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हिमाचल में सेब के फलों की ड्रॉपिंग बढ़ी, मौसम की स्थिति पर टिकी इस वर्ष की फसल

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन2 • 1 Hour Ago • 1 Min Read

हिमाचल प्रदेश के कई सेब उत्पादक क्षेत्रों में छोटे फलों की ड्रॉपिंग दर्ज की जा रही है, जिससे इस वर्ष के उत्पादन को लेकर आकलन प्रभावित हो सकता है। बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि आगामी सप्ताहों में मौसम की स्थिति फसल के विकास और अंतिम उत्पादन को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक होगी।

ठियोग

सेब उत्पादक क्षेत्रों में बढ़ी फलों की ड्रॉपिंग

प्रदेश में सेब सीजन शुरू होने से पहले ऊपरी और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के छोटे फलों की ड्रॉपिंग देखने को मिल रही है। ठियोग, कोटखाई, रोहड़ू, चौपाल, कोटगढ़, कुमारसेन और आसपास के कई सेब उत्पादक क्षेत्रों में बागवानों ने पेड़ों से लगातार फल गिरने की जानकारी दी है। मई माह के अंतिम सप्ताह में दर्ज की जा रही इस स्थिति ने फसल के विकास और संभावित उत्पादन को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। बागवानों का कहना है कि कई बागों में फल सेटिंग के बाद अपेक्षा से अधिक ड्रॉपिंग दर्ज की जा रही है, जिससे पेड़ों पर फलों की संख्या प्रभावित हुई है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में इसकी स्थिति अलग-अलग है, लेकिन अधिकांश बागवान मौसम की आगामी परिस्थितियों को फसल के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण है सेब बागवानी

हिमाचल प्रदेश में सेब बागवानी प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रदेश के लगभग ढाई लाख से अधिक परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सेब उत्पादन, पैकेजिंग, परिवहन, विपणन और संबंधित गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। सामान्य वर्षों में हिमाचल प्रदेश से पांच से छह करोड़ पेटियों तक सेब उत्पादन दर्ज किया जाता रहा है। राज्य के शिमला, कुल्लू, मंडी, किन्नौर, चंबा और सिरमौर जिलों के अनेक क्षेत्रों में सेब बागवानी आय का प्रमुख स्रोत है। इस वर्ष कई इलाकों में पेड़ों पर फलों की संख्या अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है, जिसके चलते उत्पादन को लेकर विभिन्न स्तरों पर आकलन किए जा रहे हैं। बागवानों का कहना है कि यदि मौसम अनुकूल नहीं रहा तो कुल उत्पादन सामान्य वर्षों की तुलना में कम रह सकता है।

मौसम में उतार-चढ़ाव का पड़ा प्रभाव

बागवानों के अनुसार इस वर्ष मौसम का चक्र सामान्य पैटर्न से कुछ अलग रहा है। मार्च और अप्रैल के दौरान कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया गया, जिससे मिट्टी में नमी की उपलब्धता प्रभावित हुई। इसके बाद मई माह में रुक-रुक कर हुई वर्षा, तेज हवाओं और कुछ स्थानों पर ओलावृष्टि का असर भी फसल पर पड़ा। मौसम में लगातार हो रहे बदलाव का प्रभाव फल सेटिंग, परागण प्रक्रिया और शुरुआती विकास चरण पर देखने को मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में अचानक परिवर्तन, नमी की कमी और तेज हवाओं जैसी परिस्थितियां छोटे फलों के गिरने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। कई क्षेत्रों में बागवानों ने बताया कि मौसम की अस्थिरता के कारण फसल प्रबंधन की चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

जून माह की परिस्थितियां रहेंगी महत्वपूर्ण

बागवानों का मानना है कि जून माह के दौरान मौसम की स्थिति फसल के आगे के विकास के लिए महत्वपूर्ण होगी। इस अवधि में फलों का आकार बढ़ने की प्रक्रिया तेज होती है और पेड़ों पर टिके फलों की गुणवत्ता भी इसी चरण में प्रभावित होती है। यदि मौसम सामान्य रहता है और अत्यधिक वर्षा, तेज हवाएं या ओलावृष्टि जैसी परिस्थितियां नहीं बनती हैं तो पेड़ों पर मौजूद फलों के आकार और गुणवत्ता में सुधार की संभावना बनी रहेगी। वहीं प्रतिकूल मौसम की स्थिति उत्पादन के अंतिम आंकड़ों को प्रभावित कर सकती है। इसी कारण प्रदेश के अधिकांश सेब उत्पादक क्षेत्रों में बागवान मौसम पूर्वानुमानों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और बागों में आवश्यक प्रबंधन कार्य कर रहे हैं।

विशेषज्ञों ने प्राकृतिक प्रक्रिया भी बताया कारण

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एसपी भारद्वाज ने बताया कि वर्तमान में हो रही ड्रॉपिंग का एक हिस्सा प्राकृतिक प्रक्रिया का भी भाग होता है। उनके अनुसार सेब के पेड़ों पर जब आवश्यकता से अधिक फल लग जाते हैं तो पेड़ अपनी क्षमता के अनुसार कमजोर फलों को स्वतः गिरा देते हैं और अपेक्षाकृत मजबूत फल विकास की प्रक्रिया में आगे बढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती चरण में सीमित मात्रा में फल गिरना सामान्य माना जाता है। हालांकि मौसम संबंधी कारक इस प्रक्रिया की तीव्रता को प्रभावित कर सकते हैं। डॉ. भारद्वाज के अनुसार पिछले कुछ दिनों में मिले अपेक्षाकृत अनुकूल मौसम का लाभ पेड़ों पर बचे हुए फलों को मिल सकता है और उनके आकार में वृद्धि की संभावना बनी हुई है।

वैज्ञानिक प्रबंधन पर दिया जोर

डॉ. भारद्वाज ने बागवानों को बागों की नियमित निगरानी, संतुलित पोषण प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था और रोग एवं कीट नियंत्रण उपायों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि मौसम में बदलाव की स्थिति में वैज्ञानिक सलाह के अनुसार प्रबंधन करना आवश्यक है। समय पर पोषक तत्वों की उपलब्धता, उचित छंटाई, रोग नियंत्रण और नमी प्रबंधन जैसे उपाय फसल की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। उनका कहना है कि वैज्ञानिक पद्धतियों के अनुसार बागों का प्रबंधन करने से पेड़ों पर टिके हुए फलों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता दोनों को बेहतर बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

गुणवत्ता और उत्पादन पर रहेगी नजर

बागवानी क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह फसल के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि जून और जुलाई के दौरान मौसम सामान्य बना रहता है तो पेड़ों पर बचे फलों का आकार, रंग और गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। ऐसी स्थिति में बाजार में बेहतर गुणवत्ता वाले सेब की उपलब्धता बढ़ सकती है। दूसरी ओर मौसम में बड़े बदलाव की स्थिति उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल प्रदेश के विभिन्न सेब उत्पादक क्षेत्रों में फसल की स्थिति, मौसम के प्रभाव और उत्पादन संभावनाओं का लगातार आकलन किया जा रहा है। बागवानों और विशेषज्ञों दोनों की नजर आगामी मौसम परिस्थितियों पर बनी हुई है, जो इस वर्ष की सेब फसल के अंतिम परिणाम को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक मानी जा रही हैं।

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