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पंचायत पुनर्गठन पर सरकार को राहत, लेकिन चुनाव आयोग सख्त—31 मार्च तक हर हाल में जारी करना होगा आरक्षण रोस्टर

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन • 29 Mar 2026 • 1 Min Read

हिमाचल प्रदेश में पंचायत पुनर्गठन को लेकर चल रही प्रक्रिया में सरकार को राहत मिली है। चुनाव आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट समयसीमा तय की है। 31 मार्च 2026 तक आरक्षण रोस्टर हर हाल में जारी करना अनिवार्य किया गया है।

शिमला

आयोग की सख्ती और समयसीमा का निर्देश

हिमाचल प्रदेश में पंचायत पुनर्गठन को लेकर चल रही प्रशासनिक और कानूनी खींचतान के बीच राज्य सरकार को फिलहाल राहत मिल गई है, लेकिन यह राहत पूरी तरह बिना शर्त नहीं है। राज्य चुनाव आयोग ने नई ग्राम पंचायतों के गठन और पुनर्गठन से जुड़ी चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति तो दे दी है, लेकिन साथ ही सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि 31 मार्च 2026 तक आरक्षण रोस्टर हर हाल में जारी करना होगा। आयोग ने साफ कहा है कि पंचायत चुनाव जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में भविष्य में इस तरह की देरी या लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

मामले की पृष्ठभूमि और आयोग की नाराजगी

मामला उन नई ग्राम पंचायतों से जुड़ा है, जिनका गठन राज्य सरकार ने किया है और जिनके संबंध में पंचायती राज विभाग ने राज्य चुनाव आयोग से एक्स पोस्ट फैक्टो राहत मांगी थी। यह राहत उच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत मांगी गई थी। आयोग ने इस पूरे मामले पर विचार करते हुए सरकार की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताई और कहा कि पहले भी स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके थे, लेकिन उनका समय पर पालन नहीं किया गया। आयोग के आदेशों के मुताबिक सरकार को पहले ही 31 मार्च 2025 तक पंचायतों के गठन, पुनर्गठन, परिसीमन और आरक्षण से जुड़ी पूरी प्रक्रिया संपन्न कर लेनी चाहिए थी, ताकि चुनाव प्रक्रिया तय समय पर और बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सके। इसके बावजूद विभिन्न स्तरों पर देरी होती रही और प्रक्रिया लंबित बनी रही।

देरी के कारण उठाए गए कदम

आयोग ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया है कि इसी देरी के कारण उसे 17 नवंबर 2025 को पंचायतों की सीमाओं को फ्रीज करना पड़ा था और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू करना पड़ा। आयोग ने यह भी याद दिलाया कि सरकार ने उच्च न्यायालय में लंबित एक मामले के दौरान 24 फरवरी 2026 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उस वादे को भी समय पर पूरा नहीं किया जा सका। यही नहीं, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के विभिन्न आदेशों का हवाला देते हुए यह दोहराया कि चुनावी प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।

शर्तों के साथ मिली राहत

हालांकि इन तमाम परिस्थितियों और देरी के बावजूद आयोग ने सरकार को पूरी तरह झटका नहीं दिया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि सरकार द्वारा 27 मार्च 2026 को दिए गए उस आश्वासन को ध्यान में रखा गया है, जिसमें बताया गया कि पुनर्गठित पंचायतों में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है और 31 मार्च 2026 तक आरक्षण प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी। इसी आश्वासन के आधार पर आयोग ने सरकार को सीमित और सशर्त राहत देने का फैसला लिया। आयोग ने साफ किया कि यह छूट केवल उन्हीं पंचायतों के लिए मान्य होगी, जो फ्लैग-ए और फ्लैग-बी सूची में शामिल हैं। यानी यह राहत व्यापक या सामान्य नहीं, बल्कि केवल चिन्हित पंचायतों तक सीमित रहेगी।

आगे के लिए सख्त दिशा-निर्देश

राज्य चुनाव आयोग ने अपने आदेश में आगे के लिए भी बेहद स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने कहा है कि राज्य की सभी पंचायतों में आरक्षण प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक हर हाल में पूरी की जाए और भविष्य में यह सुनिश्चित किया जाए कि चुनाव प्रक्रिया पांच वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति से कम से कम छह माह पहले शुरू हो। आयोग ने यह भी कहा कि सभी उपायुक्तों को चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से कम से कम तीन माह पहले आरक्षण रोस्टर जारी करना होगा, ताकि अंतिम समय में किसी तरह की प्रशासनिक या कानूनी बाधा खड़ी न हो। इसके साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पंचायतों की सीमाएं एक बार तय होने के बाद उन्हें चुनाव से ठीक पहले बदलने जैसी स्थिति दोबारा नहीं बननी चाहिए।

संवैधानिक महत्व और आगे की स्थिति

आयोग के इस आदेश को पंचायत चुनावों की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण प्रशासनिक और संवैधानिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर सरकार को नई पंचायतों के संदर्भ में तत्काल राहत मिल गई है, तो दूसरी ओर चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट संदेश भी दे दिया है कि चुनावी प्रक्रिया में देरी, अस्पष्टता और अंतिम समय के फैसलों को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब सबकी निगाहें 31 मार्च की उस निर्णायक समयसीमा पर टिक गई हैं, जिसके भीतर सरकार को आरक्षण रोस्टर जारी कर यह साबित करना होगा कि पंचायत चुनावों की राह में अब कोई नई अड़चन नहीं आएगी।