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फागू मंदिर में विधि-विधान से लगाई मझेई, अब कुरूड़ की अंतिम रस्म की तैयारी

Shailesh Saini • 1 Hour Ago • 1 Min Read

शिरगुल देवता के पिता भुखडू महाराज के समय का बताया जाता है प्राचीन मंदिर, परिसर में मौजूद हैं पारंपरिक स्थापत्य के अवशेष

राजगढ़ हिमाचल नाऊ न्यूज

जिला सिरमौर के राजगढ़ क्षेत्र के फागू स्थित प्राचीन मंदिर में रविवार को देवपरंपराओं और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार छत पर शहतीरी लगाने की रस्म पूरी की गई। स्थानीय परंपरा में इस रस्म को ‘मझेई’ कहा जाता है। इसके साथ ही मंदिर निर्माण का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है।

अब मंदिर निर्माण की अंतिम पारंपरिक रस्म ‘कुरूड़’ लगाने की तैयारी की जा रही है।शावगा क्षेत्र के शिरगुल देवता के श्रद्धालुओं और देवकार्यकर्ताओं की उपस्थिति में मझेई लगाने का कार्य विधि-विधान से संपन्न हुआ। स्थानीय देवपरंपरा में इस रस्म का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ क्षेत्र की प्राचीन परंपराओं के संरक्षण से भी जुड़ा है।

कुरूड़ लगाने के बाद छत पर जाना होगा वर्जित

मंदिर की छत पर मझेई लगाने की रस्म पूरी होने के बाद अब कुरूड़ लगाने की तैयारी है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुरूड़ लगाने के साथ मंदिर निर्माण की अंतिम पारंपरिक रस्म पूरी हो जाएगी। इसके बाद मंदिर की छत पर किसी भी व्यक्ति का जाना वर्जित माना जाता है। इस परंपरा का पालन देवमर्यादा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप किया जाता है।

देवकार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने निभाई परंपरा

धार्मिक आयोजन में देवी राम शर्मा, मुख्य सलाहकार; पृथ्वीराज, मुख्य देवा; निवेश ठाकुर, शिरगुल देवकार्य के मुखिया; भाग सिंह पड़िया तथा पूर्व शिरगुल देवकार्य मुखिया रणवीर सिंह चौहान सहित क्षेत्र के अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी की सहभागिता में पारंपरिक विधि के अनुसार मझेई लगाने की रस्म पूरी की गई।

भुखडू महाराज के समय का बताया जाता है मंदिर

फागू स्थित इस प्राचीन मंदिर को स्थानीय मान्यताओं के अनुसार शिरगुल देवता के पिता भुखडू महाराज के समय का बताया जाता है। मंदिर क्षेत्र के लोगों की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां पीढ़ियों से चली आ रही देवपरंपराओं और रीति-रिवाजों का आज भी श्रद्धापूर्वक पालन किया जाता है। मंदिर का निर्माण कार्य भी इन्हीं परंपराओं के अनुरूप आगे बढ़ाया जा रहा है।

प्राचीन स्थापत्य के अवशेष भी मौजूद

फागू मंदिर परिसर में पारंपरिक मंदिर स्थापत्य से जुड़े प्राचीन अवशेष भी मौजूद बताए जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं में इनकी स्थापत्य शैली को महाभारत काल में पांडवों के वनवास के समय की परंपरा से जोड़ा जाता है।

बलग और हाटकोटी के मंदिरों में भी इसी प्रकार की पारंपरिक स्थापत्य शैली देखने को मिलती है। हालांकि, फागू मंदिर के अवशेषों की वास्तविक प्राचीनता और ऐतिहासिक काल का निर्धारण पुरातात्विक अध्ययन के बाद ही किया जा सकता है।

मझेई की रस्म पूरी होने के बाद अब क्षेत्र के श्रद्धालुओं को कुरूड़ लगाने की अंतिम पारंपरिक रस्म का इंतजार है। फागू का यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ सिरमौर की प्राचीन देवसंस्कृति और स्थापत्य विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।