हिमाचल प्रदेश सरकार 700 करोड़ रुपये का नया ऋण लेगी, 8 जुलाई को राज्य को मिलेगी राशि
हिमाचल प्रदेश सरकार ने 700 करोड़ रुपये का नया ऋण लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 7 जुलाई को ऋण की नीलामी होगी और 8 जुलाई को यह राशि राज्य सरकार के खाते में जमा की जाएगी। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार यह ऋण राज्य की नियमित वित्तीय आवश्यकताओं, प्रतिबद्ध देनदारियों तथा अन्य सरकारी व्ययों के प्रबंधन के लिए लिया जा रहा है।
शिमला
700 करोड़ रुपये के ऋण की प्रक्रिया पूरी
हिमाचल प्रदेश सरकार ने 700 करोड़ रुपये का नया ऋण लेने के लिए आवश्यक वित्तीय और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। वित्त विभाग द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार 7 जुलाई को इस ऋण के लिए नीलामी प्रक्रिया आयोजित की जाएगी, जबकि 8 जुलाई को स्वीकृत राशि राज्य सरकार के खाते में जमा होगी। इससे पहले जून 2026 में भी प्रदेश सरकार ने 700 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। राज्य सरकार नियमित वित्तीय आवश्यकताओं और प्रतिबद्ध देनदारियों के प्रबंधन के लिए समय-समय पर बाजार से ऋण जुटाती रही है।
13 वर्ष बाद ब्याज सहित करनी होगी अदायगी
इस ऋण की परिपक्वता अवधि 13 वर्ष निर्धारित की गई है। वित्तीय शर्तों के अनुसार सरकार को यह राशि ब्याज सहित 8 जुलाई 2039 को लौटानी होगी। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार नए ऋण को शामिल करने के बाद राज्य सरकार पर कुल बकाया ऋण का आंकड़ा लगभग 1,11,900 करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा। प्रदेश के कुल ऋण दायित्वों में बाजार ऋण, विभिन्न वित्तीय संस्थानों से लिए गए ऋण तथा अन्य देनदारियां भी शामिल हैं।
हर महीने प्रतिबद्ध देनदारियों पर हजारों करोड़ रुपये का व्यय
राज्य सरकार को प्रत्येक माह अपनी नियमित वित्तीय प्रतिबद्धताओं के लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कर्मचारियों के वेतन पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये तथा पेंशन भुगतान पर करीब 800 करोड़ रुपये प्रतिमाह खर्च होते हैं। इस प्रकार केवल वेतन और पेंशन मद में ही सरकार को लगभग 2,800 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त पहले से लिए गए ऋणों पर करीब 500 करोड़ रुपये ब्याज तथा लगभग 300 करोड़ रुपये मूलधन की अदायगी के लिए भी हर महीने अलग से राशि की आवश्यकता रहती है।
राजस्व और व्यय के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती
उपलब्ध वित्तीय जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के समक्ष नियमित आय और अनिवार्य व्ययों के बीच संतुलन बनाए रखना प्रमुख वित्तीय चुनौती बना हुआ है। कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, विकास कार्यों, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तथा पूर्व में लिए गए ऋणों की अदायगी जैसे दायित्वों के लिए निरंतर वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता रहती है। इसी क्रम में सरकार समय-समय पर बाजार से ऋण लेकर आवश्यक वित्तीय प्रबंधन करती है। वर्तमान 700 करोड़ रुपये का ऋण भी इसी वित्तीय प्रक्रिया का हिस्सा है।
