रसोई के बर्तनों में सीसे का खतरा: क्या एल्युमिनियम के बर्तनों की कभी हुई देशव्यापी जांच?
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की चेतावनी और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित शोध ने बढ़ाई चिंता; बच्चों के भोजन से लेकर सरकारी संस्थानों की रसोइयों तक जांच की जरूरत
हिमाचल नाऊ न्यूज़ | डेस्क विशेष पड़ताल
हम रोज जिस बर्तन में खाना बनाते हैं, उसकी गुणवत्ता पर कितना ध्यान देते हैं? बाजार से एल्युमिनियम का कुकर, कड़ाही या भगोना खरीदते समय आमतौर पर हमारी नजर उसकी कीमत, वजन और टिकाऊपन पर रहती है। लेकिन क्या कभी यह जांचने की कोशिश की गई कि जिस बर्तन में वर्षों से भोजन पक रहा है, उसमें इस्तेमाल की गई धातु खाद्य सुरक्षा के लिहाज से कितनी सुरक्षित है? कहीं उसकी निर्माण प्रक्रिया, कच्चे माल या खराब गुणवत्ता नियंत्रण के कारण जहरीली धातु सीसा यानी लेड भोजन तक तो नहीं पहुंच रही?

यह सवाल अब महज आशंका नहीं रह गया है। वैज्ञानिक शोध में कुछ एल्युमिनियम और हिंदालियम के बर्तनों से भोजन में सीसा पहुंचने के प्रमाण मिले हैं। अमेरिका की खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने दिसंबर 2024 में कुछ आयातित एल्युमिनियम, पीतल और हिंदालियम के बर्तनों को लेकर विक्रेताओं को चेतावनी दी थी। अगस्त 2025 में एजेंसी ने उपभोक्ताओं को भी ऐसे चिन्हित उत्पादों के इस्तेमाल से बचने की चेतावनी जारी की और दिसंबर 2025 में अपनी सूची में दो अतिरिक्त उत्पाद जोड़े। यह चेतावनी सभी एल्युमिनियम के बर्तनों पर लागू नहीं होती, बल्कि उन उत्पादों पर केंद्रित है जिनमें जांच के दौरान सीसा भोजन में पहुंचने की आशंका पाई गई।
नेचर समूह के वैज्ञानिक जर्नल में क्या सामने आया?
जर्नल ऑफ एक्सपोजर साइंस एंड एनवायरनमेंटल एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित शोधपत्र Evaluating metal cookware as a source of lead exposure इस विषय में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेज है। यह नेचर पोर्टफोलियो का जर्नल है। शोधकर्ताओं ने एल्युमिनियम, हिंदालियम, पीतल और स्टेनलेस स्टील के बर्तनों में सीसे की मौजूदगी तथा नियंत्रित परिस्थितियों में भोजन जैसे माध्यम में उसके पहुंचने की जांच की।
शोध में 28 अतिरिक्त एल्युमिनियम बर्तनों की जांच की गई, जिनमें आठ भारत में निर्मित थे। इसके अलावा पांच पीतल के बर्तन और 17 स्टेनलेस स्टील के बर्तन भी जांचे गए। शोध के निष्कर्षों के अनुसार, कई एल्युमिनियम बर्तनों में सीसे की मात्रा 100 पीपीएम से अधिक थी। कुछ बर्तनों से प्रयोगशाला में भोजन जैसी परिस्थितियां बनाने पर इतनी मात्रा में सीसा निकला कि वह शोधकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल की गई अनुशंसित दैनिक सेवन सीमाओं से अधिक थी।
सबसे चिंताजनक परिणाम हिंदालियम के एक अप्पम पैन में सामने आया। परीक्षण की परिस्थितियों के आधार पर उससे निकलने वाली सीसे की अनुमानित मात्रा बच्चों के लिए निर्धारित संदर्भ सेवन सीमा से लगभग 1,400 गुना अधिक थी। भारत में बने एक पीतल के बर्तन के मामले में यह अंतर लगभग 1,200 गुना था। इसके विपरीत, जांचे गए स्टेनलेस स्टील के बर्तनों से सीसे का रिसाव काफी कम रहा और किसी भी स्टेनलेस स्टील के बर्तन में रिसाव संबंधित संदर्भ सीमाओं से अधिक नहीं पाया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। ये आंकड़े चुनिंदा बर्तनों पर किए गए नियंत्रित प्रयोगों के परिणाम हैं। इनसे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में बिकने वाले सभी एल्युमिनियम के बर्तन खतरनाक हैं या प्रत्येक भारतीय परिवार के भोजन में इतनी ही मात्रा में सीसा पहुंच रहा है। लेकिन इन निष्कर्षों से यह जरूर साबित होता है कि खराब गुणवत्ता वाले कुछ बर्तन वास्तविक जोखिम पैदा कर सकते हैं और बाजार में उनकी पहचान करने के लिए व्यवस्थित जांच आवश्यक है।
बर्तनों में सीसा आता कहां से है?
सीसा एक विषैली भारी धातु है। इसका इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से बैटरियों, कुछ मिश्रधातुओं, औद्योगिक उत्पादों और पेट्रोल में मिलाए जाने वाले टेट्रा एथाइल लेड जैसे यौगिकों में किया गया है। पुराने समय में पेट्रोल में टेट्रा एथाइल लेड का उपयोग इंजन में नॉकिंग कम करने के लिए किया जाता था। लेकिन इसके कारण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़े। सीसा युक्त पेट्रोल पर दुनिया भर में प्रतिबंध की दिशा में कदम उठाए गए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अब सभी देशों ने मोटर वाहनों के लिए इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि कुछ विमानन ईंधनों में सीसा युक्त यौगिकों का इस्तेमाल अब भी होता है।
लेकिन पेट्रोल से सीसा हटाने का अर्थ यह नहीं है कि सीसे के सभी स्रोत समाप्त हो गए। बर्तनों के मामले में चिंता का एक बड़ा कारण खराब गुणवत्ता वाले पुनर्चक्रित धातु-कबाड़ का इस्तेमाल और निर्माण के दौरान पर्याप्त गुणवत्ता नियंत्रण का अभाव है। यदि कबाड़ से प्राप्त एल्युमिनियम में सीसा मिला हुआ है और उसे पर्याप्त जांच के बिना बर्तन बनाने में इस्तेमाल कर लिया जाता है, तो तैयार बर्तन भी दूषित हो सकता है।
वैज्ञानिक शोध में यह भी सामने आया है कि ढलाई से बनाए गए कुछ बर्तनों से सीसा निकलने की संभावना, रोल किए गए एल्युमिनियम से बने बर्तनों की तुलना में अधिक हो सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि हर ढलाई वाला बर्तन असुरक्षित या हर रोल्ड एल्युमिनियम का बर्तन सुरक्षित है। वास्तविक जोखिम जानने के लिए धातु की संरचना और भोजन में सीसे के रिसाव की जांच जरूरी है।
हिंदालियम और एल्युमिनियम एक ही चीज नहीं
बाजार में एल्युमिनियम और हिंदालियम के बर्तनों को लेकर भी भ्रम है। हिंदालियम एल्युमिनियम आधारित मिश्रधातु के लिए इस्तेमाल होने वाला नाम है। इसकी संरचना में अन्य धातुएं भी हो सकती हैं। इसलिए किसी बर्तन का नाम, चमक, वजन या विक्रेता का मौखिक दावा उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
इसी तरह, किसी बर्तन में सीसा मौजूद होने और खाना पकाते समय सीसा भोजन में निकलने के बीच भी अंतर है। किसी बर्तन की धातु में सीसे की मात्रा मापना पहला चरण है। इसके बाद यह देखना जरूरी है कि सामान्य उपयोग, गर्म करने, अम्लीय भोजन पकाने और भोजन को बर्तन में लंबे समय तक रखने जैसी परिस्थितियों में कितनी मात्रा में सीसा निकलता है।
इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि स्वास्थ्य जोखिम केवल धातु में मौजूद सीसे से नहीं, बल्कि शरीर में पहुंचने वाली मात्रा और संपर्क की अवधि से भी प्रभावित होता है।
भोजन में सीसा पहुंचा तो शरीर पर क्या असर हो सकता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सीसे का ऐसा कोई ज्ञात स्तर नहीं है जिसे स्वास्थ्य के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित माना जा सके। सीसा शरीर के कई अंगों और प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। यह मस्तिष्क, गुर्दों, रक्त निर्माण प्रणाली और हृदय संबंधी स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। बच्चों में इसका खतरा विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि उनका मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र विकास की अवस्था में होता है।
सीसे के संपर्क से बच्चों की सीखने की क्षमता, ध्यान, व्यवहार और बौद्धिक विकास प्रभावित हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान सीसे का संपर्क गर्भस्थ शिशु के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है। लंबे समय तक संपर्क रहने पर रक्तचाप बढ़ने, गुर्दों को नुकसान और रक्त निर्माण संबंधी समस्याओं का खतरा भी रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सीसे के संपर्क को एनीमिया सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ता है।
हालांकि यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि देश में आंखों की बढ़ती समस्याओं का मुख्य कारण एल्युमिनियम के बर्तनों से निकलने वाला सीसा है। इसी तरह, किसी व्यक्ति में एनीमिया पाए जाने भर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसका कारण सीसा है। इन समस्याओं के कई संभावित कारण होते हैं। किसी विशेष मामले में सीसे की भूमिका जानने के लिए चिकित्सकीय जांच और रक्त में सीसे के स्तर का परीक्षण आवश्यक है।
फिर भी बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पोषण की कमी से जूझ रहे लोगों को सीसे के संपर्क से बचाना सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारत में चिंता अधिक क्यों है?
भारत में एल्युमिनियम के बर्तनों का उपयोग घरेलू रसोइयों से लेकर ढाबों, छात्रावासों, सामुदायिक रसोइयों और कई संस्थागत रसोईघरों तक होता है। ऐसे में यदि बाजार में कुछ बर्तनों में सीसा मिला हुआ है, तो समस्या केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रह सकती। बड़ी मात्रा में भोजन बनाने वाले संस्थानों में किसी दूषित बर्तन का लगातार इस्तेमाल अनेक लोगों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

हालांकि भारत में 90 प्रतिशत बर्तन एल्युमिनियम के होने का दावा करने वाला कोई विश्वसनीय राष्ट्रीय आंकड़ा इस पड़ताल में प्रमाणित नहीं हो पाया है। इसलिए इस प्रतिशत को स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। इसी तरह देश की सभी जेलों या सरकारी स्कूलों में एल्युमिनियम के बर्तन इस्तेमाल होने अथवा वहां सीसे का संपर्क होने की पुष्टि करने वाला कोई समग्र राष्ट्रीय सर्वेक्षण भी यहां उपलब्ध प्रमाणों से स्थापित नहीं होता।
लेकिन यही वह बिंदु है जहां सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि बर्तनों का व्यापक उपयोग हो रहा है और कुछ उत्पादों में गंभीर जोखिम के वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं, तो यह जानना जरूरी है कि भारतीय बाजार में बिकने वाले बर्तनों की कितनी नियमित जांच होती है और संस्थागत रसोइयों में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की गुणवत्ता कौन सुनिश्चित करता है।
भारत में पहले भी एल्युमिनियम के बर्तनों पर शोध हुआ
एल्युमिनियम के बर्तनों से धातुओं के भोजन में पहुंचने का विषय भारत के लिए बिल्कुल नया नहीं है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फूड साइंसेज एंड न्यूट्रिशन में वर्ष 1995 में प्रकाशित भारतीय शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में कम गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम-सीसा मिश्रधातु और बेहतर गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम-मैंगनीज मिश्रधातु के बर्तनों से धातु के निकलने की प्रक्रिया का अध्ययन किया गया था।
इस अध्ययन में पाया गया कि पानी का पीएच, उबालने की अवधि और फ्लोराइड की सांद्रता जैसे कारक धातु के निकलने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। यह अध्ययन मुख्य रूप से एल्युमिनियम के रिसाव पर केंद्रित था, इसलिए इसे सीसे के व्यापक राष्ट्रीय संपर्क का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी यह दिखाता है कि बर्तन की गुणवत्ता और खाना पकाने की परिस्थितियां खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसके बाद के अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने पुनर्चक्रित धातु से बने कुछ बर्तनों में सीसे के दूषण की समस्या को अधिक स्पष्ट किया है। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने निम्न और मध्यम आय वाले 25 देशों से लिए गए 113 नए या लगभग नए एल्युमिनियम के बर्तनों की जांच की। इसमें बर्तनों में सीसे की कुल मात्रा पांच पीपीएम से कम से लेकर लगभग 16,000 पीपीएम तक मिली। औसत मात्रा लगभग 1,600 पीपीएम थी। कुछ बर्तनों से प्रयोगशाला में भोजन जैसी अम्लीय परिस्थितियां बनाने पर सीसा भी निकला।
यह अध्ययन भारत सहित कई देशों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नमूने सभी देशों की बाजार स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारतीय बाजार के सभी बर्तनों में सीसा मौजूद है। यह जरूर स्पष्ट होता है कि कुछ बर्तनों की निर्माण गुणवत्ता और कच्चे माल की जांच को नजरअंदाज करना स्वास्थ्य के लिहाज से गंभीर गलती हो सकती है।
खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने अब क्या सवाल हैं?
जब अंतरराष्ट्रीय शोध में कुछ बर्तनों से सीसा निकलने के प्रमाण सामने आ चुके हैं, तो भारत में खाद्य सुरक्षा और उत्पाद गुणवत्ता से जुड़ी एजेंसियों को भी इस विषय पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की खाद्य संपर्क सामग्री से जुड़ी व्यवस्थाएं और धातु संबंधी दूषण पर जारी मार्गदर्शन पहले से मौजूद हैं। अब जरूरत है कि इन व्यवस्थाओं के अनुपालन और बाजार में वास्तविक स्थिति की प्रभावी जांच हो।
खाद्य सुरक्षा विभाग, भारतीय मानक ब्यूरो और संबंधित उत्पाद नियामकों को आपसी समन्वय से बाजार में उपलब्ध एल्युमिनियम, हिंदालियम तथा पुनर्चक्रित धातु से बने बर्तनों के नमूने लेने चाहिए। इन नमूनों में केवल कुल सीसे की मात्रा ही नहीं, बल्कि भोजन में उसके निकलने की संभावना की भी जांच होनी चाहिए। जांच में घरेलू उपयोग के बर्तनों के साथ बड़े आकार की कड़ाहियों, भगोनों, प्रेशर कुकर और संस्थागत रसोईघरों में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील, छात्रावासों, अस्पतालों, जेलों और सामुदायिक रसोईघरों में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की गुणवत्ता का ऑडिट भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि किसी उत्पाद में निर्धारित सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उसके निर्माता, आपूर्तिकर्ता और वितरण श्रृंखला की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। गंभीर जोखिम वाले उत्पादों की बिक्री रोकने, उपभोक्ताओं को जानकारी देने और आवश्यकतानुसार उन्हें बाजार से वापस मंगाने की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।
सबसे अहम बात यह है कि जांच के नतीजे सार्वजनिक किए जाएं। किस प्रकार के बर्तन की जांच हुई, कितने नमूने मानकों पर खरे उतरे, कितनों में सीसा मिला और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई—इन सवालों का जवाब नागरिकों को मिलना चाहिए।
उपभोक्ता अभी क्या सावधानी बरतें?
जब तक बाजार की व्यापक जांच और प्रमाणित उत्पादों की पहचान को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आती, तब तक उपभोक्ताओं को घबराने के बजाय व्यावहारिक सावधानी बरतनी चाहिए।
- जिन बर्तनों के निर्माण, सामग्री या खाद्य-संपर्क सुरक्षा के बारे में भरोसेमंद जानकारी उपलब्ध न हो, उन्हें खरीदने से बचें।
- संदिग्ध, घटिया गुणवत्ता वाले या बिना विश्वसनीय स्रोत के बेचे जा रहे हिंदालियम अथवा पुनर्चक्रित धातु के बर्तनों को भोजन पकाने के लिए इस्तेमाल न करें।
- अम्लीय भोजन, जैसे टमाटर या सिरके वाले व्यंजन, को लंबे समय तक ऐसे बर्तनों में पकाने या रखने से बचें जिनकी खाद्य-संपर्क सुरक्षा प्रमाणित न हो।
- सुरक्षित विकल्प के रूप में उपयुक्त खाद्य-ग्रेड स्टेनलेस स्टील के बर्तनों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि प्रेशर कुकर के वाल्व, वेंट पाइप और अन्य छोटे पुर्जों की सामग्री भी सुरक्षित होनी चाहिए।
- यदि किसी बर्तन को लेकर संदेह है, तो केवल घरेलू तरीके या उसकी चमक देखकर सुरक्षा का फैसला न करें। जरूरत पड़ने पर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच कराएं।
यह भी याद रखना जरूरी है कि हर पुराने एल्युमिनियम के बर्तन को केवल उसकी उम्र के आधार पर जहरीला घोषित नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, नया या महंगा बर्तन होना भी उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
सवाल अब जांच का है, अफवाह का नहीं
सीसा प्रदूषण के मामले में दुनिया भर का अनुभव बताता है कि किसी विषैली धातु को एक क्षेत्र से हटाने के बाद भी उसके दूसरे स्रोत बने रह सकते हैं। पेट्रोल से सीसा हटाना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही, लेकिन यदि खराब गुणवत्ता वाले कच्चे माल से बने बर्तनों के जरिए वही धातु भोजन तक पहुंच रही हो, तो उस संभावना की जांच करना भी उतना ही जरूरी है।
भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी घरों और संस्थागत रसोइयों में रोजाना भोजन तैयार करती है, इस विषय को केवल उपभोक्ता की निजी जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। सुरक्षित बर्तन उपलब्ध कराना, निर्माण में इस्तेमाल होने वाली धातु की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, बाजार में नियमित नमूना जांच करना और उल्लंघन पर कार्रवाई करना नियामक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
हिमाचल नाऊ न्यूज़ का सवाल सीधा है: क्या भारत में बिकने वाले एल्युमिनियम और हिंदालियम के बर्तनों में सीसे की मौजूदगी तथा भोजन में उसके रिसाव की नियमित, पारदर्शी और देशव्यापी जांच हो रही है?
यदि ऐसी जांच हो रही है, तो उसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए। यदि नहीं, तो खाद्य सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों को इस दिशा में तत्काल पहल करनी चाहिए। क्योंकि किसी बर्तन की कीमत कम होना आर्थिक राहत हो सकती है, लेकिन उसकी गुणवत्ता पर सवाल होने के बावजूद उसे बिना जांच के सुरक्षित मान लेना समाज को भारी स्वास्थ्य जोखिम में डाल सकता है।
यह मुद्दा एल्युमिनियम के सभी बर्तनों पर प्रतिबंध लगाने का नहीं, बल्कि सुरक्षित और असुरक्षित उत्पादों की वैज्ञानिक पहचान करने का है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, नियामक संस्थाएं, निर्माता और उपभोक्ता मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाएं, जिसमें हमारी रसोई का बर्तन भोजन को सुरक्षित बनाए, न कि अनजाने में किसी विषैली धातु के संपर्क का स्रोत बन जाए।