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धान में बौना (स्टंटिंग वायरस) रोग बना किसानों के लिए नई चुनौती, समय रहते नियंत्रण से बचाई जा सकती है पूरी फसल

Shailesh Saini • 1 Hour Ago • 1 Min Read

कृषि विज्ञान केंद्र धौला कुआं के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने किसानों को जारी की एडवाइजरी, वाहक कीट पर नियंत्रण को बताया सबसे प्रभावी उपाय

हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन/ धौला कुआं

धान की फसल में तेजी से नुकसान पहुंचाने वाला बौना (स्टंटिंग वायरस) रोग किसानों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। यदि समय पर इसकी पहचान और समेकित प्रबंधन नहीं किया गया तो यह रोग धान की पैदावार में भारी गिरावट ला सकता है। किसानों को इस रोग से सतर्क रहने और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार प्रबंधन अपनाने की अपील करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, धौला कुआं के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने विस्तृत जानकारी साझा की है।

डॉ. मित्तल ने बताया कि यह एक विषाणु जनित रोग है, जिसका प्रसार मुख्य रूप से ग्रीन लीफ हॉपर तथा सफेद पीठ वाला फुदका (नेफोटेटिक्स प्रजाति) जैसे वाहक कीटों के माध्यम से होता है। संक्रमित कीट स्वस्थ पौधों का रस चूसते समय वायरस को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचा देते हैं, जिससे खेत में रोग तेजी से फैल जाता है।
उन्होंने बताया कि इस रोग से प्रभावित पौधे सामान्य पौधों की तुलना में बौने, कमजोर और पीले दिखाई देते हैं। पौधों की पत्तियां छोटी, संकरी और खड़ी हो जाती हैं तथा जड़ों का विकास भी प्रभावित होता है। ऐसे पौधों में बालियां ठीक प्रकार से विकसित नहीं हो पातीं, जिससे उत्पादन में भारी कमी आती है।
डॉ. मित्तल के अनुसार 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान, अधिक नमी, खेत में लगातार पानी भरा रहना, संक्रमित पौधों की उपस्थिति तथा यूरिया का अत्यधिक प्रयोग इस रोग के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। इसलिए किसानों को संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना चाहिए और नाइट्रोजन का आवश्यकता से अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।

उन्होंने किसानों को सलाह दी कि रोगमुक्त एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें, स्वस्थ नर्सरी तैयार करें, नर्सरी और मुख्य खेत में नियमित रूप से ग्रीन लीफ हॉपर व सफेद पीठ वाले फुदके की निगरानी करें तथा प्रति एकड़ 20 से 25 पीले चिपचिपे (येलो स्टिकी) ट्रैप लगाएं। संक्रमित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट करें तथा खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखें।

डॉ. मित्तल ने कहा कि यदि खेत में वाहक कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर से अधिक दिखाई दे तो केवल कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर अनुशंसित कीटनाशियों का ही प्रयोग करें। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना आवश्यकता बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव न करें और दवा का प्रयोग हमेशा लेबल पर दिए गए निर्देशों के अनुसार ही करें।

उन्होंने कहा कि बौना (स्टंटिंग वायरस) रोग का कोई प्रत्यक्ष उपचार नहीं है, इसलिए वाहक कीटों पर प्रभावी नियंत्रण ही इससे बचाव का सबसे कारगर और वैज्ञानिक उपाय है। नियमित निगरानी, समय पर पहचान और समेकित प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी धान की फसल और उत्पादन को सुरक्षित रख सकते हैं।

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