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जन्म-मृत्यु पंजीकरण के नियम 1 अक्टूबर से होंगे सख्त, दो साल की देरी पर मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी

हिमाचलनाउ डेस्क • 3 Hours Ago • 1 Min Read

देश में जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण की प्रक्रिया 1 अक्टूबर 2026 से सख्त हो जाएगी। जन्म या मृत्यु की घटना के दो साल से अधिक समय बाद आवेदन करने पर प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश लेना होगा। वहीं, एक साल से अधिक और दो साल के भीतर पंजीकरण कराने के लिए जिलाधिकारी, उप-जिलाधिकारी या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी होगी।

नई दिल्ली

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026 के प्रावधान 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होंगे। भारत के रजिस्ट्रार जनरल मृत्युंजय कुमार नारायण ने बुधवार को गजट अधिसूचना जारी कर इसकी जानकारी दी। केंद्र सरकार ने अधिनियम के प्रावधान लागू करने के लिए यह तारीख निर्धारित की है। नए कानून का उद्देश्य जन्म और मृत्यु की घटनाओं की जानकारी समय पर दर्ज कराने को प्रोत्साहित करना और विलंब से होने वाले पंजीकरण की जांच प्रक्रिया को मजबूत बनाना है।

संसद से पारित होने के बाद बना कानून

जन्म और मृत्यु पंजीकरण से संबंधित संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने पारित किया था। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह पिछले महीने कानून बना। इसके माध्यम से जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 में बदलाव किया गया है। इससे पहले वर्ष 2023 में भी मूल कानून में संशोधन हुआ था और उससे जुड़े प्रावधान 1 अक्टूबर 2023 से लागू किए गए थे। नए संशोधन में विशेष रूप से देरी से आवेदन करने वाले मामलों के लिए अलग-अलग स्तर पर जांच और स्वीकृति की व्यवस्था की गई है।

दो साल से अधिक देरी पर न्यायिक आदेश

नए कानून के तहत 1969 के अधिनियम की धारा 13(3) में संशोधन किया गया है। अब जन्म या मृत्यु की घटना के दो साल से अधिक समय बाद पंजीकरण के लिए आवेदन करने पर प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य होगा। ऐसे पुराने मामलों का पंजीकरण केवल सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं किया जा सकेगा। आवेदन और उससे संबंधित जानकारी की न्यायिक स्तर पर जांच तथा मंजूरी मिलने के बाद ही आगे की प्रक्रिया पूरी होगी।

एक से दो साल की देरी पर अधिकारी की मंजूरी

यदि जन्म या मृत्यु के पंजीकरण का आवेदन घटना के एक साल से अधिक, लेकिन दो साल के भीतर किया जाता है तो जिलाधिकारी, उप-जिलाधिकारी या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आदेश लेना होगा। संबंधित अधिकारी आवेदन में दी गई जन्म या मृत्यु की जानकारी की सत्यता की जांच करेगा। मंजूरी मिलने और निर्धारित शुल्क जमा होने के बाद पंजीकरण किया जा सकेगा। इस तरह देरी की अवधि के आधार पर प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर अलग-अलग स्वीकृति की व्यवस्था लागू होगी।

प्रमाणपत्र का कानूनी महत्व

जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है। पंजीकरण के बाद जारी प्रमाणपत्र कानूनी पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है और इसे किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। सरकार के अनुसार, नियम सख्त करने का उद्देश्य घटनाओं की समय पर रिपोर्टिंग बढ़ाना और आधिकारिक रिकॉर्ड को समय पर अद्यतन रखना है। इससे जन्म और मृत्यु से संबंधित विवरण निर्धारित अवधि में दर्ज कराने को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।