निलंबन को दंड नहीं माना जा सकता, कर्मचारी की याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारी के निलंबन को विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए संबंधित याचिका को खारिज कर दिया है। वहीं, एक अन्य मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपनी के भागीदारों पर मुकदमा चलाने के लिए शिकायत में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका का स्पष्ट उल्लेख होना आवश्यक है।
शिमला
निलंबन को विभागीय प्रक्रिया बताया
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी का निलंबन किसी प्रकार की सजा या दंड नहीं माना जा सकता, बल्कि यह विभागीय प्रक्रिया के तहत की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने निलंबन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सीसीएस और सीसीए नियमों के नियम 10 के तहत किसी कर्मचारी को निलंबित करने से पहले कारण बताओ नोटिस जारी करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान स्तर पर कर्मचारी की बेगुनाही या दोष के संबंध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि विभागीय जांच की प्रक्रिया अभी लंबित है। न्यायालय ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने नियमों के तहत उपलब्ध वैधानिक अपील के अधिकार का उपयोग नहीं किया और सीधे अदालत का रुख किया। सीसीएस-सीसीए नियमों के नियम 23(i) के तहत निलंबन आदेश के खिलाफ अपील का प्रावधान उपलब्ध है।
27 अप्रैल 2026 के निलंबन आदेश को दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता, जो एक सरकारी कर्मचारी है, को विभाग द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत निलंबित किया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत में दायर याचिका में कहा था कि वह आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं था और उसे निलंबन से पहले कोई कारण बताओ नोटिस भी जारी नहीं किया गया। याचिका में इस कार्रवाई को भेदभावपूर्ण बताते हुए 27 अप्रैल 2026 को जारी निलंबन आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। हालांकि अदालत ने विभाग को जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
कंपनी भागीदारों के खिलाफ कार्रवाई भी रद्द
एक अन्य मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वीएडीएसपी फार्मास्यूटिकल्स और उसके भागीदारों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत तथा उससे संबंधित कार्रवाई को रद्द कर दिया। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि किसी फर्म के भागीदारों को केवल उनके पद के आधार पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक शिकायत में उनके विशिष्ट कार्यों और दैनिक संचालन में प्रत्यक्ष भूमिका का स्पष्ट विवरण न दिया गया हो।अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नालागढ़ (बद्दी) की अदालत में लंबित शिकायत और उसके तहत शुरू की गई कार्रवाई को निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता केवल फर्म के भागीदार थे और फर्म ने तकनीकी कार्यों तथा व्यावसायिक लेनदेन के लिए अलग से तकनीकी प्रभारी नियुक्त किया हुआ था।
शिकायत में प्रत्यक्ष भूमिका का उल्लेख जरूरी
न्यायालय ने कहा कि शिकायत में भागीदारों की दैनिक गतिविधियों में संलिप्तता का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, इसलिए उन्हें सीधे तौर पर उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पर्याप्त आधार के बिना मामले को जारी रखना याचिकाकर्ताओं के लिए अनावश्यक कानूनी प्रक्रिया बन सकता है।सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य प्रस्तुत करे कि आरोपी फर्म के संचालन और निर्णय प्रक्रिया का प्रभारी था। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि नमूनों को सरकारी विश्लेषक के पास भेजने और रिपोर्ट प्राप्त करने में अत्यधिक देरी हुई, जो ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की संबंधित धाराओं के प्रावधानों के विपरीत है।