घेपन ग्लेशियल झील पर सितंबर में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम: किरण भड़ाना
लाहौल-स्पीति प्रशासन ने 4070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील की निरंतर निगरानी के लिए सितंबर 2026 में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की तैयारी की है। उपायुक्त किरण भड़ाना के अनुसार सी-डैक ने सिस्सू झील पर इस प्रणाली का सफल परीक्षण कर आवश्यक आंकड़े प्राप्त किए हैं। घेपन झील पर इसे लगाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अंतिम स्वीकृति आदेश मिलने की प्रतीक्षा है।
केलांग
उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना ने बताया कि नेपाल में 26 अगस्त 2026 को चीन अधिकृत तिब्बत की पहाड़ियों में ग्लेशियर फटने से आई बाढ़ और उससे हुई भारी जन-धन की क्षति को देखते हुए प्रशासन ने निगरानी तथा एहतियाती उपाय मजबूत करने का निर्णय लिया है। प्रस्तावित प्रणाली सी-डैक तिरुवनंतपुरम के माध्यम से लगाई जाएगी, जिससे झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी कर समय पर सूचना प्राप्त की जा सकेगी।
पांच विशेषज्ञ 14 दिन करेंगे वैज्ञानिक अध्ययन
घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों के विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेषज्ञों की टीम 1 सितंबर 2026 को झील क्षेत्र का दौरा करेगी। टीम करीब 14 दिन तक क्षेत्र में रहकर झील और आसपास के इलाकों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेगी। इसमें क्षेत्र की मैपिंग, हिमस्खलन एवं भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील स्थानों का सीमांकन तथा झील की गहराई, जल प्रवाह और मौसम संबंधी आंकड़ों का अध्ययन शामिल होगा। इसकी विस्तृत रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को दी जाएगी।
जिला प्रशासन सितंबर में एक अलग टीम भी झील की वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करने के लिए भेजेगा। नवंबर 2023 में इसरो ने प्रशासन को घेपन झील का आकार सामान्य स्तर की तुलना में काफी बढ़ने की जानकारी देते हुए एहतियाती कदम उठाने की सलाह दी थी। इसके बाद जुलाई 2024 में तत्कालीन उपायुक्त के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के 23 अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम ने झील का दौरा किया तथा संभावित नुकसान कम करने के उपायों पर रिपोर्ट तैयार कर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सौंपी थी।
34 स्थान संवेदनशील, स्थानीय दल गठित
प्रशासन के अनुसार घेपन झील के संभावित रूप से फटने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सिस्सू से हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक 34 स्थान संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किए गए हैं। इन क्षेत्रों के लोगों को आपदा से बचाव, जरूरी सावधानियों और त्वरित प्रतिक्रिया के संबंध में समय-समय पर जागरूक एवं प्रशिक्षित किया जा रहा है। सिस्सू और शाशिन गांवों में स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दल बनाए गए हैं, जबकि आपदा जोखिम न्यूनीकरण के कार्यों के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अतिरिक्त वित्तीय सहयोग मांगा गया है।
घेपन झील सिस्सू से करीब 11 किलोमीटर दूर है, जबकि झील से उदयपुर होते हुए जिले की अंतिम सीमा तक की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। संभावित बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत 32 संवेदनशील स्थानों पर हाई फ्लड लेवल मार्किंग का काम शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य सामान्य और संभावित बाढ़ स्तर का स्थायी संदर्भ उपलब्ध करवाना, नदी किनारे रहने वाले लोगों में जोखिम के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा आपदा की स्थिति में तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया को मजबूत करना है।
जीएलओएफ निगरानी समिति का होगा गठन
जिला स्तर पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड निगरानी समिति भी गठित की जा रही है। इसमें विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ पर्वतारोहण और संबंधित क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को शामिल किया जाएगा। समिति घेपन झील एवं आसपास के क्षेत्रों का समय-समय पर निरीक्षण करेगी और ढीली चट्टानों, अस्थिर भू-भाग तथा अन्य संभावित खतरों का आकलन करेगी। इसके साथ जोखिम घटाने की रणनीति, जरूरी शमन उपाय और आपदा के समय प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर भी काम किया जाएगा।
किरण भड़ाना ने कहा कि प्रशासन वैज्ञानिक निगरानी, विशेषज्ञ अध्ययन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक प्रशिक्षण और विभागीय समन्वय के माध्यम से घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिम कम करने के लिए काम कर रहा है। प्रशासन का उद्देश्य संभावित आपदा से पहले प्रभावी तैयारी सुनिश्चित करना और किसी आपात स्थिति में समय पर बचाव एवं राहत कार्य शुरू करके जन-धन की हानि को न्यूनतम रखना है।
