साल में एक दिन ‘हिमाचल निर्माता’ का गुणगान, बाकी 364 दिन परिवार राजनीतिक उपेक्षा का शिकार!
केंद्र में भाजपा और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार, फिर भी डॉ. वाई.एस. परमार के परिवार को नहीं मिला बड़ा राजनीतिक सम्मान; जन्मस्थली भी अब तक अपेक्षित पहचान से दूर
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन
हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने वाले और “हिमाचल निर्माता” के रूप में विख्यात डॉ. यशवंत सिंह परमार की जयंती पर हर वर्ष प्रदेश की राजनीति श्रद्धांजलियों, पुष्पांजलि कार्यक्रमों और बड़े-बड़े बयानों से गूंज उठती है। लेकिन जयंती बीतते ही मानो उनकी विरासत भी राजनीतिक गलियारों से ओझल हो जाती है। सवाल यह है कि जिस व्यक्तित्व ने हिमाचल को अलग पहचान दिलाई, क्या उनकी जन्मस्थली और परिवार को वह सम्मान मिला, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं?
प्रदेश में वर्षों तक कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें रहीं। वर्तमान में केंद्र में भाजपा की सरकार है तो प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है, लेकिन डॉ. परमार के परिवार का कोई सदस्य आज किसी बड़े राजनीतिक, बोर्ड, निगम अथवा संवैधानिक पद पर नजर नहीं आता। ऐसे में यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या दोनों प्रमुख दलों ने डॉ. परमार के नाम का राजनीतिक उपयोग तो किया, लेकिन उनकी विरासत को उसी अनुपात में सम्मान नहीं दिया।
राजनीतिक उपेक्षा का मुद्दा केवल परिवार तक सीमित नहीं है। डॉ. परमार की जन्मस्थली चनालग (बागथन क्षेत्र) आज भी अपेक्षित पहचान और विकास की राह देख रही है। दशकों बाद भी यहां उनके नाम पर एक भव्य संग्रहालय का सपना अधूरा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस नेता ने हिमाचल की नींव रखी, उसकी जन्मस्थली को प्रदेश के प्रमुख विरासत स्थलों में शामिल किया जाना चाहिए था।
डॉ. परमार के पुत्र एवं पूर्व विधायक कुश परमार भी अपने राजनीतिक जीवन के बाद अपेक्षित सम्मान नहीं पा सके। वहीं उनके पौत्र आनंद परमार वर्तमान में जिला सिरमौर कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, लेकिन अब तक उन्हें किसी बोर्ड या निगम में जिम्मेदारी नहीं मिली।
दूसरी ओर कुश परमार के पुत्र चेतन परमार कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए, मगर भाजपा के शासनकाल में भी उन्हें संगठन अथवा किसी बोर्ड-निगम या अन्य महत्वपूर्ण पद पर स्थान नहीं मिल सका। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि हिमाचल निर्माता का परिवार सत्ता परिवर्तन के बावजूद सम्मानजनक राजनीतिक भागीदारी से वंचित रहा।
और शर्मनाक बात तो यह है कि हिमाचल निर्माता के पुत्र जिसने पूरे प्रदेश को पहाड़ी राज्य का गौरव दिया आज उनका बेटा यानी पूर्व विधायक कुश परमार एक 2BHK फ्लैट में रहने पर मजबूर है।विकास के मोर्चे पर भी कई सवाल उठते हैं।
डॉ. परमार के गृह क्षेत्र से गुजरने वाली बनेठी–बड़ू साहिब–राजगढ़ सड़क आज भी बड़े स्तर के उन्नयन की प्रतीक्षा में है। पर्यटन, शिक्षा और बागवानी की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग का दर्जा दिलाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस सड़क का विस्तार होता तो बड़ू साहिब, राजगढ़, कोटगढ़ और शिमला के ऊपरी क्षेत्रों को नया आर्थिक और पर्यटन आधार मिल सकता था।
हालांकि जिला सिरमौर कांग्रेस अध्यक्ष एवं डॉ. परमार के पौत्र आनंद परमार का कहना है कि चनालग में डॉ. परमार के नाम पर संग्रहालय स्थापित करने की तैयारी चल रही है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र की सड़कों की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बनेठी–बड़ू साहिब–राजगढ़ मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए प्रस्तावित किया गया था, लेकिन आवश्यक ट्रैफिक पैरामीटर पूरे न होने के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल सकी।
बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल आज भी कायम है। क्या डॉ. यशवंत सिंह परमार को केवल उनकी जयंती पर याद करना ही पर्याप्त है, या फिर उनकी जन्मस्थली, उनकी विरासत और उनके परिवार को भी वह सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए, जिसकी अपेक्षा वर्षों से की जाती रही है? फिलहाल यह सवाल सत्ता और विपक्ष—दोनों के सामने बराबरी से खड़ा दिखाई देता है।