पहाड़ों की कीमत पर विकास मंजूर नहीं, खनन में जवाबदेही तय करे सरकार
संगड़ाह में 782 बीघा भूमि पर अवैज्ञानिक खनन का आरोप, चूड़धार से रेणुका जी तक पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई तेज करेंगे पूर्व सैनिक
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन
देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिकों ने अब हिमाचल के पहाड़ों, जंगलों और जलस्रोतों को बचाने की लड़ाई छेड़ दी है। उनका सवाल साफ है कि जब विकास और खनन के नाम पर पहाड़ों का सीना छलनी होगा, जलस्रोत प्रभावित होंगे और धार्मिक स्थलों से लेकर स्कूलों तक की सुरक्षा पर खतरा मंडराएगा, तो इसकी जवाबदेही कौन लेगा? इसी मुद्दे पर पहाड़ी समाज पर्यावरणी कवच फाउंडेशन और वसुंधरा संरक्षण समिति, संगड़ाह ने सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगते हुए संघर्ष तेज करने का ऐलान किया है।
शुक्रवार को नाहन में आयोजित संयुक्त पत्रकार वार्ता में पूर्व मेजर जनरल एवं पहाड़ी समाज पर्यावरणी कवच फाउंडेशन के संस्थापक अतुल कौशिक ने कहा कि संस्था विकास या खनन के विरोध में नहीं है, लेकिन विकास वैज्ञानिक तरीके से होना चाहिए। पहाड़ों की पर्यावरणीय क्षमता, स्थानीय आबादी की सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है। उन्होंने धार्मिक स्थलों पर पर्यावरणीय क्षमता से अधिक पर्यटकों की आवाजाही, अवैज्ञानिक खनन, पेड़ों की कटाई और प्रदूषण पर सवाल उठाए।
90 से अधिक आरटीआई, फिर भी जवाबदेही पर सवाल
अतुल कौशिक ने आरोप लगाया कि पर्यावरण, खनन और जनसुरक्षा से जुड़े मामलों में 90 से अधिक आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी गई, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिले। उन्होंने चूड़धार, शिकारी देवी और शिमला के जलागम क्षेत्रों में सड़क निर्माण, वन भूमि, मलबा निस्तारण तथा पर्यावरणीय वहन क्षमता की समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा कि संबंधित विभागों की संयुक्त जांच कर जिम्मेदारी और कार्रवाई की समयसीमा तय होनी चाहिए।
782 बीघा में खनन, मंदिर और स्कूल की सुरक्षा पर सवाल
वसुंधरा संरक्षण समिति, संगड़ाह के अध्यक्ष रणजीत चौहान और महासचिव सुरेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि संगड़ाह में 782 बीघा भूमि पर अवैज्ञानिक तरीके से खनन किया जा रहा है। उन्होंने वन्यजीवों, जलस्रोतों, कृषि भूमि और स्थानीय लोगों पर इसके प्रभावों की खदानवार वैज्ञानिक जांच की मांग की। नलगुण की ऐतिहासिक गुफा, वराह मंदिर, मंडोली मिडिल स्कूल, जल शक्ति विभाग की पाइपलाइनों और सड़कों की सुरक्षा का तकनीकी आकलन करने की भी मांग उठाई गई।
संस्था ने श्री रेणुका जी रामसर साइट और आरक्षित वन क्षेत्र को धार्मिक मेले के दौरान बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों तथा ध्वनि प्रदूषण के संभावित दुष्प्रभावों से बचाने का मुद्दा भी उठाया। पदाधिकारियों ने कहा कि मेले की धार्मिक गरिमा, पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमाचल में विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए, जिसमें खनन से राजस्व तो मिले, लेकिन उसकी कीमत पहाड़, प्रकृति और आम जनता को न चुकानी पड़े।