टांडा मेडिकल कॉलेज में पहला रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट सफल, एबीओ कम्पैटिबल प्रक्रिया से उपचार संभव
Himachalnow / कांगड़ा
टांडा मेडिकल कॉलेज में पहली बार रोबोटिक तकनीक के माध्यम से किडनी ट्रांसप्लांट किया गया है, जिसमें एबीओ कम्पैटिबल प्रक्रिया अपनाई गई। चिकित्सा टीम द्वारा समन्वित प्रयासों से यह सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की गई है।
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रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट की शुरुआत
डा. राजेंद्र प्रसाद राजकीय आयुर्विज्ञान चिकित्सा महाविद्यालय टांडा में पहली बार रोबोटिक तकनीक के माध्यम से किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया पूरी की गई है। संस्थान में इससे पहले 22 किडनी ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, लेकिन यह पहला अवसर है जब एबीओ कम्पैटिबल रोबोटिक ट्रांसप्लांट किया गया है। इस प्रक्रिया में रक्त समूह की संगतता के आधार पर दाता और प्राप्तकर्ता के बीच प्रत्यारोपण किया गया, जिससे उपचार के विकल्पों का दायरा बढ़ा है।
चिकित्सा टीम की भूमिका
इस जटिल सर्जिकल प्रक्रिया को एक समन्वित टीम द्वारा पूरा किया गया, जिसमें सर्जिकल टीम के रूप में डॉ. अमित शर्मा, डॉ. सोमराज महाजन, डॉ. आशीष शर्मा, डॉ. दीपेश और डॉ. कुशल शामिल रहे। इसके साथ ही नेफ्रोलॉजी विभाग की टीम, जिसमें विभागाध्यक्ष डॉ. अभिनव राणा, डॉ. दिव्यम, डॉ. साक्षी और डॉ. हर्षिता शामिल थे, ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। एनेस्थीसिया टीम का संचालन डॉ. नानीश और उनकी टीम द्वारा किया गया, जिन्होंने सर्जरी के दौरान आवश्यक चिकित्सा प्रबंधन सुनिश्चित किया।
प्रक्रिया और समन्वय
ट्रांसप्लांट प्रक्रिया के दौरान दाता लवली द्वारा अपने पति अजय को किडनी दान की गई। इस पूरी प्रक्रिया का समन्वय ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर नीरज जम्वाल और कल्पना शर्मा द्वारा किया गया। रोबोटिक असिस्टेड सर्जरी के उपयोग से सर्जरी में सटीकता बढ़ती है, ऑपरेशन के दौरान शारीरिक आघात कम होता है और मरीज की रिकवरी अवधि अपेक्षाकृत कम रहती है।
एबीओ कम्पैटिबल का महत्व
एबीओ कम्पैटिबल का अर्थ है कि अंग प्रत्यारोपण या रक्त आधान के दौरान दाता और प्राप्तकर्ता के रक्त समूह में संगतता हो। इससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा अस्वीकृति की संभावना कम होती है। सामान्यतः ओ रक्त समूह को यूनिवर्सल डोनर और एबी को यूनिवर्सल रिसीवर माना जाता है, जबकि असंगत रक्त समूह के मामलों में चिकित्सकीय जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।