ओवरलोडिंग ने ली 14 जानें, 52 घायल—प्रशासनिक लापरवाही उजागर
नाहन/ हरिपुरधार
हरिपुरधार की गहरी खाई में गिरी निजी बस ने सिर्फ 14 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि सिरमौर में सड़क सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक दावों की भी पोल खोल दी।
शिमला से कुपवी जा रही इस बस में क्षमता से कहीं अधिक 66 यात्री सवार थे, जबकि पहाड़ी इलाकों की संकरी और जोखिम भरी सड़कें पहले ही अतिरिक्त भार झेलने की स्थिति में नहीं होतीं।
हादसे में 14 यात्रियों की मौत हो गई, जबकि 52 लोग घायल हुए हैं।
सवाल यह नहीं है कि दुर्घटना कैसे हुई, बल्कि यह है कि ऐसी स्थिति बनने दी ही क्यों गई। घना कोहरा, कड़ाके की ठंड और संकरी सड़क पर ओवरलोड बस का संचालन किसी तकनीकी चूक से ज्यादा, लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा नजर आता है।
यह मान लेना कि केवल चालक ही इसका जिम्मेदार है, सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा होगा, क्योंकि निजी बसों में ओवरलोडिंग बिना बस मालिकों की सहमति और परिवहन विभाग की अनदेखी के संभव नहीं हो सकती।
विडंबना यह है कि जिस दिन यह हादसा हुआ, उसी दौरान आरटीओ सिरमौर सड़क सुरक्षा सप्ताह के तहत जागरूकता कार्यक्रम चला रहा था। मंचों से नियमों की बातें हो रही थीं, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि एक ओवरलोड बस मौत बनकर खाई में जा गिरी।
इससे साफ होता है कि सड़क सुरक्षा महज औपचारिक अभियानों से नहीं, बल्कि निरंतर और सख्त निगरानी से सुनिश्चित होती है।
यह पहला मौका नहीं है जब सिरमौर में लापरवाही ने जानें ली हों। वर्ष 2018 में श्री रेणुका जी मेले के दौरान ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार के कारण बस हादसे में नौ लोगों की मौत हो चुकी है।
तब भी जांच के आदेश हुए थे और सख्ती के दावे किए गए थे, लेकिन समय बीतने के साथ वे दावे कागजों तक ही सिमटकर रह गए। हरिपुरधार हादसा बताता है कि पूर्व की त्रासदियों से अब तक कोई ठोस सबक नहीं लिया गया।
इस दुर्घटना के बाद आरटीओ की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बसों की नियमित फिटनेस जांच, पहाड़ी रूटों पर विशेष निगरानी और ओवरलोडिंग पर सख्त कार्रवाई अगर समय रहते होती, तो शायद इतनी बड़ी कीमत न चुकानी पड़ती।
66 यात्रियों से भरी बस का बिना रोक-टोक संचालन अपने आप में सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।
हादसे ने दुर्गम क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ी को भी उजागर किया है।
घायलों को समय पर उपचार दिलाने में स्थानीय लोग आगे आए, लेकिन सीमित संसाधनों और स्टाफ की कमी से जूझ रहे अस्पतालों की स्थिति एक बार फिर सामने आ गई। दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का आधुनिकीकरण और मेडिकल स्टाफ की तैनाती अब टाली नहीं जा सकती।
हरिपुरधार हादसा सरकार और प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश है कि अब संवेदना से आगे बढ़कर ठोस समाधान करने होंगे।
पहाड़ी सड़कों के सुधार, खतरनाक मोड़ों पर सुरक्षा उपाय, बसों की कड़ी जांच, ओवरलोडिंग पर जीरो टॉलरेंस और मजबूत आपातकालीन व्यवस्था ही भविष्य में ऐसे हादसों को रोक सकती है। अगर अब भी सबक नहीं लिया गया, तो अगली खबर फिर किसी खाई से आने का खतरा बना रहेगा।
वही फोटो खींच कर दुर्घटना स्थल पर राजनीतिक टॉनिक लेने वाले जनप्रतिनिधियों को भी अब उन 14 मासूम जिंदगियों को जवाब देना होगा कि आखिर वोट जरूरी है या फिर जनता के लिए बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन। जाहिर सी बात है इस बड़ी चूक का ठीक रहा कहीं ना कहीं चालक के सिर्फ फूटेगा मगर चालक से ज्यादा जिम्मेवार वह परिवहन अधिकारी है जिसकी जिला में मौजूदगी के बाद 66 सावरिया एक निजी वाहन में भरकर चल रही थी।