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1990 में सिरमौर से अयोध्या गए थे 46 कार सेवक

Ankita 21 Jan 2024 Edited 21 Jan 1 min read

सरयु पुल के पास पुलिस ने वाहिनी पर बरसाई गई थी लाठियां, पांवटा के भोलेश्वर ने की थी वाहिनी की अगुवाई

HNN/ नाहन

करीब 33 साल पहले 1990 में जिला सिरमौर से 46 कार सेवक श्री अयोध्या जी पहुंचे थे। इस वाहिनी की अगुवाई पांवटा साहिब के भोलेश्वर ने की, जो इस समय में 72 वर्ष हैं। इन कार सेवकों की आज सबसे बड़ी खुशी यही है कि 496 साल बाद अयोध्या में श्री राम मंदिर बनकर तैयार हुआ है।

पांवटा साहिब के वार्ड नंबर 8 के कार सेवक भोलेश्वर ने बताया कि सिरमौर से 46 कार सेवकों की एक वाहिनी गठित की गई थी। इसका दायित्व उन्हें सौंपा गया था। पांवटा साहिब से उन्होंने श्री राम जी के जयकारों के साथ लोगों ने पूरी वाहिनी को रवाना किया था।

यहां से जाने के लिए उन्होंने एक ट्रक की मांग की थी कि वह उन्हें कालका तक छोड़ दे, लेकिन ट्रक यूनियन ने उन्हें साफ-तौर पर इन्कार कर दिया गया था। मन में राम धुन सवार थी फिर वह अपने परिचित की पिकअप में लटककर कालका पहुंचे।

एक दूसरे से अनजान बनकर गए थे…….

उन्हें हिदायत दी गई थी कि ट्रेन में सफर के दौरान वह एक दूसरे के प्रति पूरी तरह अनजान बने रहेंगे। किसी से बातचीत नहीं करेंगे। न कोई पटका पहनेंगे और न ही कोई भगवा वस्त्र। कालका से वह ट्रेन में बैठे। पूरी ट्रेन कार सेवकों से भरी थी। न तो उन्होंने लखनऊ जाने के लिए टिकट लिया और न ही ट्रेन का टीटी टिकट चेकिंग पर आया।

लखनऊ पहुंचते ही आगे की रूपरेखा तैयार होनी थी। इसके लिए उन्हें कोड वर्ड (मंत्र) दिया गया था, जो ट्रेन रुकते ही ट्रेन के ईंजन के पास खड़े संघ के कार्यकर्ता को पास करना था। उनसे कहा गया कि किसी ने भी गिरफ्तारी नहीं देनी है। संघ प्रमुख ने उन्हें निर्देश दिए थे कि जब पुलिस के कर्मचारी उनसे पूछताछ करें, तो उन्हें बताया गया कि वह कार सेवक नहीं है, बल्कि आम यात्री हैं।

ताकि उनकी गिरफ्तारी न हो। जब वह लखनऊ रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो वहां पर उन्हें वह कार्यकर्ता मिला। तब उन्होंने उसको कोड बताया। यहां से वह 50-60 किलोमीटर आगे के सफर के लिए एक गाड़ी में बैठे। उसके बाद उन्हें उतरकर फिर 70 किलोमीटर खेतों के रास्ते पैदल यात्रा करनी थी। उन्हें 7 दिन में यह यात्रा पूरी कर सरयू नदी के तट तक पहुंचना था।

इन सात दिनों में उन्होंने चने, मक्की, आलू, चावल और आटे के गोले आग में भूनकर खाए और पानी पीकर गुजारा किया। स्थानीय लोगों ने भी उन्हें भोजन उपलब्ध करवाया। खेतों में भट्टियां लगी थीं। टीन के कनस्तर में वह खाना बनाते थे। उन्हें ये भी हिदायत थी कि कोई भी गन्ना नहीं तोड़ेगा, क्योंकि 25,000 कार सेवक खेतों में थे। इसके बाद सरयु पुल क्रॉस करना था। उस समय तक 32 हजार कार सेवक अयोध्या के आसपास पहुंच गए थे।

7 लाख लोगों ने एक साथ अयोध्या में प्रवेश करना था। सबसे आगे केरल के कार सेवक थे, उनके पीछे हिमाचल की वाहिनी थी। इसी दौरान वहां पर लाठी चार्ज हो गया। लाठीचार्ज के दौरान उन्होंने भगदड़ नहीं मचाई बल्कि नीचे बैठ गए। इस दौरान गोलीबारी भी हुई, लेकिन किसी को गोली नहीं लगी। श्रीराम मंदिर निर्माण के संघर्ष के लिए 14 दिन कैसे कटे, पता ही नहीं चला।

भोलेश्वर बताते हैं कि 1992 में मस्जिद को ध्वस्त कर श्री राम मंदिर के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ। अब श्रीराम मंदिर बनकर तैयार होने वाला है, इससे ज्यादा खुशी का पल जीवन में कोई नहीं हो सकता। उन्हें आज भी उन्हें कार सेवकों का संघर्ष नहीं भूले हैं। वर्ष 1992 में संघ ने उन्हें अयोध्या आने से मना कर दिया। उन्हें आदेश थे कि वह पीछे सारी व्यवस्थाओं को देखें।

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