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सूखते झरनों की जड़ों तक पहुंचेगी प्रयास सोसाइटी, गांव-गांव सर्वे से खुलेगा जल संकट का सच

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 1 Hour Ago • 1 Min Read

सिरमौर में लगातार सूख रहे प्राकृतिक जल स्रोतों की वास्तविक वजहों का पता लगाने के लिए प्रयास सोसाइटी ने व्यापक अध्ययन शुरू किया है। टीम गांवों में जाकर जल स्रोतों की स्थिति, भूजल स्तर और पर्यावरणीय बदलावों का फील्ड सर्वे कर रही है। साथ ही स्थानीय लोगों के अनुभवों और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

सिरमौर

जिला सिरमौर में लगातार सूख रहे प्राकृतिक जल स्रोतों की वास्तविक वजहों का पता लगाने के लिए प्रयास सोसाइटी ने व्यापक अध्ययन शुरू किया है। वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय लोगों के पारंपरिक अनुभवों को एक साथ जोड़कर संस्था यह जानने का प्रयास कर रही है कि आखिर वर्षों से जीवनदायिनी रहे झरने और चश्मे क्यों सूखते जा रहे हैं।संस्था के सचिव धीरज रामौल के नेतृत्व में टीम जिले के विभिन्न क्षेत्रों में उन प्राकृतिक जल स्रोतों का मौके पर निरीक्षण कर रही है, जिनका जल प्रवाह पिछले कुछ वर्षों में कम हुआ है या जो पूरी तरह सूख चुके हैं। अध्ययन के दौरान जलग्रहण क्षेत्र, वनस्पति, भू-आकृति तथा आसपास हुए पर्यावरणीय बदलावों का भी बारीकी से आकलन किया जा रहा है।

अध्ययन की सबसे खास बात यह है कि टीम गांवों के बुजुर्गों, किसानों, महिलाओं और स्थानीय निवासियों से संवाद कर रही है। उनसे यह जानकारी जुटाई जा रही है कि पहले इन जल स्रोतों की स्थिति कैसी थी, वर्षभर कितना पानी उपलब्ध रहता था, कब से जल प्रवाह कम होना शुरू हुआ और उनके अनुभव के अनुसार इसके पीछे क्या कारण रहे।प्रयास सोसाइटी बोरवेल और हैंडपंपों की बढ़ती संख्या, भूजल स्तर में गिरावट, जल पुनर्भरण क्षेत्रों की स्थिति, वनों में कमी, भूमि उपयोग में परिवर्तन, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों का भी अध्ययन कर रही है। प्रारंभिक अवलोकनों में कई क्षेत्रों में प्राकृतिक झरनों का जल प्रवाह काफी कम होने या पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति सामने आई है। ग्रामीणों ने अत्यधिक भूजल दोहन, अनियोजित बोरवेल और प्राकृतिक जल पुनर्भरण क्षेत्रों के क्षरण को इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया है।

संस्था ग्राम स्तर पर सर्वेक्षण, फोकस ग्रुप चर्चा और फील्ड स्टडी के माध्यम से तथ्य एकत्र कर रही है। अध्ययन के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसमें प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए व्यवहारिक सुझाव भी शामिल होंगे। यह रिपोर्ट भविष्य में नीति निर्माण और सरकारी योजनाओं के लिए भी उपयोगी आधार बन सकती है।संस्था के सचिव धीरज रामौल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता जल संकट भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यदि समय रहते प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट और गहरा सकता है।उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि उनके क्षेत्र में कोई प्राकृतिक जल स्रोत सूख गया है या उसका जल प्रवाह कम हो गया है तो उसकी जानकारी प्रयास सोसाइटी को उपलब्ध कराएं, ताकि उसे भी अध्ययन में शामिल किया जा सके।