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अक्तूबर का पहला पखवाड़ा किसानों के लिए अहम, गेहूं-चना-राया की बिजाई से लेकर पशुधन की देखभाल तक कृषि विशेषज्ञों ने जारी की सलाह

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन • 48 Mins Ago • 1 Min Read

सिरमौर में मौसम के अनुसार फसल चयन और बीज उपचार पर जोर, सब्जी उत्पादकों व पशुपालकों को भी दिए जरूरी सुझाव

नाहन/धौलाकुआं

अक्तूबर का पहला पखवाड़ा सिरमौर के किसानों के लिए खेती की नई तैयारियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने किसानों और पशुपालकों के लिए अक्तूबर के प्रथम पखवाड़े में किए जाने वाले कृषि एवं पशुपालन कार्यों को लेकर विस्तृत सलाह जारी की है। इसमें गेहूं, चना और राया की बिजाई के साथ-साथ मटर, लहसुन और अन्य सब्जियों की खेती, फसल संरक्षण, पशुधन प्रबंधन और मत्स्य पालन से संबंधित जरूरी सुझाव दिए गए हैं।

सिरमौर के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों के किसान अक्तूबर के पहले पखवाड़े में गेहूं की अगेती किस्मों एचएस-542, एचपीडब्ल्यू-360 और वीएल-829 की बिजाई कर सकते हैं। बीज की मात्रा करीब 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों ने बिजाई से पहले बीज उपचार को जरूरी बताते हुए बैविस्टिन, वीटावैक्स अथवा रैक्सिल के निर्धारित अनुपात में प्रयोग की सलाह दी है।

मध्य अक्तूबर चने की बिजाई के लिए उपयुक्त समय बताया गया है। हिमाचल चना-1, हिमाचल चना-2, जीपीएफ-2 और एचपीजी-17 जैसी उन्नत किस्मों का चयन किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों ने चने की बिजाई से पहले बीज को उपचारित करने तथा उचित गहराई पर बिजाई करने की सलाह दी है, जिससे उखेड़ा और विल्ट जैसे रोगों से फसल को बचाया जा सके।

निचले पर्वतीय क्षेत्रों में राया की शुद्ध अथवा गेहूं के साथ मिश्रित खेती की जा सकती है। आरसीसी-4 और करण राई जैसी अनुमोदित किस्मों की बिजाई करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना जरूरी बताया गया है। वहीं निचले क्षेत्रों में मटर की अगेती किस्मों पालम त्रिलोकी, अरकल, वीएल-7 और मटर अगेता की बिजाई की जा सकती है।

लहसुन की जीएचसी-1 और सोलन सेलेक्शन जैसी सुधरी किस्मों की रोपाई के साथ पालक, मेथी, धनिया, मूली, गाजर और शलजम की बिजाई भी इस अवधि में करने की सलाह दी गई है। मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में फूलगोभी, बंदगोभी, गांठगोभी, चाईनीज बंदगोभी और ब्रॉकली की तैयार पौध खेतों में रोपने को कहा गया है।

कृषि विशेषज्ञों ने फसल संरक्षण को लेकर भी किसानों को सतर्क किया है। मटर की बिजाई से पहले बीज उपचार करने, कटुआ कीट से प्रभावित क्षेत्रों में उचित नियंत्रण उपाय अपनाने तथा तिलहनी फसलों में तेला की निगरानी करने की सलाह दी गई है। किसानों को कीटनाशकों का इस्तेमाल अनुशंसित मात्रा और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही करने को कहा गया है।

कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं के प्रमुख एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने किसानों से समय पर खेत तैयार करने और बीज उपचार को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि सिरमौर में अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों के कारण किसानों को स्थानीय मौसम, मिट्टी में नमी और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार फसल एवं किस्म का चयन करना चाहिए। उन्होंने किसानों से रोग या कीट की समस्या दिखाई देने पर बिना विशेषज्ञ सलाह के दवाओं का प्रयोग न करने की अपील की।

पशुपालकों के लिए भी अक्तूबर माह में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। बदलते मौसम में पशुओं को ठंड से बचाने के साथ उनके चारे, पानी और रखरखाव पर ध्यान देने को कहा गया है। भेड़-बकरी पालकों को फुट-रॉट रोग के प्रति सतर्क रहने तथा खुरों से खून या पस निकलने अथवा पशु के लंगड़ाकर चलने की स्थिति में तत्काल पशु चिकित्सक से संपर्क करने की सलाह दी गई है।

पशुओं को खुरपका-मुंहपका, लम्पी स्किन रोग, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और तीन दिन वाले बुखार जैसे संक्रामक रोगों से बचाने के लिए समय पर टीकाकरण करवाने को कहा गया है। पशुओं को साफ और गुनगुना पानी तथा प्रोटीन, विटामिन और खनिज युक्त संतुलित आहार देने पर भी जोर दिया गया है।

मत्स्य पालकों को सुबह के समय तालाब में ताजा पानी डालने अथवा एरेटर चलाने की सलाह दी गई है। पर्याप्त ऑक्सीजन मछलियों के स्वास्थ्य और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। तालाब में प्लवक की संख्या बढ़ाने के लिए अनुशंसित जैविक अथवा अकार्बनिक खाद का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

गृह विज्ञान विशेषज्ञों ने परिवार के भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, दूध उत्पाद, मौसमी फल और मोटे अनाज शामिल करने की सलाह दी है। बरसात के बाद बढ़ी नमी को देखते हुए भोजन और पानी को ढककर रखने तथा स्वच्छता का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। किसानों के परिवार मौसमी फलों और सब्जियों से अचार, जैम, स्क्वैश, सूखी सब्जियां, पापड़ सहित विभिन्न मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर अतिरिक्त आमदनी के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।

कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों और पशुपालकों से अपने क्षेत्र की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अधिक विशिष्ट जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क बनाए रखने का आग्रह किया है। कृषि तकनीकी सूचना केंद्र एटिक के दूरभाष नंबर 01894-230395 और 1800-180-1551 पर भी विशेषज्ञ सलाह ली जा सकती है।

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