हिमाचल में अंधाधुंध पर्वत कटान का मुद्दा संसद में उठा, डॉ. राजीव भारद्वाज ने अलग सड़क नीति की मांग की
हिमाचल प्रदेश में सड़क निर्माण के नाम पर हो रहे अंधाधुंध पर्वत कटान और ब्लास्टिंग से बढ़ते भूस्खलन का मुद्दा संसद तक पहुंच गया है। हिमाचल प्रदेश से भाजपा सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज ने लोकसभा में नियम-377 के तहत यह विषय उठाते हुए हिमालयी राज्यों के लिए वैज्ञानिक, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल सड़क निर्माण नीति बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि विकास कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण को समान प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
शिमला
डॉ. राजीव भारद्वाज ने कहा कि हिमाचल सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में फोरलेन और अन्य सड़क परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटिंग और ब्लास्टिंग की जा रही है। उन्होंने कहा कि बरसात के दौरान इसका प्रभाव लगातार बढ़ते भूस्खलन, सड़कें बंद होने और जान-माल के नुकसान के रूप में सामने आ रहा है। साथ ही हर वर्ष सड़कों की मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी
सांसद ने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसकी कीमत प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जा सकती। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि, बागवानी और पर्यटन पर आधारित है और यदि पर्वतीय क्षेत्र असुरक्षित होंगे तो इसका सीधा असर प्रदेश की आर्थिकी पर पड़ेगा।
आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर दिया जोर
डॉ. भारद्वाज ने सड़क निर्माण में आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर बल देते हुए कहा कि परवाणू फोरलेन परियोजना में टर्फ रीइन्फोर्समेंट मैट्स (टीआरएम) जैसी तकनीक के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि हाइड्रोसीडिंग, रॉक बोल्टिंग, मेष रीइन्फोर्समेंट, जियोसेल्स और सॉयल नेलिंग जैसी तकनीकों को भी हिमालयी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर अपनाया जाना चाहिए।
हिमालयी राज्यों के लिए अलग नीति बनाने की मांग
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि हिमालयी राज्यों के लिए अलग पर्वतीय सड़क निर्माण नीति बनाई जाए तथा प्रत्येक सड़क परियोजना में भू-वैज्ञानिक अध्ययन और ढलान स्थिरता ऑडिट अनिवार्य किया जाए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों को सड़क निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनाकर ही सुरक्षित और टिकाऊ विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। उनके अनुसार ऐसी नीति से भूस्खलन की घटनाओं में कमी आएगी, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ेगी और भविष्य में सड़कों के रखरखाव पर होने वाला भारी खर्च भी कम होगा। साथ ही हिमाचल की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए विकास की गति बनाए रखी जा सकेगी।