रेणुका जी मेले में अब नहीं चलेगी मनमानी, तीन दिन में हटानी होंगी दुकानें
दुकानदारों को देना होगा सफाई प्रमाण पत्र, प्लास्टिक के इस्तेमाल का भी देना पड़ेगा हिसाब; 10 हजार श्रद्धालुओं के लिए कम से कम 100 शौचालय बनाने के निर्देश
हिमाचल नाऊ न्यूज शिमला/नाहन
हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुका जी मेले को लेकर माननीय उच्च न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बेहद अहम और सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब मेले के नाम पर व्यावसायिक गतिविधियां चलाकर आयोजन स्थल को गंदा छोड़कर चले जाने वाले दुकानदारों की मनमानी नहीं चलेगी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मेला समाप्त होने के तीन दिन के भीतर सभी दुकानदारों को अपनी दुकानें हटानी होंगी। ऐसा नहीं करने वालों के खिलाफ न्यायालय के आदेशों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक और महत्वपूर्ण शर्त लगाई है। मेले में दुकान लगाने वाले प्रत्येक दुकानदार को दुकान हटाने के बाद सफाई का प्रमाण पत्र देना होगा। इतना ही नहीं, दुकानदारों को अपनी दुकान और आसपास इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक की मात्रा का भी पूरा ब्योरा देना पड़ेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मेला समाप्त होने के बाद रेणुका जी झील और आसपास के क्षेत्र में प्लास्टिक तथा अन्य कचरे का ढेर न लगे।
दरअसल, श्री रेणुका जी झील केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट का दर्जा भी प्राप्त है। यह संवेदनशील वेटलैंड क्षेत्र है, जिसकी पारिस्थितिकी और जैव विविधता को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। मेले के दौरान हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने से झील के आसपास पर्यावरणीय दबाव लगातार बढ़ता रहा है।
हाईकोर्ट ने श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। मेले में 10 हजार श्रद्धालुओं की संख्या को ध्यान में रखते हुए कम से कम 100 शौचालयों की व्यवस्था करना अनिवार्य किया गया है। इससे पहले मेला आयोजन स्थल और आसपास के क्षेत्रों में शौचालयों की संख्या बेहद सीमित रहती थी। ऐसे में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने के साथ स्वच्छता और पर्यावरण प्रबंधन की चुनौती भी गंभीर हो जाती थी।
गौरतलब है कि वाडिया इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक की ओर से भी रामसर साइट में शामिल रेणुका जी झील पर मंडराते पर्यावरणीय संकट को लेकर रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी गई थी। इसके बावजूद लंबे समय तक झील के संरक्षण और मेले के दौरान बढ़ते पर्यावरणीय दबाव को लेकर अपेक्षित सख्ती देखने को नहीं मिली।
श्री रेणुका जी मेला धार्मिक आस्था, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है, लेकिन समय के साथ बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों ने इसके मूल स्वरूप और पर्यावरणीय संतुलन पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में माननीय उच्च न्यायालय के ये निर्देश न केवल रेणुका जी झील की पवित्रता और रामसर साइट के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि उन श्रद्धालुओं के लिए भी राहत की खबर हैं, जो वर्षों से भगवान परशुराम और माता रेणुका जी की पवित्र धरा की स्वच्छता और प्राकृतिक सुंदरता को सुरक्षित देखने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।