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“घराट बचाओ, विरासत बचाओ” अभियान शुरू, प्रयास सोसाइटी ने सरकार से मांगा ठोस संरक्षण

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन2 • 3 Apr 2026 • 1 Min Read

Himachalnow / नाहन

हिमाचल और उत्तराखंड में पारंपरिक घराटों के संरक्षण के लिए “घराट बचाओ, विरासत बचाओ” अभियान शुरू किया गया है। प्रयास सोसाइटी ने सरकार से इन जलचालित मिलों के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए ठोस नीति बनाने की मांग की है।

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हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में कभी ग्रामीण जीवन की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक जलचालित घराट अब तेजी से विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रयास सोसाइटी ने “घराट बचाओ, विरासत बचाओ” अभियान शुरू करने की घोषणा की है। संस्था ने सरकार से मांग की है कि पानी से चलने वाले इन पारंपरिक घराटों के संरक्षण, पुनरुद्धार और दोबारा संचालन के लिए ठोस नीति और योजनाएं बनाई जाएं।प्रयास सोसाइटी के सचिव धीरज रमौल ने जारी बयान में कहा कि घराट केवल अनाज पीसने का साधन नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के मजबूत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि पहले समय में नदी-नालों के किनारे बने घराट स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते थे, जहां मक्की, गेहूं, जौ और मंडुवा जैसे अनाज पिसे जाते थे।

धीरज रमौल ने बताया कि घराट में धीमी गति से पिसा आटा न केवल स्वाद में बेहतर होता है, बल्कि उसमें पोषक तत्व और फाइबर भी सुरक्षित रहते हैं। उन्होंने कहा कि आज जब लोग फिर से स्वास्थ्य और प्राकृतिक खानपान की ओर लौट रहे हैं, ऐसे समय में घराट का आटा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। साथ ही घराट पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल प्रणाली है, क्योंकि यह जल-ऊर्जा पर आधारित है और किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलाता।उन्होंने चिंता जताई कि आधुनिक मशीनों के बढ़ते उपयोग, रखरखाव की कमी, जलस्रोतों के क्षरण और जागरूकता के अभाव के कारण सैकड़ों घराट बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस समृद्ध परंपरा को केवल इतिहास की किताबों या बुजुर्गों की बातों में ही जान पाएंगी।

प्रयास सोसाइटी ने सरकार, पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और युवाओं से सहयोग की अपील करते हुए कई सुझाव भी दिए हैं। इनमें बंद पड़े घराटों का पुनरुद्धार, पारंपरिक तकनीक के संरक्षण के लिए प्रशिक्षण, घराट के आटे की ब्रांडिंग, ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना और जन-जागरूकता अभियान चलाना शामिल है।संस्था ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल इस दिशा में सरकार की ओर से पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि घराटों को केवल पुरानी याद मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि इन्हें स्थानीय रोजगार, स्वस्थ जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़कर दोबारा जीवित किया जाए।धीरज रमौल ने कहा कि प्रयास सोसाइटी जल्द ही क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम शुरू करेगी, ताकि लोगों की भागीदारी बढ़े और इस विरासत को बचाने के लिए एक मजबूत जनआंदोलन खड़ा किया जा सके।