुपये बताई गई है।
दोनों देनदारियों को जोड़कर देखा जाए तो प्रदेश सरकार के सामने करीब 16,000 करोड़ रुपये तक का वित्तीय भार होने का अनुमान सामने आया है। हालांकि वास्तविक देनदारी पात्र कर्मचारियों, लागू किए जाने वाले लाभों और सरकार की ओर से अदालत के आदेशों की अनुपालना के तरीके पर निर्भर करेगी।
अब सरकार की अगली कार्रवाई पर कर्मचारियों की नजर
सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद कर्मचारियों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल अदालत के फैसले की अनुपालना का है। कर्मचारी चाहते हैं कि अनुबंध अवधि में दी गई सेवाओं को पात्रता के अनुसार सेवा लाभों की गणना में शामिल किया जाए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदेश सरकार अदालत के आदेशों को किस तरह लागू करती है और पात्र कर्मचारियों के वित्तीय लाभ, वरिष्ठता तथा अन्य सेवा संबंधी मामलों पर आगे क्या कार्रवाई की जाती है।