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  • एचपीयू में छात्र संघ चुनाव बहाली सहित विभिन्न मांगों को लेकर एसएफआई ने ईसी सदस्यों को सौंपा ज्ञापन

    एचपीयू में छात्र संघ चुनाव बहाली सहित विभिन्न मांगों को लेकर एसएफआई ने ईसी सदस्यों को सौंपा ज्ञापन

    छात्र संघ चुनाव, आरक्षण, छात्रावास, शिक्षक भर्ती और नई शिक्षा नीति से जुड़े मुद्दों पर एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से शीघ्र निर्णय की मांग की है।

    शिमला

    छात्र मांगों को लेकर ईसी उम्मीदवारों से की मुलाकात

    एसएफआई हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने छात्रों की विभिन्न समस्याओं और मांगों को लेकर विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद (ईसी) के उम्मीदवारों को ज्ञापन सौंपा। इस दौरान छात्र संघ चुनाव बहाली सहित कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग

    एसएफआई एचपीयू परिसर सचिव कामरेड मुकेश ने कहा कि वर्ष 2013 के बाद से प्रदेश में छात्र संघ चुनाव बंद हैं, जिससे छात्र राजनीति और छात्र प्रतिनिधित्व पर नकारात्मक असर पड़ा है। प्रतिनिधित्व के अभाव में छात्र अपनी समस्याएं प्रभावी ढंग से प्रशासन के समक्ष नहीं रख पा रहे हैं। एसएफआई ने प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव शीघ्र बहाल करने की मांग की।

    पिछड़े वर्गों को आरक्षण लागू करने पर जोर

    एसएफआई ने बताया कि संविधान के 93वें संशोधन के तहत उच्च शिक्षा में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में इसे अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। संगठन ने इसे संविधान का उल्लंघन बताते हुए आरक्षण लागू करने की मांग की।

    छात्रावास की कमी पर उठाए सवाल

    एसएफआई ने विश्वविद्यालय में छात्रावास की गंभीर समस्या को भी उजागर किया। संगठन ने बताया कि विश्वविद्यालय में लगभग 4000 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं, जबकि केवल करीब 1200 छात्रों को ही छात्रावास सुविधा मिल पाती है। नए छात्रावासों के निर्माण की मांग की गई।

    शिक्षक भर्ती की न्यायिक जांच की मांग

    एसएफआई ने आरटीआई के हवाले से आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में शिक्षकों की भर्ती फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई है। संगठन ने इस मामले की न्यायिक जांच और राजनीतिक गतिविधियों में संलिप्त शिक्षकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की।

    नई शिक्षा नीति का विरोध

    एसएफआई ने नई शिक्षा नीति 2020 को जनविरोधी बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से शिक्षा का निजीकरण और सांप्रदायिकरण किया जा रहा है। संगठन ने पाठ्यक्रमों से प्रगतिशील लेखकों की रचनाएं हटाने पर भी आपत्ति जताई।

    गैर-शिक्षक कर्मचारियों की भर्ती जल्द कराने की मांग

    एसएफआई ने बताया कि विश्वविद्यालय में गैर-शिक्षक कर्मचारियों की भर्ती के लिए कई बार विज्ञापन निकाले गए, लेकिन भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। आरटीआई के अनुसार इस देरी से छात्रों से करोड़ों रुपये वसूले गए। संगठन ने भर्ती प्रक्रिया तुरंत पूरी करने की मांग की।

    आंदोलन की चेतावनी

    एसएफआई ने स्पष्ट किया कि यदि इन मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो संगठन छात्रों को लामबंद कर बड़ा आंदोलन करेगा, जिसकी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की होगी।

  • शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से राहतअब पढ़ाई पर रहेगा फोकस

    शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से राहतअब पढ़ाई पर रहेगा फोकस

    एक शिक्षक को मिलेंगे सिर्फ एक-दो अतिरिक्त कार्य, फैसले का हुआ स्वागत

    हिमाचल नाऊ न्यूज़ | शिमला

    प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ से राहत देने की दिशा में शिक्षा विभाग ने अहम कदम उठाया है। सरकार के निर्देशों के बाद शिक्षा विभाग ने सभी जिला उपनिदेशकों को नए सिरे से गैर-शैक्षणिक कार्यों के आवंटन के आदेश जारी किए हैं।

    नई व्यवस्था के तहत अब प्रत्येक शिक्षक को स्कूल स्तर पर अधिकतम एक या दो गैर-शैक्षणिक दायित्व ही सौंपे जाएंगे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षक अपना अधिकांश समय कक्षा शिक्षण और विद्यार्थियों की शैक्षणिक गुणवत्ता सुधार पर केंद्रित कर सकें।

    शिक्षा विभाग के अनुसार अब तक शिक्षकों से करीब 31 प्रकार के गैर-शैक्षणिक कार्य कराए जा रहे थे। इनमें छात्रवृत्ति प्रबंधन, मिड-डे मील, एनएसएस, एनसीसी, ईको क्लब, स्काउट एंड गाइड, पुस्तकालय रखरखाव, वर्दी और पुस्तकों का वितरण, रिकॉर्ड संधारण, विभिन्न सर्वेक्षण, जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्कूल स्तरीय आयोजनों की जिम्मेदारी शामिल थी।

    विभाग का मानना है कि गैर-शैक्षणिक कार्यों का अत्यधिक बोझ शिक्षण व्यवस्था को प्रभावित कर रहा था। नई व्यवस्था लागू होने से शिक्षकों पर प्रशासनिक दबाव कम होगा और छात्रों को प्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ मिलेगा।जिला उपनिदेशकों को निर्देश दिए गए हैं कि स्कूलों में कार्यों का पुनर्वितरण संतुलित और व्यावहारिक तरीके से किया जाए, ताकि किसी एक शिक्षक पर अतिरिक्त जिम्मेदारी न पड़े।

    शिक्षक संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे लंबे समय से चली आ रही मांग की पूर्ति बताया है और उम्मीद जताई है कि इससे सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार देखने को मिलेगा।

  • एसएफआई के 56 वर्ष पूरे, शिमला में सेमिनार आयोजित

    एसएफआई के 56 वर्ष पूरे, शिमला में सेमिनार आयोजित

    राकेश सिंघा बोले, छात्र राजनीति सामाजिक बदलाव की मजबूत ताकत

    शिमला।

    स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के 56 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य पर मंगलवार को एसएफआई शिमला जिला कमेटी द्वारा चितकारा पार्क केथू स्थित किसान मजदूर भवन में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय हमारा संघर्ष हमारी विरासत रखा गया।

    कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पहले छात्र संघ अध्यक्ष एवं एसएफआई हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्य अध्यक्ष कॉमरेड राकेश सिंघा मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद रहे। उन्होंने हिमाचल प्रदेश में छात्र राजनीति के इतिहास और वर्तमान प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।

    राकेश सिंघा ने कहा कि वर्ष 1978 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पहली बार छात्र संघ के चुनाव हुए थे और 1979 में एसएफआई से वे अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने कहा कि एसएफआई का इतिहास फीस वृद्धि और छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्षों से जुड़ा रहा है।

    उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1970 से अब तक देशभर में समतामूलक शिक्षा और सामाजिक न्याय की लड़ाई में 278 से अधिक छात्र-छात्राओं ने शहादत दी है।
    एसएफआई राज्य सचिव सन्नी सेकटा ने कहा कि संगठन ऐसे दौर में अपना स्थापना दिवस मना रहा है जब सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर संकट है।

    उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत सरकारी स्कूलों को बंद किए जाने और शिक्षा के निजीकरण का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि देश में 90 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं, जिससे गरीब वर्ग शिक्षा से दूर होता जा रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल प्रदेश में सार्वजनिक शिक्षा का ढांचा कमजोर हो रहा है और छात्र मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। उन्होंने छात्र समुदाय से शिक्षा के सार्वजनिक ढांचे को बचाने के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का आह्वान किया।

    सेमिनार के अंत में एसएफआई शिमला जिला कमेटी ने छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखने का संकल्प दोहराया।

  • हिमाचल मंत्रिमंडल के फैसले, स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण और युवाओं को रोजगार के अवसरों को मंजूरी

    हिमाचल मंत्रिमंडल के फैसले, स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण और युवाओं को रोजगार के अवसरों को मंजूरी

    स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, ऊर्जा और ग्रामीण विकास से जुड़े कई अहम फैसलों पर मंत्रिमंडल ने मुहर लगाई। इन निर्णयों का उद्देश्य जनकल्याण, पारदर्शिता और प्रदेश के समग्र विकास को गति देना है।

    शिमला

    स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भर्ती को मंजूरी

    मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिमंडल बैठक में राज्य के सभी चिकित्सा महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के 53 पदों सहित विभिन्न श्रेणियों के 121 पद भरने को मंजूरी दी गई। इनमें टीचिंग, नॉन-टीचिंग फैकल्टी और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल हैं। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग हमीरपुर के माध्यम से असिस्टेंट स्टाफ नर्स के 600 पद सृजित करने का निर्णय लिया गया।

    विशेषज्ञ डॉक्टरों को इंसेंटिव देने का निर्णय

    बैठक में डॉक्टरेट ऑफ मेडिसन और मास्टर ऑफ चिरुरगिया की योग्यता प्राप्त फैकल्टी डॉक्टरों को बेसिक पे का 20 प्रतिशत इंसेंटिव देने की स्वीकृति प्रदान की गई।

    युवाओं को रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर

    मंत्रिमंडल ने जल शक्ति विभाग में जॉब ट्रेनी और जूनियर इंजीनियर (सिविल) के 40 पद भरने, ग्रामीण विकास विभाग में खंड विकास अधिकारी के 10 पद सीधी भर्ती से भरने तथा शिक्षा विभाग में अनुकंपा आधार पर 28 आश्रितों को रोजगार देने को मंजूरी दी।

    शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े अहम फैसले

    राज्य के 100 चिन्हित सीबीएसई स्कूलों के लिए एक समर्पित सब-कैडर के गठन को मंजूरी दी गई। इसके अलावा मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना के दायरे का विस्तार करते हुए धर्मशाला के टोंग-लेन स्कूल के बच्चों और दिव्यांग माता-पिता वाले बच्चों को योजना में शामिल करने का निर्णय लिया गया।

    आधारभूत ढांचा और विकास परियोजनाओं को हरी झंडी

    मंत्रिमंडल ने शीतलपुर में हिमाचल-चंडीगढ़ सीमा पर विश्व स्तरीय टाउनशिप, ऊना के पालकवाह खास में एसडीआरएफ को स्थानांतरित करने, घुमारवीं में मल्टीडिसिप्लिनरी यूनिवर्सिटी की स्थापना तथा बिलासपुर जिले में आधुनिक वाणिज्यिक परिसरों के निर्माण को मंजूरी दी।

    ऊर्जा, दुग्ध और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा

    स्वर्ण जयंती ऊर्जा नीति-2021 में संशोधन, एसजेवीएनएल की परियोजनाओं में इक्विटी ऊर्जा पुनः आवंटन, मिल्कफेड से जुड़े नए संयंत्र, चिलिंग सेंटर और 60 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट को स्वीकृति प्रदान की गई।

    नशा मुक्ति, भूमि संरक्षण और आपदा प्रबंधन पर फैसले

    मंत्रिमंडल ने कांगड़ा जिले के इंदौरा क्षेत्र में नशा मुक्ति केंद्र, भूमि संरक्षण अधिनियम में संशोधन, फ्रेंच विकास एजेंसी के सहयोग से 892 करोड़ रुपये की आपदा न्यूनीकरण परियोजना और स्वरोजगार स्टार्ट-अप योजना के तहत बसों की खरीद पर अनुदान को मंजूरी दी।

  • शिक्षा के अधिकार और छात्र एकता के संदेश के साथ एसएफआई ने मनाया 56वां स्थापना दिवस

    शिक्षा के अधिकार और छात्र एकता के संदेश के साथ एसएफआई ने मनाया 56वां स्थापना दिवस

    हिमाचल प्रदेश में एसएफआई ने अपने 56वें स्थापना दिवस पर संगठन की वैचारिक विरासत और छात्र आंदोलनों को याद किया। इस अवसर पर शिक्षा के अधिकार और सार्वजनिक शिक्षा को बचाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    शिमला

    55 वर्षों की संघर्षपूर्ण विरासत को किया याद

    आज प्रदेश के विभिन्न जिलों में Students’ Federation of India ने 56वां स्थापना दिवस मनाया। कार्यक्रमों के दौरान संगठन ने अध्ययन, संघर्ष और बलिदान की उस विरासत को स्मरण किया, जिसमें छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए कई कार्यकर्ताओं ने अपनी जान तक न्योछावर की।

    छात्र एकजुटता को तोड़ने की साजिशों पर चिंता

    एसएफआई राज्य सचिव सन्नी सेकटा ने कहा कि आज संगठन ऐसे दौर में स्थापना दिवस मना रहा है, जब सांप्रदायिक ताकतें लगातार छात्रों की एकजुटता को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा के अधिकार और उसके सार्वजनिक ढांचे को बचाना छात्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर उठाए सवाल

    उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की आड़ में शिक्षा की प्राथमिक संरचना को कमजोर कर रही है। देशभर में 90 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद किया जाना, सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण और संप्रदायिकरण की दिशा में गंभीर संकेत है, जिससे गरीब वर्ग शिक्षा से दूर होता जा रहा है।

    प्रदेश में सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति पर आलोचना

    एसएफआई राज्य अध्यक्ष अनिल ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में भी राज्य सरकार केंद्र सरकार की नीतियों के अनुरूप काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में सार्वजनिक शिक्षा का ढांचा कमजोर हो चुका है और छात्रों को मूलभूत सुविधाएं देने में सरकार असफल साबित हो रही है।

    छात्र समुदाय से एकजुट संघर्ष की अपील

    एसएफआई ने अपने स्थापना दिवस पर देश और प्रदेश के समस्त छात्र समुदाय को शुभकामनाएं देते हुए अपील की कि छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ मिलकर संघर्ष किया जाए। संगठन ने स्पष्ट किया कि यदि सार्वजनिक शिक्षा को नहीं बचाया गया तो आने वाले समय में शिक्षा आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाएगी।

  • आईजीएमसी शिमला मारपीट मामला सुलझा, डॉक्टर और मरीज पक्ष ने आपसी समझौते से खत्म किया विवाद

    आईजीएमसी शिमला मारपीट मामला सुलझा, डॉक्टर और मरीज पक्ष ने आपसी समझौते से खत्म किया विवाद

    हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल आईजीएमसी शिमला में हुई मारपीट की घटना को लेकर चला आ रहा विवाद अब समाप्त हो गया है। दोनों पक्षों ने आपसी सहमति और संवाद के बाद समझौता करते हुए मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है।

    शिमला

    आपसी बातचीत से निकला समाधान
    आईजीएमसी में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. राघव नरूला और मरीज अर्जुन पंवर के बीच हुए विवाद को लेकर बनी तनावपूर्ण स्थिति अब खत्म हो गई है। समझौते के दौरान दोनों पक्षों ने हाथ मिलाए और गले मिलकर यह संदेश दिया कि वे किसी भी प्रकार के टकराव को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

    परिवारों ने दिखाई संवेदनशीलता
    डॉ. राघव नरूला की माता ने भावुक होते हुए कहा कि अर्जुन पंवर भी उनके लिए बेटे समान है और राघव भी। उन्होंने कहा कि दोनों युवाओं ने एक-दूसरे से माफी मांगी है और परिवार इस फैसले के साथ खड़े हैं।

    मरीज पक्ष ने जताया संतोष
    मरीज अर्जुन पंवर के पिता ने कहा कि इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के हस्तक्षेप और सहयोग से उन्हें न्याय का भरोसा मिला। उन्होंने चौपाल क्षेत्र के लोगों द्वारा मिले समर्थन का भी उल्लेख करते हुए कहा कि आज उन्हें संतोष है कि मामला सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझ गया।

    तनावपूर्ण माहौल को मिला विराम
    इस समझौते के बाद अस्पताल परिसर में बना तनावपूर्ण माहौल भी समाप्त हो गया है। दोनों पक्षों ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य में इस घटना को लेकर किसी भी प्रकार का विवाद नहीं बढ़ाया जाएगा और आपसी सम्मान के साथ आगे बढ़ा जाएगा।

  • 16वें वित्तायोग की रिपोर्ट के बाद ही फाइनल होगा हिमाचल का बजट​

    16वें वित्तायोग की रिपोर्ट के बाद ही फाइनल होगा हिमाचल का बजट​

    लोकसभा में रिपोर्ट पेश होने का इंतज़ार, फरवरी तक टल सकता है बजट का प्रारूप

    शिमला

    हिमाचल प्रदेश का आगामी बजट इस बार केंद्र सरकार के 16वें वित्तायोग की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट आने के बाद ही राज्य सरकार अपने बजट को अंतिम रूप देगी, जिसके कारण बजट निर्माण की प्रक्रिया में इस बार देरी होने की संभावना है।

    हालांकि वित्तायोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है, लेकिन इसे अभी तक लोकसभा में पेश नहीं किया गया है। माना जा रहा है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय वर्तमान में इस रिपोर्ट की बारीकी से समीक्षा कर रहा है, जिसके बाद ही इसे संसद के पटल पर रखा जाएगा।​

    रिपोर्ट सार्वजनिक होने तक प्रदेश सरकार बजट की घोषणाओं का प्रारूप तैयार करने के लिए रुकी रहेगी। हिमाचल सरकार को विशेष रूप से अगले पांच वर्षों के लिए मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant) से बड़ी उम्मीदें हैं।

    मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू इस सिलसिले में वित्तायोग के अध्यक्ष के साथ चार बार मुलाकात कर चुके हैं। सरकार का मानना है कि यदि वित्तायोग की सिफारिशें उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती हैं, तो प्रदेश को आर्थिक मोर्चे पर बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ सकती है।​

    वर्तमान में सुक्खू सरकार के सामने कई वित्तीय चुनौतियां हैं। अगले दो सालों में सरकार को अपनी पुरानी घोषणाओं और चुनाव से पहले दी गई मुख्य गारंटियों को पूरा करना है। इनमें महिलाओं को 1500 रुपये प्रति माह सम्मान राशि और 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने जैसी बड़ी योजनाएं शामिल हैं।

    इसके साथ ही, ओपीएस लागू करने की एवज में केंद्र से मिलने वाली मदद में हर साल हो रही 1600 करोड़ रुपये की कटौती और ऋण उठाने की सीमित सीमा ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं।​इस अनिश्चितता का असर प्रशासनिक स्तर पर भी दिखने लगा है।

    बजट में देरी के चलते विधायकों के साथ होने वाली ‘विधायक प्राथमिकता योजनाओं’ की बैठकें अब जनवरी के अंत या फरवरी तक टल सकती हैं। फिलहाल विभागाध्यक्षों के साथ होने वाली बैठकों का शेड्यूल भी जारी नहीं हो पाया है।

    राज्य सरकार अब पूरी तरह से फरवरी महीने पर टिकी है, जब वित्तायोग की रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्था परिवर्तन और विकास योजनाओं को नया आकार दिया जा सकेगा।

  • ​जनगणना को लेकर पहली जनवरी से फ्रीज हो जाएंगी प्रशासनिक सीमाएं

    ​जनगणना को लेकर पहली जनवरी से फ्रीज हो जाएंगी प्रशासनिक सीमाएं

    हिमाचल समेत पहाड़ी राज्यों में पहले पूरी होगी प्रक्रिया, अप्रैल 2026 से शुरू होगा पहला चरण

    शिमला:

    शिमलाहिमाचल प्रदेश में आगामी जनगणना को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद पहली जनवरी से प्रदेश की सभी प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज कर दी जाएंगी।

    जनगणना प्रक्रिया पूरी होने तक सीमाओं के इस फ्रीज को लागू रखा जाएगा। इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है, ताकि गणना के दौरान किसी भी नए ब्लॉक, नगर निगम (MC), नगर परिषद, नगर पंचायत, जिला या वार्ड का गठन न हो सके।

    इस कदम का मुख्य उद्देश्य जनगणना के दौरान सटीक और स्पष्ट आंकड़े जुटाना है।​दो चरणों में पूरी होगी गणना प्रक्रिया​सरकार द्वारा जारी योजना के अनुसार, जनगणना का कार्य दो मुख्य चरणों में संपन्न किया जाएगा:​पहला चरण (अप्रैल से सितंबर 2026): इस दौरान मकान सूचीकरण और आवास जनगणना का फील्ड कार्य किया जाएगा।

    इसमें प्रदेश के घरों और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी एकत्र की जाएगी।​दूसरा चरण (फरवरी 2027): इस चरण में वास्तविक जनसंख्या गणना होगी, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित सामाजिक और आर्थिक आंकड़े जुटाए जाएंगे।

    ​पहाड़ी राज्यों में समय से पहले शुरू होगा काम​

    केंद्र सरकार ने विशेष भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए लद्दाख, जम्मू-कश्मीर के दुर्गम क्षेत्रों, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में जनसंख्या गणना का कार्य पहले पूरा करने का निर्णय लिया है।

    सितंबर 2026 तक इन क्षेत्रों में प्रक्रिया को गति दी जाएगी ताकि सर्दियों के मौसम और बर्फबारी के कारण काम में कोई बाधा न आए।​अधिसूचना जारी, फेरबदल पर रहेगी रोक​राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि पहली जनवरी के बाद न तो कोई नई प्रशासनिक इकाई बनाई जाएगी और न ही मौजूदा सीमाओं में कोई बदलाव किया जाएगा।

    सामान्य प्रशासन विभाग इस पूरी प्रक्रिया को लेकर जागरूकता फैलाने और समन्वय स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। जनगणना के सफल संचालन के लिए सभी जिलों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं।

  • हड़ताल खत्म: सीएम सुक्खू के आश्वासन के बाद काम पर लौटे रेजिडेंट डॉक्टर्स

    हड़ताल खत्म: सीएम सुक्खू के आश्वासन के बाद काम पर लौटे रेजिडेंट डॉक्टर्स

    मरीज से मारपीट मामले की होगी उच्च स्तरीय जांच, आरडीए ने 3 जनवरी को बुलाई अगली बैठक

    शिमला:

    हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी सहित प्रदेश भर में पिछले दो दिनों से जारी रेजिडेंट डॉक्टरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल आखिरकार समाप्त हो गई है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के कड़े रुख और आश्वासन के बाद रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने हड़ताल वापस लेने का निर्णय लिया है।

    मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया था कि डॉक्टरों को अपना अहंकार छोड़कर मरीजों के हित में तुरंत ड्यूटी पर लौटना चाहिए।​मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों को भरोसा दिलाया है कि पल्मोनरी वार्ड में मरीज के साथ हुई मारपीट के मामले की विस्तृत और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।

    साथ ही, सेवा से बर्खास्त किए गए डॉक्टर राघव निरूला के भविष्य पर भी जांच रिपोर्ट के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा। मुख्यमंत्री के इस भरोसे के बाद आरडीए ने बयान जारी कर कहा कि वे जनहित को सर्वोपरि मानते हुए काम पर लौट रहे हैं।

    हालांकि, एसोसिएशन ने यह भी साफ किया है कि जब तक बर्खास्तगी के आदेश रद्द नहीं होते, वे पूरी जांच प्रक्रिया पर पैनी नजर रखेंगे।

    ​बता दें कि यह पूरा विवाद 22 दिसंबर को सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के बाद शुरू हुआ था, जिसमें डॉक्टर राघव निरूला एक मरीज के साथ मारपीट करते नजर आए थे।

    सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए डॉक्टर को टर्मिनेट कर दिया था, जिसके विरोध में रेजिडेंट डॉक्टर लामबंद हो गए थे। अब 3 जनवरी को आरडीए की अगली बैठक होगी, जिसमें जांच की प्रगति और आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी। फिलहाल, डॉक्टरों के काम पर लौटने से प्रदेश के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं सामान्य हो गई हैं।

  • आईजीएमसी में डॉक्टरों की हड़ताल जारी, बर्खास्त सीनियर रेजिडेंट की बहाली की मांग, सरकार ने एसओपी लागू की

    आईजीएमसी में डॉक्टरों की हड़ताल जारी, बर्खास्त सीनियर रेजिडेंट की बहाली की मांग, सरकार ने एसओपी लागू की

    आईजीएमसी में सीनियर रेजिडेंट की बर्खास्तगी के विरोध में डॉक्टरों की हड़ताल से प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित रहीं। सरकार ने आपात सेवाएं सुचारु रखने के लिए एसओपी जारी करते हुए संवाद और समीक्षा का भरोसा दिलाया है।

    शिमला/आईजीएमसी

    इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में मारपीट के एक मामले के बाद सीनियर रेजिडेंट डॉ. राघव नरुला की बर्खास्तगी के विरोध में प्रदेश भर के डॉक्टर हड़ताल पर डटे रहे। आईजीएमसी के अटल सभागार स्थित बैडमिंटन हॉल में रेजिडेंट डॉक्टर, इंटर्न और मेडिकल छात्र एकत्र हुए और बर्खास्तगी को एकतरफा बताते हुए प्रदेश सरकार से न्याय की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि निर्णय वापस लिए जाने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

    मुख्यमंत्री की अपील, जांच और रिव्यू का आश्वासन
    मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने डॉक्टरों से हड़ताल समाप्त कर काम पर लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि आईजीएमसी के सीनियर डॉक्टरों से चर्चा कर पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और फैसले को रिव्यू किया जाएगा, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।

    स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित, आपात व्यवस्था के लिए एसओपी
    रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ हिमाचल मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन के हड़ताल पर रहने और सेमडिकोट के समर्थन के कारण मेडिकल कॉलेजों, जोनल अस्पतालों, सीएचसी और पीएचसी में ओपीडी व रूटीन सेवाएं प्रभावित रहीं। कई जगह ओपीडी में मरीजों की जांच नहीं हो सकी और रूटीन ऑपरेशन टले, हालांकि वरिष्ठ चिकित्सकों ने सीमित सेवाएं दीं।

    डीएमईआर की एसओपी: आपात सेवाएं प्राथमिकता पर
    चिकित्सा शिक्षा व अनुसंधान निदेशालय की ओर से जारी एसओपी के तहत इमरजेंसी सेवाएं पूरी तरह चालू रहेंगी। कंसल्टेंट डॉक्टरों को ओपीडी में अनिवार्य रूप से बैठने, वार्ड राउंड नियमित करने, भर्ती मरीजों को प्राथमिकता देने और केवल आपातकालीन ऑपरेशन करने के निर्देश दिए गए हैं। रेडियोलॉजी और लैब सेवाएं इमरजेंसी व भर्ती मरीजों के लिए प्राथमिकता पर रहेंगी, जबकि शैक्षणिक गतिविधियां निर्बाध जारी रखने के निर्देश हैं।

    अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी
    एसओपी की अवहेलना या आवश्यक सेवाओं में बाधा डालने पर नियमों के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने सभी संस्थानों से रोजाना रिपोर्ट तलब की है, ताकि आपात सेवाओं पर कोई असर न पड़े।

    आरडीए का पक्ष और मांगें
    रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि घटना की पूरी जांच के बिना बर्खास्तगी से चिकित्सक पेशे और संस्थान की साख को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, एकतरफा कार्रवाई वापस लेने और निष्पक्ष जांच के बाद ही निर्णय लेने की मांग दोहराई।