हिंदू धर्म में ‘काला महीना’ क्या है, नवविवाहिता के मायके जाने की परंपरा भी जानें
हिंदू धर्म में आम बोलचाल में प्रयुक्त ‘काला महीना’ कोई सर्वमान्य शास्त्रीय नाम नहीं है। क्षेत्र और स्थानीय परंपरा के अनुसार इसे भाद्रपद, अधिकमास, मलमास या खरमास जैसी अलग-अलग अवधियों से जोड़कर देखा जाता है। हिमाचल प्रदेश सहित उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में इस अवधि के दौरान नवविवाहिता को कुछ समय के लिए मायके भेजने की लोकपरंपरा भी रही है, लेकिन इसे पूरे हिंदू धर्म का अनिवार्य नियम नहीं माना जाता।
हमीरपुर / राजन कुमार शर्मा
हिंदू परंपरा में वर्ष के प्रत्येक महीने का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। कुछ अवधियों में सांसारिक शुभ कार्यों के बजाय आत्मचिंतन, संयम, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना पर अधिक ध्यान देने की मान्यता रही है। इसी कारण कई परिवार ऐसी अवधि में विवाह, गृहप्रवेश और मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज करते हैं। हालांकि ये परंपराएं प्रत्येक क्षेत्र और संप्रदाय में समान नहीं हैं। किसी शुभ कार्य के लिए स्थानीय पंचांग और विद्वान की सलाह लेने की परंपरा भी प्रचलित है।
नवविवाहिता के मायके जाने की लोकपरंपरा
हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में विवाह के बाद ‘काला महीना’ आने पर नई दुल्हन को लगभग एक महीने के लिए मायके भेजने की परंपरा देखने को मिलती है। कुछ परिवारों में इस दौरान नवविवाहिता ससुराल में नहीं रहती। यह रीति क्षेत्र, समुदाय और परिवार के अनुसार बदलती है। हिंदू धर्मग्रंथों में ऐसा कोई सार्वभौमिक विधान नहीं मिलता कि प्रत्येक नवविवाहिता को इस अवधि में अनिवार्य रूप से ससुराल छोड़कर मायके में रहना चाहिए। इसलिए इसे स्थानीय लोकाचार और पारिवारिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।
पुराने समय में विवाह के बाद लड़की नए घर, नए लोगों और नई जिम्मेदारियों के बीच आती थी। ऐसे में कुछ समय मायके में बिताने से उसे भावनात्मक रूप से सहज होने और अपने माता-पिता के साथ रहने का अवसर मिलता था। हिमाचल के पहाड़ी समाज में मौसम, कृषि चक्र, धार्मिक पर्व और सामाजिक जीवन भी एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित यातायात के दौर में बेटी का बार-बार मायके आना आसान नहीं था। ऐसे अवसर दोनों परिवारों के बीच मेल-मिलाप का माध्यम भी बनते थे।
वैज्ञानिक नियम नहीं, सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण
इस परंपरा को सीधे तौर पर वैज्ञानिक नियम कहना उचित नहीं है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विवाह के बाद मायके में कुछ समय बिताना नवविवाहिता को भावनात्मक सहारा दे सकता है। वह अपने अनुभव परिवार के साथ साझा कर सकती है और बदले हुए जीवन के बीच मानसिक सहजता पा सकती है। इसके बावजूद किसी निश्चित अवधि, विशेषकर एक महीने, को वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं माना जा सकता। परंपरा निभाने का निर्णय नवविवाहिता की इच्छा, सुविधा और पारिवारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।
यदि नवविवाहिता स्वयं इस परंपरा को खुशी से स्वीकार करती है, तो यह परिवारों के रिश्ते मजबूत करने का माध्यम बन सकती है। लेकिन इसे भय, अशुभता या दबाव के साथ लागू करने पर इसका सकारात्मक सामाजिक उद्देश्य समाप्त हो सकता है। वर्तमान समय में शिक्षा, नौकरी, छोटे परिवारों और आसान आवागमन के कारण पुरानी परंपराओं का स्वरूप भी बदल रहा है। कई परिवार अब ‘काला महीना’ जैसी मान्यताओं को कठोर नियम के बजाय परिवार से मिलने और लोकपरंपरा निभाने के अवसर के रूप में देखते हैं।
‘काला महीना’ और नवविवाहिता के मायके जाने की परंपरा में धार्मिक विश्वासों के साथ सामाजिक और पारिवारिक भावनाएं भी जुड़ी हैं। इसका अर्थ सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है और इसे पूरे हिंदू धर्म का अनिवार्य नियम मानना उचित नहीं होगा। बदलते समय में इस लोकपरंपरा के पालन का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन परिवारों को जोड़ने और विवाह के बाद नवविवाहिता को भावनात्मक सहारा देने का इसका सामाजिक पक्ष महत्वपूर्ण माना जाता है।
