दवा कंपनी के साझेदारों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत
हिमाचल हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्यवाही, कहा – केवल पद के आधार पर नहीं ठहराया जा सकता जिम्मेदार
शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बद्दी स्थित एक फार्मास्युटिकल कंपनी और उसके साझेदारों को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी के साझेदारों को केवल उनके पद या नाम के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जब तक उनके खिलाफ कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में प्रत्यक्ष भूमिका के ठोस साक्ष्य मौजूद न हों।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की एकल पीठ ने मैसर्स वीएडीएसपी फार्मास्युटिकल्स और उसके साझेदारों द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने नालागढ़ न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही और जारी समन आदेशों को निरस्त करने के निर्देश दिए।
जानकारी के अनुसार यह मामला ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के तहत भारत सरकार की ओर से ड्रग इंस्पेक्टर द्वारा दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंपनी द्वारा निर्मित “पॉलीमाइसिन आई ड्रॉप्स” के नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे थे। इसी आधार पर कंपनी के साझेदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून के तहत किसी भी साझेदार या निदेशक को तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जब शिकायत में स्पष्ट रूप से यह दर्शाया गया हो कि कथित अपराध के समय वह व्यक्ति कंपनी के संचालन और निर्णय प्रक्रिया के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार था।
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि संबंधित साझेदार कंपनी की दैनिक गतिविधियों या कथित निर्माण दोष में किसी विशेष भूमिका में थे। ऐसे में केवल साझेदार होने के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार हाईकोर्ट का यह फैसला कॉर्पोरेट और फार्मा सेक्टर से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे भविष्य में कंपनियों के साझेदारों और निदेशकों की जवाबदेही तय करने के मामलों में स्पष्ट कानूनी दिशा मिलने की संभावना है।